Mamata SC Caveat Petition: पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के बाद से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. ममता सरकार और ईडी के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. इस बीच प्रवर्तन निदेशालय ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, लेकिन उससे पहले ही ममता सरकार (Mamata Banerjee) ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट याचिका दाखिल कर दी है. इसके बाद से कैविएट याचिका को लेकर चर्चा तेज हो गई है. आखिर कैविएट याचिका क्या होती है और यह ममता सरकार के लिए कैसे मददगार साबित हो सकती है, जानिए
कैविएट एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ ‘सावधान’ है और यह सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 148A के तहत दायर होती है, जो 90 दिनों के लिए वैध होती है. कैविएट याचिका (Caveat Petition) एक कानूनी उपाय है जिसमें कोई व्यक्ति अदालत से पहले ही यह अनुरोध करता है कि उसके खिलाफ कोई अंतरिम आदेश (जैसे स्टे ऑर्डर) पारित करने से पहले उसे सूचित किया जाए और उसकी सुनवाई का मौका दिया जाए, ताकि उसके खिलाफ एकतरफा फैसला न हो सके.
पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट याचिका दायर की है. दायर कैविएट में ममता सरकार की मांग है कि अगर ईडी, आईपीएसी छापेमारी के मामले में उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जाती है, तो राज्य सरकार का बिना पक्ष सुने सुप्रीम कोर्ट एक तरफा फैसला न दे.
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुरुवार (8 जनवरी) को बंगाल की राजधानी कोलकता में धनशोधन मामले को लेकर पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के दफ्तर पर छापेमारी की. यह मामला तब और तुल पकड़ लिया जब ED ने यह आरोप लगया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद वहां पहुंचीं और कुछ जरूरी दस्तावेज लेकर I-PAC के दफ्तर से चली गईं.
इसी के साथ, मामला कोलकता हाईकोर्ट भी पहुंच गया है. ED ने अपनी याचिका में दावा किया कि ये छापे ‘बंगाल कोयला खनन’ घोटाले से जुड़े थे और ममता पर आधिकारिक जांच में ‘बाधा डालने’ का आरोप लगाया है. TMC ने हाईकोर्ट से ED की कार्रवाई को गैर-कानूनी घोषित करने और पार्टी के सभी गोपनीय दस्तावेज तुरंत वापस करने के निर्देश देने की मांग की.
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शुक्रवार (9 जनवरी) को TMC और ED से जुड़े इस मामले की सुनवाई में भीड़ ज़्यादा होने की वजह से अफरा-तफरी मच गई. ऐसे में हाई कोर्ट ने 14 जनवरी तक के लिए सुनवाई टाल दी गई. जस्टिस शुभ्रा घोष के केस से जुड़े लोगों को छोड़कर बाकी लोगों से बाहर जाने के अनुरोध के बावजूद कोर्टरूम वकीलों से खचाखच भरा हुआ था. तनाव बढ़ने पर, जज ने हंगामे वाली स्थिति का हवाला देते हुए बिना सुनवाई किए ही कोर्टरूम छोड़ दिया.
-भारत एक्सप्रेस
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