भारतीय बॉडीबिल्डिंग के सपनों की ताकत
Sheru Classic 2026: भारत में पेशेवर बॉडीबिल्डिंग लाने से लेकर IFBB प्रो लीग और मिस्टर ओलंपिया की राह बनाने तक, शेरू क्लासिक (Sheru Classic) सिर्फ एक बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिता से कहीं बड़ा रूप ले चुका है. इसकी कहानी अब सिर्फ बॉडीबिल्डिंग की नहीं, बल्कि भारतीय एथलीटों, उद्यमिता, फिटनेस कल्चर और सपनों को हकीकत में बदलने वाले बुनियादी ढांचे की बन चुकी है.
बॉडीबिल्डर के मंच पर कदम रखने से ठीक पहले एक अजीब सा सन्नाटा होता है. बैकस्टेज पर शीशे, रेजिस्टेंस बैंड्स, फुसफुसाती हिदायतें, घबराहट भरी निगाहें और महीनों के कड़े अनुशासन को अपने जिस्म पर समेटे हुए एथलीट नजर आते हैं. फिर एक नाम पुकारा जाता है. एथलीट रोशनी के बीच मंच पर आता है. दर्शकों को शायद सिर्फ दो मिनट दिखते हैं. लेकिन एथलीट को वे दो साल या दस साल याद होते हैं जो उस पल के पीछे गुजरे थे.
शेरू क्लासिक को समझने के लिए यह फर्क समझना बेहद जरूरी है. इंस्टाग्राम पर किसी तस्वीर के जरिए इसे देखने वाले के लिए शेरू क्लासिक शायद एक भव्य बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिता लग सकता है जहां चमकदार लाइटें, संगीत, तराशे हुए शरीर और चमचमाती ट्रॉफियां होती हैं. लेकिन, इसकी असली और दिलचस्प कहानी उन तस्वीरों के पीछे घट रही है.
यह एक भारतीय जिम और अंतरराष्ट्रीय मंच के बीच रास्ता तैयार करने की कोशिश की कहानी है. एक ऐसे देश में जहां खेल प्रतिभा अक्सर खेल के बुनियादी ढांचे से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी है, यह रास्ता बहुत मायने रखता है.
शेरू क्लासिक भारत से शुरू हुआ एक हेल्थ, फिटनेस और बॉडीबिल्डिंग प्लेटफॉर्म है, जिसकी नींव पूर्व प्रतिस्पर्धी बॉडीबिल्डर शेरू आंगरीश ने रखी थी. इसके इवेंट्स IFBB प्रो लीग और NPC वर्ल्डवाइड इकोसिस्टम से जुड़े हैं, जिन्होंने पेशेवर और उभरते हुए एथलीटों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिताओं में भाग लेने का मौका दिया है.
इसकी भारतीय यात्रा 2011 में मुंबई में आयोजित ऐतिहासिक पेशेवर शो से शुरू होती है. उस दौर में मसल एंड फिटनेस ने इसे भारत की पहली पेशेवर बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिता बताया था. शेरू क्लासिक आज इसे एशिया का पहला प्रो शो बताता है.
जो लीग शुरुआत एक बॉडीबिल्डिंग इवेंट के तौर पर हुई थी, वह बाद में एक बड़े फिटनेस बड़े आयाम में बदल गई. इसमें प्रतियोगिताएं, एक्सपो, फिटनेस बिजनेस के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार शामिल हैं. शेरू क्लासिक के अपने वैश्विक प्लेटफॉर्म के अनुसार, इसकी मौजूदगी भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, कोलंबिया, इटली, मैक्सिको, फ्रांस और कनाडा में है.
2026 की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, यह संगठन अब नौ देशों में सक्रिय है. यह बदलाव गौर करने लायक है. क्योंकि सबसे सफल स्पोर्ट्स प्रॉपर्टीज सिर्फ प्रतियोगिताएं आयोजित नहीं करतीं. वे संभावनाओं को जन्म देती हैं.
