बनारस से गाजीपुर तक, 2027 में पूर्वांचल का सियासी गणित क्या होगा?
Purvanchal Election Equation: यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही पूर्वांचल की सियासत में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है. लखनऊ की सत्ता की राह तय करने वाले वाराणसी मंडल के चार जिले, वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर और चंदौली, एक बार फिर सियासी लड़ाई के केंद्र में हैं. पिछले चुनावों के नतीजों ने इन जिलों में अलग-अलग राजनीतिक तस्वीर पेश की है. 2024 के लोकसभा चुनाव में तीन सीटों पर समाजवादी पार्टी की जीत ने बीजेपी के सामने नई चुनौतियों का सवाल खड़ा किया, तो वाराणसी में नरेंद्र मोदी की जीत ने बीजेपी के मजबूत राजनीतिक आधार को भी सामने रखा. अब नजरें इस बात पर हैं कि लोकसभा चुनाव के ये समीकरण विधानसभा चुनाव तक कितने कायम रहते हैं और कहां सियासी हवा का रुख बदलता है. बीजेपी के लिए अपना प्रभाव बरकरार रखना चुनौती होगी, तो सपा के सामने लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को विधानसभा की सीटों में बदलने की कसौटी होगी. ऐसे में सवाल है कि 2027 की चुनावी बिसात पर किस जिले में कौन सा समीकरण निर्णायक बन सकता है?
पूर्वांचल की राजनीति में जातीय समीकरण, उम्मीदवारों का प्रभाव, स्थानीय नेतृत्व और पार्टियों के गठबंधन ही चुनावी सफलता तय करते हैं. वाराणसी में बीजेपी का मजबूत आधार है, तो जौनपुर और गाजीपुर में समाजवादी पार्टी ने पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान अपनी ताकत दिखाई है. चंदौली की तस्वीर भी एक जैसी नहीं है, यहां तीन सीटों पर बीजेपी और एक पर सपा का कब्जा है. ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में वाराणसी मंडल की 28 सीटों पर होने वाली सियासी लड़ाई काफी दिलचस्प हो सकती है.
वाराणसी मंडल में चुनावी हवा का रुख किस तरह है, इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर और चंदौली की मौजूदा विधानसभा स्थिति, 2022 के चुनावी नतीजों और जातिगत गुणा-गणित को एक साथ देखना जरूरी है.
वाराणसी मंडल की चारों सीटों पर कुल 28 विधानसभा क्षेत्र हैं. इनमें वाराणसी की 8, जौनपुर की 9, गाजीपुर की 7 और चंदौली की 4 सीटें शामिल हैं. मौजूदा विधायकों के आधार पर बीजेपी और उसके सहयोगी दलों का वाराणसी में दबदबा है, जबकि गाजीपुर की सभी सात सीटें सपा गठबंधन के पास हैं. हालांकि अब ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुहलदेव राष्ट्रीय समाज पार्टी NDA में शामिल हो गई है. वहीं जौनपुर और चंदौली में दोनों पक्षों के बीच मुकाबले की अलग-अलग तस्वीर दिखाई देती है.
| जिला | कुल सीटें | मौजूदा राजनीतिक तस्वीर |
|---|---|---|
| वाराणसी | 8 | बीजेपी गठबंधन की सभी 8 सीटें |
| जौनपुर | 9 | बीजेपी गठबंधन और सपा के बीच मुकाबला |
| गाजीपुर | 7 | सपा गठबंधन की सभी 7 सीटें |
| चंदौली | 4 | बीजेपी की 3, सपा की 1 सीट |
| कुल | 28 | चार जिलों में अलग-अलग राजनीतिक समीकरण |
यह तस्वीर बताती है कि वाराणसी मंडल को किसी एक राजनीतिक ध्रुव के प्रभाव वाला क्षेत्र मानना सही नहीं होगा. यहां एक तरफ बीजेपी का मजबूत शहरी आधार है, तो दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में सपा का प्रभाव भी दिखाई देता है. 2027 में इन दोनों राजनीतिक आधारों के बीच होने वाला मुकाबला ही मंडल की चुनावी दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है.
वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है. विधानसभा के स्तर पर भी बीजेपी की स्थिति मजबूत रही है. जिले की सभी आठ सीटों पर बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के विधायक हैं. पिंडरा, अजगरा, शिवपुर, वाराणसी उत्तरी, वाराणसी दक्षिणी, वाराणसी कैंट और सेवापुरी पर बीजेपी का कब्जा है, जबकि रोहनिया से अपना दल (सोनेलाल) के डॉ. सुनील पटेल विधायक हैं.
हालांकि जिले की सभी सीटों पर मौजूदा कब्जे को 2027 की जीत की गारंटी नहीं माना जा सकता. चुनाव में उम्मीदवारों का प्रदर्शन, स्थानीय मुद्दे और विपक्ष की रणनीति नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं.
वाराणसी उत्तरी विधानसभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 1 लाख से अधिक है. वैश्य मतदाताओं की संख्या करीब 60,000, ब्राह्मण मतदाताओं की 40,000 से अधिक और दलित मतदाताओं की 35,000 से अधिक बताई गई है. इसके अलावा मौर्य और अन्य ओबीसी मतदाता भी चुनावी समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के रविंद्र जायसवाल को 1,34,471 वोट मिले थे, जो 54.61 फीसदी वोट शेयर था. सपा के अशफाक को 93,695 वोट यानी 38.05 फीसदी वोट मिले. बसपा के श्याम प्रकाश को 10,457 वोट मिले, जो 4.25 फीसदी था. इन नतीजों से साफ है कि मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी संख्या होने के बावजूद बीजेपी ने इस सीट पर मजबूत बढ़त हासिल की थी. 2027 में सपा के सामने चुनौती होगी कि वह अपने समर्थन को व्यापक सामाजिक गठजोड़ में बदल सके. वहीं बीजेपी के लिए अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराना अहम होगा.
| जातीय वर्ग | मतदाताओं की संख्या | प्रमुख समुदाय और राजनीतिक महत्व |
|---|---|---|
| उच्च जातियां (सवर्ण) | ||
| कुल | लगभग 6.5 लाख से अधिक | प्रमुख मतदाता वर्ग |
| ब्राह्मण | लगभग 3,00,000 | सवर्ण समुदाय |
| भूमिहार | लगभग 1,50,000 | सवर्ण समुदाय |
| वैश्य (बनिया) | लगभग 2,00,000 | व्यापारी समुदाय |
| राजपूत (क्षत्रिय) और कायस्थ | लगभग 1,00,000 से 1,20,000 | सवर्ण समुदाय |
| अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) | ||
| कुल | लगभग 4.5 लाख से अधिक | रोहनिया और सेवापुरी जैसी ग्रामीण सीटों पर निर्णायक |
| कुर्मी (पटेल) | लगभग 2,00,000 से अधिक | प्रमुख OBC समुदाय |
| यादव | लगभग 1,00,000 से 1,20,000 | प्रमुख OBC समुदाय |
| अन्य गैर-यादव OBC | लगभग 1.5 लाख से अधिक | मौर्य, कुशवाहा, राजभर, निषाद/मल्लाह |
| मुस्लिम समुदाय | ||
| कुल | लगभग 3,00,000 | कुल मतदाताओं का लगभग 17.9% से 20% |
| प्रमुख इलाके | वाराणसी उत्तरी और वाराणसी दक्षिणी के शहरी इलाके | |
| अनुसूचित जाति (SC/दलित) | ||
| कुल | लगभग 1.5 लाख से 2 लाख | वाराणसी लोकसभा सीट पर कुल वोटर्स का लगभग 10.3% |
| प्रमुख समुदाय | जाटव समुदाय की संख्या सबसे बड़ी है | |
वाराणसी दक्षिणी को ब्राह्मण और वैश्य बहुल पारंपरिक सीट माना जाता है. उपलब्ध अनुमान के मुताबिक, यहां लगभग 90,000 मुस्लिम और 65,000 से अधिक ब्राह्मण मतदाता हैं. वैश्य और यादव मतदाताओं की भी बड़ी संख्या बताई गई है.
