डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी लड़ाकू विमान
Diego Garcia UK US Issue: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हिंद महासागर में मौजूद डिएगो गार्सिया द्वीप के मुद्दे पर ब्रिटेन पर भड़ास निकाली है. ट्रंप ने ब्रिटेन की डिएगो गार्सिया द्वीप को मॉरीशस को सौंपने की योजना को ‘बड़ी मूर्खता’ करार दिया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा- ब्रिटेन को ऐसा नहीं करना चाहिए. यह द्वीप अमेरिकी सेना के लिए बहुत अहम है, यदि हम वहां से हटे तो चीन और रूस का दबदबा बढ़ जाएगा. जो कि सिर्फ ताकत को मानते हैं.
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर 20 जनवरी 2026 को कहा कि यह घटना ग्रीनलैंड को अमेरिका द्वारा खरीदने की जरूरत को और पक्का करती है. ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच 2025 में हुआ समझौता द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को देता है, लेकिन साथ ही यह ठिकाना 99 साल तक ब्रिटेन-अमेरिका के कंट्रोल में रहेगा.
ट्रंप का हालिया बयान अमेरिका की पिछली सरकार ‘बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन’ के रूख से अलग है, जिसने इस समझौते को ऐतिहासिक बताया था. एएनआई न्यूज के मुताबिक, ट्रंप ने ब्रिटेन को अपने NATO सहयोगी होने पर भी नहीं बख्शा. ब्रिटिश सरकार कहती है कि डिएगो गार्सिया को लेकर उनका मॉरीशस से समझौता हुआ था, यह समझौता अमेरिका-ब्रिटेन के सैन्य अड्डे को सुरक्षित रखता है और 99 साल के बाद इसे रिन्यू किया जा सकता है. मॉरीशस को ब्रिटेन 3.4 बिलियन पाउंड देगा. लेकिन ट्रंप का मानना है कि यह कमजोरी दिखाता है.
डिएगो गार्सिया हिंद महासागर के बीच में चागोस द्वीपसमूह का सबसे बड़ा द्वीप है. 1970 के दशक से यह ब्रिटेन और अमेरिका का संयुक्त सैन्य अड्डा है. यहां से अमेरिका ने गल्फ वॉर, इराक और अफगानिस्तान युद्धों में ऑपरेशन चलाए. हाल ही में यमन में हूती विद्रोहियों पर हमले भी यहीं से हुए. यह सैन्य अड्डा परमाणु पनडुब्बियों को लोड करने, विमान वाहकों को डॉक करने और रणनीतिक बॉम्बर्स को बेस देने की सुविधा देता है.
न्यूजवीक के अनुसार, यह मध्य पूर्व, अफ्रीका और दक्षिण एशिया में अमेरिकी ऑपरेशंस के लिए महत्वपूर्ण है.
डिएगो गार्सिया द्वीप पर अमेरिका का सैन्य ठिकाना होना भारत के लिए भी चिंता का सबब है, क्योंकि यह भारत से महज 1,796 किमी (1,116 मील) दक्षिण-पश्चिम में है. यह मालदीव से 726 किमी दक्षिण, तंजानिया से 3,535 किमी पूर्व और मॉरीशस से 2,112 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है.
विशेषज्ञों का कहना है कि हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया द्वीप पर अमेरिका की मौजूदगी चीन से होने वाले खतरों से निपटने के लिए है. चीन की मॉरीशस से बढ़ती नजदीकी अमेरिका और भारत दोनों के लिए ठीक नहीं है, ऐसे में ट्रंप डिएगो गार्सिया को हमेशा के लिए अमेरिकी सैन्य ठिकाना बनाना चाहते हैं. चीन मॉरीशस के साथ व्यापार बढ़ा रहा है और संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं, मॉरीशस का भारत से भी पुराना नाता रहा है.
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने पूछा कि क्या अमेरिका-ब्रिटेन की डिएगो गार्सिया पर मौजूदगी भारत के लिए खतरनाक है? इस पर एक एक्सपर्ट ने कहा- यह जरूरी नहीं. बल्कि यह सैन्य अड्डा इंडो-पैसिफिक में चीन की बढ़ती नौसेना को रोकने में मदद करता है. फॉरेन पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट कहता है कि यह अमेरिका को रणनीतिक गहराई देता है और भारत के हितों की रक्षा करता है.
भारत और अमेरिका के बीच मजबूत साझेदारी है, जैसे- क्वाड. लेकिन कुछ चिंताएं हैं. अगर मॉरीशस चीन के प्रभाव में आया, तो बाहरी द्वीपों पर चीनी गतिविधियां बढ़ सकती हैं. ब्रिटेन कहता है कि समझौते में विदेशी सुरक्षा बलों पर सख्त प्रतिबंध है और ब्रिटेन को वीटो पावर भी हासिल है.
क्या अमेरिका इस अड्डे से भारत की जासूसी करता है? पुरानी रिपोर्ट्स में ऐसे आरोप लगे हैं. 2019 में पेंटागन ने भारत के ASAT मिसाइल टेस्ट पर जासूसी से इनकार किया. लेकिन ECHELON प्रोग्राम में डिएगो गार्सिया को स्पाई स्टेशन के रूप में मेंशन किया गया है, जो 5-आइज देशों का हिस्सा है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि देश दोस्तों पर भी जासूसी करते हैं. हालांकि, भारत पर स्पष्ट आरोपों का सबूत नहीं मिला. डॉन न्यूजपेपर में कहा गया कि यह अड्डा पश्चिम एशिया ऑपरेशंस और कम्युनिकेशन के लिए इस्तेमाल होता है.
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