भारतीय बॉडीबिल्डिंग की शुरुआत शेरू क्लासिक से नहीं हुई थी. भारत के पास दुनिया की सबसे प्राचीन शारीरिक संस्कृतियों में से एक है. इसमें अखाड़ा, पहलवान, गदा, सूर्योदय से पहले का कड़ा अभ्यास शामिल हैं. यहां शारीरिक ताकत केवल दिखावे से नहीं, बल्कि सहनशक्ति और चरित्र से जुड़ी थी. मसल एंड फिटनेस ने भी भारत की इस प्राचीन संस्कृति और आधुनिक पेशेवर बॉडीबिल्डिंग के बीच की कड़ी को रेखांकित किया था. लेकिन आधुनिक पेशेवर बॉडीबिल्डिंग के सामने एक अलग चुनौती थी.
एक भारतीय एथलीट के पास बेहतरीन जेनेटिक्स हो सकते थे. उसके पास कड़ा अनुशासन हो सकता था. वह कोच तलाश सकता था, सप्लीमेंट्स के लिए पैसे बचा सकता था, डाइट तैयार कर सकता था और सालों तक बारबेल के नीचे पसीना बहा सकता था. लेकिन वह जो चीज आसानी से अपने दम पर नहीं बना सकता था, वह था अपने आसपास एक अंतरराष्ट्रीय खेल इकोसिस्टम.
इसके लिए मान्यता प्राप्त प्रतियोगिताओं, प्रमोटरों, जजों, प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन, स्पॉन्सर्स, दर्शकों और आखिरकार इस खेल के सबसे बड़े मंचों तक जाने वाले एक भरोसेमंद रास्ते की जरूरत थी. शेरू आंगरीश ने इस मुश्किल को बखूबी समझा, क्योंकि वे खुद इस खेल का हिस्सा रहे थे. उनका समाधान बेहद सीधा और स्पष्ट था. अगर भारतीय एथलीटों को दुनिया के बॉडीबिल्डिंग मंच तक पहुंचने में संघर्ष करना पड़ रहा है, तो क्यों न उस मंच को ही भारत के करीब लाया जाए?
2011 का पहला शेरू क्लासिक काफी साहसी कदम था. उस समय अंतरराष्ट्रीय पेशेवर बॉडीबिल्डिंग कैलेंडर पर स्थापित विदेशी बाजारों का दबदबा था. भारत किसी बड़े पेशेवर मुकाबले के लिए कोई स्वाभाविक ठिकाना नहीं माना जाता था. फिर भी मुंबई शो ने दुनिया के दिग्गज बॉडीबिल्डर्स को भारत की जमीन पर ला खड़ा किया. उस दौर की रिपोर्ट्स बताती हैं कि अंतरराष्ट्रीय एथलीटों और इंडस्ट्री के बड़े नामों को भारत लाने के लिए कितना बड़ा लॉजिस्टिक अभियान चलाना पड़ा था.
यह प्रतीकात्मक रूप से बहुत अहम था. भारतीय प्रशंसक अपने देश में ही विश्वस्तरीय बॉडीबिल्डिंग देख सकते थे. भारतीय प्रतियोगी बिना मैगजीन या विदेशी ब्रॉडकास्ट के अपनी आंखों से पेशेवर मानकों को देख सकते थे. कंपनियों को दर्शक दिखे. स्पॉन्सर्स को बाजार दिखा और युवा एथलीटों को अपनी मंजिल नजर आई.
खेल उद्योग अक्सर इसी तरह आगे बढ़ता है. एक बड़ा इवेंट ध्यान खींचता है, ध्यान से व्यापार बढ़ता है, व्यापार से बुनियादी ढांचा बनता है और बुनियादी ढांचा ज्यादा से ज्यादा एथलीटों को इसमें शामिल होने की वजह देता है. मेडल इस पूरे तंत्र का सिर्फ एक हिस्सा भर होता है.