2022 में बीजेपी के डॉ. नीलकंठ तिवारी को 99,416 वोट मिले, जबकि सपा के कामेश्वर या किशन दीक्षित को 88,697 वोट मिले. जीत का अंतर 10,722 वोट दर्ज किया गया है. परिणाम के मुताबिक बीजेपी के मजबूत आधार वाली सीट पर भी विपक्षी उम्मीदवार मुकाबले को नजदीक ला सकता है. 2027 में उम्मीदवारों का चयन और अलग-अलग सामाजिक समूहों का समर्थन इस सीट पर निर्णायक हो सकता है.
रोहनिया और सेवापुरी की राजनीति में पटेल यानी कुर्मी मतदाताओं को प्रभावशाली माना गया है. रोहनिया में अकेले पटेल मतदाताओं की संख्या 85,000 से अधिक है. यादव, भूमिहार और दलित मतदाता भी यहां महत्वपूर्ण हैं.
2022 में रोहनिया से बीजेपी गठबंधन के डॉ. सुनील पटेल और सेवापुरी से बीजेपी के नील रतन सिंह पटेल ‘नीलू’ विजयी रहे थे. दोनों सीटों पर मुख्य मुकाबला सपा के उम्मीदवारों से था और जीत का औसत अंतर 15,000 से 25,000 वोटों के बीच रहा.
इन दोनों सीटों पर 2027 की लड़ाई में कुर्मी मतदाताओं के साथ अन्य ओबीसी और दलित समूहों का समर्थन भी अहम होगा. बीजेपी गठबंधन के सामने अपने मौजूदा आधार को कायम रखने की चुनौती होगी, जबकि सपा को विपक्षी मतों को एकजुट करने की कोशिश करनी होगी.
जौनपुर जिले की नौ विधानसभा सीटों में बीजेपी गठबंधन और सपा के बीच मुकाबला है. बदलापुर, जौनपुर सदर और शाहगंज में बीजेपी गठबंधन के विधायक हैं. मल्हनी, मुंगराबादशाहपुर, मछलीशहर और केराकत में सपा के विधायक हैं. मड़ियाहूं में अपना दल (सोनेलाल) और जफराबाद में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के विधायक हैं.
जिले की राजनीति में ब्राह्मण, क्षत्रिय, यादव और मुस्लिम मतदाताओं के साथ दूसरे ओबीसी और वैश्य समूहों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है. यही वजह है कि यहां जातीय समीकरण किसी एक पार्टी के पक्ष में हर सीट पर समान रूप से काम नहीं करता.
जौनपुर सदर विधानसभा सीट के उपलब्ध अनुमानों के अनुसार, यहां यादव मतदाताओं की संख्या करीब 60,000, मुस्लिम मतदाताओं की 55,000 से अधिक और ब्राह्मण मतदाताओं की 45,000 से अधिक है. क्षत्रिय, मौर्य और वैश्य मतदाता भी चुनावी गणित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के गिरीश चंद्र यादव को 97,341 वोट मिले थे. सपा के अरशद खान को 89,289 वोट मिले, जबकि बसपा के सलीम खान को 26,712 वोट प्राप्त हुए. सपा यहां बीजेपी को कड़ी चुनौती देने की स्थिति में थी, लेकिन बसपा को मिले वोटों के साथ ही अलग-अलग सामाजिक समूहों के समर्थन का गणित भी चुनावी नतीजे को समझने के लिए महत्वपूर्ण है.
| जाति / समुदाय | अनुमानित प्रतिशत | कुल जिले में अनुमानित संख्या |
|---|---|---|
| अनुसूचित जाति (SC) | 22.04% | 9.90 लाख (सटीक सरकारी आंकड़ा) |
| यादव | 16% – 17% | 7.5 लाख से 8.5 लाख |
| ब्राह्मण | 13% – 14% | 6.5 लाख से 7.0 लाख |
| मुस्लिम | 10.76% | 4.83 लाख (सटीक सरकारी आंकड़ा) |
| क्षत्रिय (ठाकुर) | 10% – 11% | 5.0 लाख से 5.5 लाख |
| मौर्य / कुशवाहा | 8% – 9% | 4.0 लाख से 4.5 लाख |
| अन्य OBC व वैश्य | 15% – 17% | 7.5 लाख से 8.0 लाख |
2027 में बीजेपी के लिए अपनी जीत का आधार बचाए रखना जरूरी होगा. वहीं सपा को अपने यादव-मुस्लिम समर्थन के साथ दूसरे सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है.
