भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो क्रांति की ज्वाला को जीवित रखते हैं. इनमें से एक हैं बैकुंठ शुक्ल. 14 मई 1934 को गया सेंट्रल जेल में फांसी पर चढ़ने वाले इस युवा क्रांतिकारी ने न केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया, बल्कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत का सीधा बदला लेकर क्रांतिकारी आंदोलन की गरिमा को बरकरार रखा.
बैकुंठ शुक्ल का जन्म 15 मई 1907 (कुछ स्रोतों में 1910) को बिहार के वैशाली जिले के जलालपुर गांव में हुआ था. वे प्रसिद्ध क्रांतिकारी योगेंद्र शुक्ल के भतीजे थे. शिक्षक के रूप में कार्यरत बैकुंठ का संपर्क किशोरी प्रसन्न सिंह और सुनीति देवी के माध्यम से हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के क्रांतिकारियों भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे आदि से हुआ. गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से शुरू हुई उनकी यात्रा जल्द ही सशस्त्र क्रांति की राह पर मुड़ गई.
1930 के लाहौर षड्यंत्र मामले में फणींद्र नाथ घोष HSRA का केन्द्रीय कमिटी सदस्य था, लेकिन गिरफ्तारी के बाद सरकारी गवाह बन गया. उसकी गवाही के कारण भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी हुई. इस गद्दारी ने बिहार समेत पूरे क्रांतिकारी दल पर कलंक लगा दिया.
1932 में पंजाब के क्रांतिकारियों के संदेश के बाद बिहार के क्रांतिकारियों ने फैसला किया कि इस कलंक को धोना होगा. बैठक में लॉटरी निकाली गई और बैकुंठ शुक्ल का नाम आया. 9 नवंबर 1932 को बेतिया के मीना बाजार में बैकुंठ शुक्ल और चंद्रमा सिंह ने फणींद्र नाथ घोष को दिनदहाड़े kukri knife से गोली/प्रहार कर मार गिराया.
ये कार्रवाई क्रांतिकारियों के बीच न्याय और बदले की भावना का प्रतीक बन गई.
6 जुलाई 1933 को सोनपुर में गिरफ्तार किए गए बैकुंठ शुक्ल को फांसी की सजा सुनाई गई. गया जेल में वे अंतिम दिनों तक अटूट साहस दिखाते रहे. फांसी के दिन उनका चेहरा गुलाब की तरह खिल रहा था. उन्होंने वंदे मातरम् गाते हुए और ‘मैं फिर आऊंगा, देश तो आजाद नहीं हुआ’ कहते हुए फांसी स्वीकार की. जल्लाद भी थर्रा गया था; बैकुंठ शुक्ल ने खुद चिल्लाकर कहा कि ‘देर क्यों करते हो?’ उनकी अंतिम इच्छा बाल विवाह जैसी कुरीतियों को मिटाने की थी.
बैकुंठ शुक्ल की वीरता को कई किताबों में दर्ज किया गया है. सबसे प्रमुख प्रामाणिक कार्य N.K. Shukla की The Trial of Baikunth Sukul: A Revolutionary Patriot है, जो उनके मुकदमे की कार्यवाही पर आधारित है.
इसके अलावा, हाल के वर्षों में उनकी कहानी को व्यापक पाठकों तक पहुंचाने वाली महत्वपूर्ण पुस्तक है अभिजीत भालेराव (Abhijeet Bhalerao) की “The Man Who Avenged Bhagat Singh”
ये किताब बैकुंठ शुक्ल की जिंदगी पर आधारित ऐतिहासिक फिक्शन है, जिसमें उनके साहस, भगत सिंह के प्रति निष्ठा और फणींद्र नाथ घोष की हत्या की घटना को रोमांचक ढंग से चित्रित किया गया है. पुस्तक का प्रोलॉग ही फणींद्र घोष की हत्या के ग्राफिक वर्णन से शुरू होता है. लेखक अभिजीत भालेराव ने गहन शोध के साथ इस वीर क्रांतिकारी की कहानी को जीवंत किया है, जो युवा पीढ़ी को आकर्षित करती है.
आजादी के बाद बैकुंठ शुक्ल जैसे क्रांतिकारियों को अपेक्षाकृत कम याद किया गया, लेकिन उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता सिर्फ सत्ता हस्तांतरण नहीं, बल्कि शोषण-मुक्त समाज की स्थापना थी.
ये भी पढ़ें:वो काल्पनिक शहर जिसने करोड़ों भारतीयों को अपनापन सिखाया, जानें आर.के. नारायण के ‘स्वामी’ की अनकही कहानी
-भारत एक्सप्रेस
काशी मराठा समाज द्वारा आयोजित गणेश महोत्सव 2026 में प्रदीप नारायण सिंह को समाज सेवा…
वैश्विक और घरेलू बाजारों में सोने-चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव का दौर बना हुआ है.…
जापान के पास उन्नत परमाणु ऊर्जा और औद्योगिक क्षमताएं हैं, लेकिन वह आधिकारिक रूप से…
IND vs AFG तीसरे T20I में 30 गेंदों में शतक लगाने के बाद अभिषेक शर्मा…
बड़े पर्दे पर उतरी 'मिर्जापुर- द मूवी' ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए…
Arif Aajakia On Pakistan In UN: कराची के पूर्व मेयर आरिफ आजकिया ने पाकिस्तान को…