2011 से शुरू हुआ विचार अब काफी बड़ा हो चुका है. पंद्रह साल बाद, इसका पैमाना पूरी तरह बदल चुका था. शेरू क्लासिक 2026 और ‘भारत इंडिया प्रो’ का आयोजन 12 से 14 जून 2026 तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में किया गया. आयोजकों के अनुसार, तीन दिनों में लगभग 1.5 लाख दर्शक पहुंचे और पांच देशों के करीब 250 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया.
आधिकारिक IFBB प्रो लीग रिकॉर्ड कहते हैं कि 2026 भारत इंडिया प्रो नई दिल्ली में आयोजित हुआ, जिसमें मेन्स क्लासिक फिजिक और मेन्स फिजिक में पेशेवर मुकाबले हुए. दो भारतीय एथलीटों ने सबसे बड़े नतीजे अपने नाम किए. दीपक नंदा ने मेन्स क्लासिक फिजिक का खिताब जीता. मनोज पाटिल ने मेन्स फिजिक वर्ग में जीत हासिल की.
IFBB नतीजों के अनुसार, क्लासिक फिजिक में दीपक नंदा पहले स्थान पर रहे और उन्होंने अब्दुल्ला अलराबियाह व अशथ सुलेमान को पीछे छोड़ा. वहीं मेन्स फिजिक में मनोज पाटिल ने अनिक घोष और रामबाबू नोवदासरी को पछाड़कर पहला स्थान हासिल किया.
ये नतीजे ऐसी बात बताते हैं जो दर्शकों के आंकड़े नहीं बता सकते. भारतीय बॉडीबिल्डिंग अब सिर्फ अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की मेजबानी नहीं कर रही है, बल्कि भारतीय एथलीट इसमें जीत भी दर्ज कर रहे हैं. असली प्रोडक्ट बॉडीबिल्डिंग नहीं, एक ‘रास्ता’ है.
मैनेजमेंट का एक बहुत काम का सिद्धांत है. संस्थाएं तब लंबे समय तक टिकती हैं जब वे समझती हैं कि उनका असली काम क्या है. रेलवे कंपनी असल में सिर्फ रेलवे के काम में नहीं होती, वह ट्रांसपोर्टेशन के काम में होती है. अखबार सिर्फ स्याही या कागज के काम में नहीं होता, वह सूचना के काम में होता है.
इसी तरह शेरू क्लासिक को खुद को सिर्फ बॉडीबिल्डिंग शो आयोजित करने तक सीमित नहीं समझना चाहिए. उसका असली काम एथलीट के लिए अवसर पैदा करना है. इस एक कड़ी को ऐसे समझिए. अगर यह कड़ी ठीक से काम करती है, तो शेरू क्लासिक साल में एक बार होने वाले तमाशे से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है.
स्थानीय एथलीट → व्यवस्थित प्रतियोगिता → राष्ट्रीय पहचान → पेशेवर योग्यता (प्रो कार्ड) → अंतरराष्ट्रीय मुकाबला → वैश्विक खेल करियर
यह एक बुनियादी ढांचा बन जाता है. यहीं पर NPC वर्ल्डवाइड और IFBB प्रो लीग के साथ जुड़ाव की अहमियत सामने आती है. सामान्य बॉडीबिल्डिंग टूर्नामेंट और एक मान्यता प्राप्त प्रतिस्पर्धी रास्ते के बीच का फर्क उस एथलीट के लिए बहुत बड़ा होता है जिसका सपना प्रो स्टेटस पाना है और भारत का अगला बड़ा पड़ाव पहले ही कैलेंडर पर तय है.
आधिकारिक IFBB प्रो लीग कैलेंडर में 18 से 20 दिसंबर 2026 को मुंबई में ‘एमेच्योर ओलंपिया इंडिया 2026’ दर्ज है, जिसके प्रमोटर शेरू आंगरीश हैं. अहम बात यह है कि इसे NPC वर्ल्डवाइड प्रो क्वालिफायर का दर्जा दिया गया है. उभरते हुए प्रतियोगियों के लिए यह दर्जा इवेंट की चकाचौंध से कहीं अधिक मायने रखता है.