मल्हनी को यादव और क्षत्रिय बहुल सीट माना जाता है. उपलब्ध जातिगत अनुमान के मुताबिक, यहां करीब 90,000 यादव और लगभग 50,000 क्षत्रिय मतदाता हैं. दलित और ब्राह्मण मतदाताओं की भी अच्छी संख्या बताई गई है.
2022 में सपा के लकी यादव को 97,357 वोट मिले थे. जेडीयू के धनंजय सिंह को 79,830 और बीजेपी के केपी सिंह को 36,110 वोट मिले. इन आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सपा उम्मीदवार को सबसे अधिक वोट मिले, जबकि धनंजय सिंह और बीजेपी उम्मीदवार के वोट अलग-अलग दर्ज हुए. आगामी चुनाव में उम्मीदवारों की स्थिति, स्थानीय समर्थन और विभिन्न जातीय समूहों के बीच बनने वाले नए समीकरण मल्हनी की लड़ाई को प्रभावित कर सकते हैं.
गाजीपुर जिले की सातों विधानसभा सीटों पर सपा गठबंधन के विधायक हैं. हालांकि जखनियां और जहूराबाद से ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुहलदेव राष्ट्रीय समाज पार्टी के विधायक हैं. ओम प्रकाश राजभर अब एनडीए का हिस्सा हैं. जबकि सैदपुर, गाजीपुर सदर, जंगीपुर, मुहम्मदाबाद और जमानियां से सपा के विधायक हैं.
यहां की राजनीति में यादव, मुस्लिम, बिंद, कुशवाहा और अन्य ओबीसी समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है. सपा गठबंधन की मौजूदा स्थिति बताती है कि वह जिले में मजबूत राजनीतिक आधार रखता है. लेकिन 2027 में इस बढ़त को बनाए रखने के लिए उसे अपने सामाजिक गठजोड़ और स्थानीय नेतृत्व की पकड़ को कायम रखना होगा.
जहूराबाद में सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर का राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण है. उपलब्ध जातिगत अनुमानों के मुताबिक, यहां राजभर मतदाताओं की संख्या लगभग 70,000 और यादव मतदाताओं की 55,000 से अधिक है. दलित मतदाता भी चुनावी समीकरण में अहम माने जाते हैं.
2022 में ओम प्रकाश राजभर ने सपा गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में 1,14,860 वोट हासिल किए थे. बीजेपी के कालीचरण राजभर को 69,228 वोट मिले, जबकि बसपा की सैयदा शादाब फातिमा को 52,042 वोट प्राप्त हुए.
यहां 2027 की लड़ाई में गठबंधन की स्थिति खास महत्व रखेगी. ओम प्रकाश राजभर की पार्टी का चुनावी गठबंधन और राजभर मतदाताओं के बीच उसका प्रभाव नतीजों को प्रभावित कर सकता है. इसके साथ ही यादव और दलित मतदाताओं का रुख भी निर्णायक होगा.
| जाति / समुदाय | अनुमानित प्रतिशत | जिले में अनुमानित जनसंख्या |
|---|---|---|
| अनुसूचित जाति (SC) | 20.07% | 7.5 लाख से 8.0 लाख (आधिकारिक आधार) |
| यादव | 14% – 15% | 5.5 लाख से 6.0 लाख |
| मुस्लिम | 10.17% – 12.5% | 4.5 लाख से 5.0 लाख |
| राजपूत और भूमिहार | 9% – 10% | 3.5 लाख से 4.0 लाख |
| कुशवाहा / मौर्य | 7% – 8% | 2.5 लाख से 3.0 लाख |
| ब्राह्मण व वैश्य | 7% – 8% | 2.5 लाख से 3.0 लाख |
| अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) | 15% – 17% | 6.0 लाख से 7.0 लाख |
मुहम्मदाबाद को मुख्तार अंसारी के परिवार का पारंपरिक गढ़ माना जाता है. उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक, यहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 70,000 से अधिक और यादव मतदाताओं की 60,000 से अधिक है. भूमिहार मतदाताओं की भी अहम भूमिका बता जाती है.
