भारत स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा था, तब 1940 के दशक के अंत में, खासकर 1947 में, ईरान के कुछ अखबारों और लोगों ने एक दिलचस्प विचार को बढ़ावा दिया – भारत में बसे पारसी समुदाय को उनके ‘पितृभूमि’ ईरान वापस लाने का. पारसी ज़ोरोएस्ट्रियन धर्म के अनुयायी हैं, जो 7वीं शताब्दी में अरब विजय के बाद धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए फारस (आधुनिक ईरान) से भारत आए थे. वे मुख्य रूप से गुजरात में बसे और सदियों में भारत के साथ गहरा जुड़ाव बना लिया.
जून 1947 में, जब भारत आजादी के कगार पर था, ईरान के अखबारों में लेख छपने लगे कि पारसी बड़े पैमाने पर भारत छोड़कर ईरान आ सकते हैं. इसे यहूदियों के फिलिस्तीन वापसी से जोड़कर देखा गया. ईरान में बसे दो ज़ोरोएस्ट्रियन – जहांगीरशॉ बैधनीवाला (जे. बदनी, जो 1920 के दशक से ईरान में रह रहे थे और ईरान लीग ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि थे) और अरबाब जमशेद सोहेल – ने इस विचार को आगे बढ़ाया.
बदनी 1946 में भारत आए थे और पारसियों को ईरान में बसने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश की. उन्होंने शिराज और इस्फहान जैसे शहरों में बसावट के लिए जगहों की तलाश का प्रस्ताव रखा. ईरान के प्रधानमंत्री अहमद कवाम ने भी लौटने वाले पारसियों को अन्य ईरानी नागरिकों के समान अधिकार देने का आश्वासन दिया.
ईरान का मुख्य आकर्षण पारसियों की ‘फारसी मूल’ से ज्यादा उनकी पूंजी और व्यावसायिक क्षमता था. ब्रिटिश दूतावास के अधिकारी जी.ए. नकवी ने रिपोर्ट में लिखा कि “ईरानियों का पारसियों के प्रति आकर्षण उनकी फारसी उत्पत्ति से ज्यादा उनकी पूंजी है. उम्मीद है कि अगर पारसी ईरान आएंगे तो काफी भारतीय पूंजी भी आएगी.” ईरानी अखबारों जैसे ‘मेहर’ ने लिखा कि अब समय आ गया है कि पारसी वापस लौटें और ईरानी राष्ट्र उन्हें सम्मान देगा.
भारत में इस प्रस्ताव को लेकर पारसी समुदाय में कोई उत्साह नहीं था. खुफिया ब्यूरो की रिपोर्ट में साफ कहा गया कि “भारतीय पारसियों के ईरान जाने का कोई प्रस्तावित योजना यहां मौजूद नहीं है और न ही कोई सोच रहा है.” पारसी सदियों से भारत में बसे हैं, उनके हित यहां जुड़े हैं. वे अल्पसंख्यक हैं, अपनी सांप्रदायिक पहचान के प्रति बहुत संवेदनशील हैं और इस्लामी देश में जाकर अतीत के कड़वे अनुभवों को जोखिम में नहीं डालना चाहते.
भारतीय नौकरशाही में भी इसकी वजह से बेचैनी फैली. विदेश विभाग ने बदनी की जांच कराई. रमेश्वर नाथ काओ (जो बाद में भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के संस्थापक बने) ने इसकी निगरानी की. बॉम्बे के एक अधिकारी ने अक्टूबर 1947 में रिपोर्ट दी कि ईरानी प्रचार सिर्फ प्रतिभा और पूंजी आकर्षित करने के लिए है, लेकिन पारसी भारत नहीं छोड़ेंगे.
स्वतंत्र भारत में पारसी समुदाय राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देता रहा और आज भी उनकी भारत के प्रति निष्ठा प्रसिद्ध है. यह प्रस्ताव एक ऐतिहासिक उत्सुकता बनकर रह गया, जो कभी हकीकत नहीं बन सका.
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-भारत एक्सप्रेस
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