NPC वर्ल्डवाइड के नियमों के अनुसार, क्वालिफाइंग इवेंट्स में डिविजन और प्रतियोगियों की संख्या के आधार पर IFBB प्रो कार्ड दिए जा सकते हैं. यह दिसंबर का इवेंट सर्च इंजनों के लिए एक बेहतरीन खबर जरूर है, लेकिन एथलीट के लिए यह उससे कहीं बुनियादी चीज है. क्योंकि यह एक खुला दरवाजा है.
शेरू क्लासिक को उसके संस्थापक से अलग नहीं देखा जा सकता. प्रमोटर और उद्यमी बनने से पहले आंगरीश खुद एक प्रतिस्पर्धी बॉडीबिल्डर थे. कंपनी के प्रोफाइल में मिस्टर इंडिया और मिस्टर ब्रिटेन जैसी जीत दर्ज हैं और उन्हें IFBB प्रो कार्ड हासिल करने वाला दूसरा भारतीय बताया गया है. लेकिन उनका सबसे बड़ा उद्यम शायद कोई खिताब जीतना नहीं था. वह था एक खाली जगह को पहचानना. सफल उद्यमी अक्सर वह देख लेते हैं जिसे ग्राहक शब्दों में बयां नहीं कर पा रहे होते. अच्छे स्पोर्ट्स एंटरप्रेन्योर एथलीटों के भीतर भी यही देखते हैं.
भारतीय एथलीट को सिर्फ हौसले की जरूरत नहीं थी. उसे एक सिस्टम की जरूरत थी. यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है. हौसला किसी को कल सुबह जिम की दहलीज तक ले जा सकता है. लेकिन, बुनियादी ढांचा यह तय करता है कि वही इंसान पांच साल बाद भी इस खेल को पेशेवर तरीके से आगे बढ़ा पाएगा या नहीं. यही चुनौती भारत के लगभग हर उभरते खेल के सामने है.
किसी आधुनिक फिटनेस एक्सपो में घूमिए, तो खेल की पारंपरिक सीमाएं गायब नजर आती हैं. यहां न्यूट्रिशन कंपनियों के बगल में जिम इक्विपमेंट बनाने वाले होते हैं; कपड़ों के ब्रांड्स के साथ टेक कंपनियां; कोचों के साथ कंटेंट क्रिएटर्स; फिजियोथेरेपी, वेलनेस, फूड, सप्लीमेंट्स, सॉफ्टवेयर और कंज्यूमर प्रोडक्ट्स सब एक ही कमर्शियल स्पेस में मौजूद होते हैं.
IHFF (इंटरनेशनल हेल्थ, स्पोर्ट्स एंड फिटनेस फेस्टिवल) का एग्जीबिटर इकोसिस्टम खुद न्यूट्रिशन और इक्विपमेंट से लेकर अपैरल, फिटनेस टेक, जिम, स्पोर्ट्स गुड्स, हेल्थ फूड्स, न्यूट्रास्यूटिकल्स और वेलनेस सर्विसेज तक फैला है. यही वजह है कि शेरू क्लासिक का विस्तार बिजनेस के नजरिए से काफी दिलचस्प है.
एक बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिता दर्शकों को देखने की चीज देती है. लेकिन, एक फिटनेस इकोसिस्टम कारोबारों को आगे बढ़ने की जमीन देता है. भारत की अगली पीढ़ी की स्पोर्ट्स कंपनियां पारंपरिक खेल संगठनों जैसी नहीं होंगी. वे एक ही समय में इवेंट्स, कम्युनिटी, मीडिया, एथलीट नेटवर्क, डेटा, कंज्यूमर प्रोडक्ट्स और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी की मालिक हो सकती हैं. शेरू क्लासिक के सामने मौजूद अवसर इसी चौराहे पर स्थित है.