2022 में सपा के सुहैब उर्फ मन्नू अंसारी को 1,21,114 वोट मिले थे, जबकि बीजेपी की अलका राय को 81,145 वोट प्राप्त हुए.
इन नतीजों से सपा की मजबूत स्थिति सामने आती है. हालांकि, 2027 में भी यही अंतर बना रहेगा, यह अभी तय नहीं है. चुनाव में उम्मीदवारों की स्वीकार्यता, स्थानीय मुद्दे और विभिन्न सामाजिक समूहों का समर्थन परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं.
चंदौली की चार विधानसभा सीटों में मुगलसराय, सैयदराजा और चकिया पर बीजेपी का कब्जा है, जबकि सकलडीहा से सपा के प्रभु नारायण यादव विधायक हैं.
जिले की राजनीति में ठाकुर, ब्राह्मण और वैश्य मतदाताओं का प्रभाव महत्वपूर्ण माना गया है. इसके साथ यादव और दूसरे सामाजिक समूह भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं. हालांकि, केवल किसी जाति की अनुमानित आबादी के आधार पर किसी पार्टी की जीत तय नहीं की जा सकती.
मुगलसराय को जिले की प्रमुख व्यावसायिक और शहरी प्रभाव वाली सीट माना जाता है. उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक, यहां ठाकुर मतदाताओं की संख्या लगभग 35,000 से 38,000, ब्राह्मण मतदाताओं की 28,000 से 30,000 और बनिया मतदाताओं की 25,000 से 28,000 है.
2022 में बीजेपी के रमेश जायसवाल को 1,02,154 वोट मिले थे, जबकि सपा के चंद्रशेखर यादव को 87,204 वोट प्राप्त हुए. बीजेपी की जीत में उसका परंपरागत समर्थन महत्वपूर्ण रहा है. 2027 में पार्टी के सामने इस आधार को बचाए रखने की चुनौती होगी, जबकि सपा को अपने समर्थन का दायरा बढ़ाना होगा.
सकलडीहा कृषि प्रधान और ग्रामीण क्षेत्र है. उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक, यहां ठाकुर मतदाताओं की संख्या लगभग 35,000 से 37,000, ब्राह्मण मतदाताओं की 29,000 से 30,000 और वैश्य मतदाताओं की 15,000 से 18,000 है.
यहां ठाकुर और ब्राह्मण मतदाताओं के साथ यादव और दलित मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. मौजूदा विधायक सपा के प्रभु नारायण यादव हैं. ऐसे में बीजेपी के लिए यह सीट हासिल करना और सपा के लिए अपना कब्जा बनाए रखना, दोनों ही चुनावी चुनौती होंगे.
| जाति / समुदाय | लोकसभा में अनुमानित मतदाता संख्या |
|---|---|
| यादव | लगभग 2.75 लाख |
| अनुसूचित जाति (SC/दलित) | लगभग 2.60 लाख |
| मौर्य / कुशवाहा | लगभग 1.75 लाख |
| ब्राह्मण | लगभग 1.30 लाख से अधिक |
| क्षत्रिय (ठाकुर) | लगभग 1.15 लाख से अधिक |
| मुस्लिम | लगभग 1.10 लाख के आसपास |
| अन्य OBC (राजभर, बिंद, कुर्मी आदि) | लगभग 2.0 लाख से अधिक |
सैयदराजा में ठाकुर मतदाताओं की संख्या लगभग 42,000 से 45,000, ब्राह्मण मतदाताओं की 20,000 से 22,000 और वैश्य मतदाताओं की 15,000 से 16,000 है. वर्तमान विधायक बीजेपी के सुशील सिंह हैं. यहां ठाकुर मतदाताओं की बड़ी संख्या और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव को अहम माना जाता है.
