Swami Sahajanand Saraswati Books: गांधी पीस फाउंडेशन के पूर्व सेक्रेटरी सुरेंद्र कुमार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामचंद्र प्रधान द्वारा संपादित और अनुवादित अखिल भारतीय किसान सभा के संस्थापक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वामी सहजानंद सरस्वती की चार खंडों वाली बुक सीरीज की प्रतियां जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता के.सी. त्यागी को भेंट कीं. यह स्वामी सहजानंद की किसान आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका और उनके विचारों को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
प्रो. रामचंद्र प्रधान द्वारा अनुवादित, संपादित और प्रस्तुत ये चार एडीशन हैं:
खंड-I: रेमिनिसेंसेज एंड स्ट्रगल्स ऑफ द किसान सभा
खंड-II: व्हाट शुड पीजेंट्स डू?
खंड-III: मेजर एड्रेसेज
खंड-IV: मेजर एसेज एंड अदर राइटिंग्स
सुरेंद्र कुमार ने कहा, “स्वामी जी का जीवन और विचार आज के किसान आंदोलनों के लिए प्रेरणा हैं.” वहीं, श्री के.सी. त्यागी ने इसे “किसान इतिहास के पुनर्लेखन की दिशा में बड़ा योगदान” बताया.
स्वामी सहजानंद सरस्वती भारतीय किसान आंदोलन के प्रणेता थे, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ किसानों को संगठित कर क्रांतिकारी संघर्ष छेड़ा. उनकी रचनाएँ आज भी ग्रामीण भारत की समस्याओं, भूमि सुधार और सामाजिक न्याय के लिए प्रासंगिक हैं.
स्वामी सहजानंद सरस्वती, जो अखिल भारतीय किसान सभा के संस्थापक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, का जन्म गाजीपुर के दुल्लहपुर क्षेत्र के देवा गांव में हुआ था. एक दण्ड संन्यासी के रूप में उन्होंने किसानों के अधिकारों और स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. न्यास के संस्थापक मारुति कुमार राय ने बताया कि स्वामीजी ने संन्यासी जीवन के बावजूद समाज सुधार और किसान आंदोलन में आजीवन कार्य किया. जून 2025 में स्वामी सहजानंद सरस्वती की 75वीं पुण्यतिथि पर स्वामी सहजानंद सरस्वती स्मृति न्यास द्वारा विशेष आयोजन आयोजित किया गया था. उनकी 75वीं पुण्यतिथि पर न्यास ने उनकी उपलब्धियों को याद कर युवाओं को प्रेरित करने का प्रयास किया. इसके लिए गाजीपुर में स्वामी सहजानंद सरस्वती स्नातकोत्तर महाविद्यालय में एक कार्यक्रम हुआ था, जिसमें भारत एक्सप्रेस के चेयरमैन उपेन्द्र राय भी शामिल हुए थे.
स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 16 वर्ष की अल्पायु में विवाह के बाद पत्नी की मृत्यु के पश्चात उन्होंने संन्यास दीक्षा ली और सामाजिक सुधारों में सक्रिय हो गए. 1920 में पटना में महात्मा गांधी से मुलाकात के बाद वे असहयोग आंदोलन में शामिल हुए. गांव-देहात की दुर्दशा देखकर उन्होंने किसानों की मुक्ति को जीवन का लक्ष्य बना लिया. उन्होंने 1927 में बिहटा (पटना) में सीताराम आश्रम स्थापित कर अपना स्थायी निवास बनाया.
उन्होंने 1929 में भूमिहार ब्राह्मण सभा से मतभेद के बाद उसी वर्ष बिहार प्रांतीय किसान सभा की स्थापना की और जमींदारी शोषण के खिलाफ क्रांतिकारी संघर्ष छेड़ दिया. 1934 के बिहार भूकंप में राहत कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाई. कांग्रेस के जमींदार-समर्थक रुख से असहमति के कारण 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना की और इसके सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए.
स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किसान घोषणा-पत्र में जमींदारी उन्मूलन और कर्ज माफी की मांग उठाई. जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, ईएमएस नंबूदरीपाद, अरुणा आसफ अली जैसे समाजवादी नेता उनके साथ आए. साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी, दिनकर, नागार्जुन, मुल्क राज आनंद भी उनके आंदोलन से जुड़े. सुभाषचंद्र बोस उन्हें “धरती का जादुई करिश्मा” कहते थे. उनकी सभा में सचिव के रूप में बिहार के भावी मुख्यमंत्री श्री बाबू ने कार्य किया.
स्वामी जी ने लिखा था – “जिसका हक छिन गया हो, उसे हक दिलाना ही असली आजादी और समाजसेवा है.” उनके संघर्षों का परिणाम रहा कि स्वतंत्र भारत में जमींदारी प्रथा समाप्त हुई. लेकिन किसान आत्महत्याएं और हाल के आंदोलन बताते हैं कि उनका सपना अभी अधूरा है. उनकी रचनाएँ आज भी ग्रामीण भारत के लिए प्रासंगिक हैं.
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