2026 के दिल्ली इवेंट के अंत में एक और अहम घटनाक्रम हुआ. जेके सीमेंट की स्पोर्ट्स इनवेस्टमेंट शाखा, JKC स्पोर्ट्स ने शेरू क्लासिक यूनिवर्स में रणनीतिक निवेश किया. स्पोर्ट्समिंट की रिपोर्ट के अनुसार, इस साझेदारी का मकसद एक बड़े हेल्थ, फिटनेस और वेलनेस इकोसिस्टम को मजबूत करना है जिसका दायरा स्पोर्ट्स टेक, इंफ्रास्ट्रक्चर, एथलीट डेवलपमेंट और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी तक फैला हुआ है.
यह कदम सिर्फ एक और बड़ा बॉडीबिल्डिंग शो करने से कहीं ज्यादा बड़ा साबित हो सकता है. पूंजी किसी इवेंट को संस्था बनने का मौका देती है. लेकिन, तभी जब उस पूंजी का इस्तेमाल सिर्फ तमाशा खड़ा करने के बजाय क्षमता विकसित करने में किया जाए.
ज्यादा इवेंट्स होना अच्छा है. लेकिन एथलीटों के लिए बेहतर रास्ते बनना और भी बेहतर होगा. ज्यादा दर्शक आना अच्छा है. लेकिन बेहतर कोचिंग, स्पोर्ट्स साइंस, डिजिटल डिस्ट्रीब्यूशन, जमीनी स्तर पर प्रतिभा की पहचान, महिलाओं की भागीदारी, एथलीट वेलफेयर और कमर्शियल मौके तैयार होना सबसे बेहतर होगा.
इसलिए शेरू क्लासिक की अगली परीक्षा अब यह साबित करने की नहीं है कि भारत में बॉडीबिल्डिंग के दर्शक हैं या नहीं. वह यह काफी हद तक साबित कर चुका है. असली सवाल यह है कि क्या वह उस दर्शक वर्ग के इर्द-गिर्द एक टिकाऊ भारतीय फिटनेस इकोनॉमी खड़ी करने में मदद कर सकता है?
भारत का फिटनेस रिवोल्यूशन ‘सिक्स-पैक एब्स’ से कहीं बड़ा है. बॉडीबिल्डिंग को सिर्फ तड़क-भड़क के नजरिए से देखने में एक जोखिम है. चौड़े कंधे, पतली कमर और ट्रांसफॉर्मेशन की तस्वीरें ध्यान तो खींचती हैं, लेकिन वे असल सबक को छुपा भी सकती हैं. बॉडीबिल्डिंग की बुनियाद अनुशासन और निरंतरता पर टिकी है. कोई भी एक वीकेंड में चैंपियनशिप जैसी बॉडी नहीं बना सकता. न एक डाइट से यह बनती है, न एक वर्कआउट से और न ही किसी मोटिवेशनल स्पीच से. यह खेल निरंतरता की मांग करता है.
यही वजह है कि इसकी बढ़ती लोकप्रियता के साथ जिम्मेदारी भी आती है. कॉम्पिटिटिव बॉडीबिल्डिंग को सामान्य हेल्थ और फिटनेस का पर्याय बनाकर नहीं पेश किया जाना चाहिए. सुरक्षित ट्रेनिंग, योग्य कोच, सही पोषण, रिकवरी और जिम्मेदार खेल तौर-तरीके बहुत मायने रखते हैं. खासकर तब जब युवा पीढ़ी इसे देख रही हो.
एक गंभीर फिटनेस संस्था को भारत को सिर्फ मस्कुलर बनने के लिए प्रेरित नहीं करना चाहिए. उसे भारत को ज्यादा स्वस्थ बनने में मदद करनी चाहिए. शेरू क्लासिक के सामने शायद सबसे बड़ा और सार्थक मौका यही है.
भारत में क्रिकेट की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ यह नहीं है कि करोड़ों बच्चे इसे पसंद करते हैं. बल्कि यह है कि एक बच्चे को इसकी सीढ़ी बिल्कुल साफ समझ आती है.