चकिया अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीट है. उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक, यहां ठाकुर मतदाताओं की संख्या लगभग 20,000 से 22,000, ब्राह्मण मतदाताओं की 25,000 से 28,000 और वैश्य मतदाताओं की 10,000 से 12,000 है. वर्तमान विधायक बीजेपी के कैलाश खरवार हैं.
आरक्षित सीट होने के कारण उम्मीदवार अनुसूचित जाति से होते हैं, लेकिन अन्य सामाजिक समूहों का समर्थन भी चुनावी नतीजों में भूमिका निभा सकता है. ऐसे में 2027 में बीजेपी को अपना मौजूदा समर्थन बनाए रखना होगा, जबकि सपा को जीत के लिए व्यापक सामाजिक समर्थन जुटाने की जरूरत होगी.
वाराणसी मंडल के उपलब्ध आंकड़ों को देखने पर तीन प्रमुख राजनीतिक तस्वीरें उभरती हैं.
वाराणसी:
वाराणसी की शहरी सीटों पर बीजेपी का मजबूत आधार है. वाराणसी उत्तरी में 2022 का 54.61 फीसदी वोट शेयर और वाराणसी दक्षिणी में जीत के बावजूद अपेक्षाकृत कम अंतर यह दिखाता है कि जिले की अलग-अलग सीटों पर मुकाबले की प्रकृति अलग हो सकती है.
जौनपुर और गाजीपुर:
जौनपुर और गाजीपुर में यादव-मुस्लिम समीकरण के साथ दूसरे ओबीसी समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण है. जौनपुर में बीजेपी और सपा के बीच कई सीटों पर मुकाबला दिखाई देता है, जबकि गाजीपुर में सपा गठबंधन की सभी सात सीटों पर मौजूदा पकड़ उसे मजबूत स्थिति में रखती है.
चंदौली:
चंदौली में सवर्ण और वैश्य मतदाताओं के साथ ग्रामीण सामाजिक समीकरण भी अहम हैं. मुगलसराय और सैयदराजा में बीजेपी की स्थिति मजबूत रही है, जबकि सकलडीहा में सपा ने अपनी पकड़ बनाए रखी है. चकिया में आरक्षित सीट का समीकरण अलग तरह की राजनीतिक चुनौती पेश करता है.
वाराणसी मंडल में 2027 की चुनावी बिसात पर बीजेपी और सपा गठबंधन के सामने अलग-अलग चुनौतियां होंगी. बीजेपी के लिए वाराणसी में अपना मजबूत आधार बचाए रखना, जौनपुर में विपक्ष की चुनौती का सामना करना और गाजीपुर में अपनी स्थिति सुधारना अहम होगा. चंदौली में भी उसे अपनी तीन मौजूदा सीटों को बचाने के साथ सकलडीहा में मुकाबले की तैयारी करनी होगी.
दूसरी ओर, सपा के लिए गाजीपुर में सभी सात सीटों पर अपना कब्जा कायम रखना, जौनपुर में अपनी मौजूदा सीटों की रक्षा करना और वाराणसी तथा चंदौली में अपनी स्थिति मजबूत करना बड़ी चुनौती होगी. गठबंधन के सहयोगी दलों की भूमिका भी खास होगी, क्योंकि वाराणसी मंडल की कुछ सीटों पर अपना दल (सोनेलाल), सुभासपा और निषाद पार्टी जैसे दल चुनावी समीकरण का हिस्सा हैं.
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कुल मिलाकर वाराणसी मंडल में 2027 की लड़ाई केवल बीजेपी बनाम सपा नहीं होगी, बल्कि सामाजिक समर्थन, स्थानीय नेतृत्व और गठबंधन के तालमेल की भी परीक्षा होगी. मौजूदा विधायकों की स्थिति और 2022 के नतीजे शुरुआती तस्वीर जरूर दिखाते हैं, लेकिन अंतिम चुनावी गणित इस बात से तय होगा कि कौन-सी पार्टी अपने मौजूदा समर्थकों को मतदान तक साथ रख पाती है और कौन नए समूहों को अपने पक्ष में जोड़ पाती है.
-भारत एक्सप्रेस
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