स्कूल → एकेडमी → जिला → राज्य → घरेलू क्रिकेट → फ्रेंचाइजी लीग → टीम इंडिया
यह रास्ता सबको दिखाई देता है. भारत के कई अन्य खेल इसलिए पिछड़ जाते हैं क्योंकि सपना तो होता है, लेकिन वह सीढ़ी गायब होती है. बॉडीबिल्डिंग भी इसी अंतर्विरोध के साथ जीती रही है. भारत में करोड़ों जिम जाने वाले और जुनूनी एथलीट रहे हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम यह देख पाते थे कि किसी मोहल्ले के जिम की मेहनत एक पेशेवर अंतरराष्ट्रीय करियर में कैसे बदल सकती है.
शेरू क्लासिक जैसे मंच उस सीढ़ी को साफ दिखाने में मदद करते हैं. यही वजह है कि नए निवेश के ऐलान के दौरान शेरू आंगरीश की सबसे अहम बात कमाई या विस्तार को लेकर नहीं थी. उन्होंने कहा था कि भारतीय एथलीटों के पास हमेशा से टैलेंट तो था, लेकिन उनके पास हमेशा सही मंच नहीं था. यह एक ऐसी बात है जिसे याद रखा जाना चाहिए. क्योंकि टैलेंट कुदरत सबको देती है. लेकिन मौके सबको नहीं मिलते.
आमतौर पर कोई खेल प्रतियोगिता लाइटें बंद होते ही खत्म हो जाती है. लेकिन किसी खेल संस्था का असली काम उसके बाद शुरू होता है. यही वह मोड़ है जहां शेरू क्लासिक आज खड़ा है. कंपनी ने एक लंबा सफर तय किया है. मुंबई के एक शुरुआती प्रो शो से लेकर अंतरराष्ट्रीय बॉडीबिल्डिंग इकोसिस्टम, बड़े फिटनेस एक्सपो, अंतरराष्ट्रीय कामकाज और संस्थागत निवेश तक पहुंचा है. लेकिन, इसकी सबसे असरदार कहानी अभी भी उस स्टेज का आकार नहीं है.
कहानी उस फासले की है जो उस स्टेज और भारत के किसी साधारण जिम में खड़े एथलीट के बीच है. शायद लुधियाना में, शायद दिल्ली में, शायद बिहार, महाराष्ट्र, केरल या हरियाणा के किसी छोटे शहर में, उसका नाम अभी कोई नहीं जानता. इसमें कोई मेडल नहीं है. कोई स्पॉन्सर नहीं है. कोई तालियां नहीं हैं. बस एक और रेपिटेशन. फिर एक और उसके बाद एक और खेल की दुनिया सपने देखने वालों से भरी पड़ी है.
एक परिपक्व खेल देश और सपने देखने वाले देश के बीच का फर्क सिर्फ यह होता है कि क्या वे ऐसी संस्थाएं बना पाते हैं जो उन सपनों को मंजिल तक पहुंचा सकें. शेरू क्लासिक की शुरुआत दुनिया की पेशेवर बॉडीबिल्डिंग को भारत लाने से हुई थी. अब उसके सामने इससे भी बड़ा अवसर है, भारत की प्रतिभा को दुनिया के मंच तक ले जाना.
200 करोड़ रुपये के सुकेश चंद्रशेखर ठगी मामले में राऊज एवेन्यू कोर्ट ने बॉलीवुड अभिनेत्री…
अमित शाह के लखनऊ दौरे और प्रदेश कार्यसमिति बैठक के बाद साफ है कि यूपी…
दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने DHFL घोटाले के मुख्य आरोपी वधावन बंधुओं पर अतिरिक्त…
PM Modi Bharat Parv 2026 Ekta Nagar: पीएम मोदी ने एकता नगर में 'भारत पर्व…
Amit Shah UP BJP working committee meeting Lucknow 2027: लखनऊ में अमित शाह का चुनावी…
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वकीलों को जबरन अदालत में पेश होने से रोके जाने पर कड़ी…