सुप्रीम कोर्ट के 75 वर्षों की पर्यावरणीय न्याय यात्रा को लेकर जानेमाने वकील सुधीर मिश्रा द्वारा लिखी गई किताब ” Climate Justice -75 Years Of Supreme Court” का एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने विमोचन किया गया. इस दौरान मुख्य वक्ताओं द्वारा बताया गया है आखिर क्यों पर्यावरण को बचाना है. क्यों पेड़ लगाना चाहिए.
इस दौरान लेखक सुधीर मिश्रा के अलावे मुख्य अतिथि एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा, भारतीय जनता पार्टी के राज्य सभा सदस्य सुजीत कुमार और सोसाइटी ऑफ इंडियन लॉ फोरम के अध्यक्ष डॉक्टर ललित भसीन शामिल थे. यह किताब 1950 के दशक से लेकर वर्ष 2025 तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए 75 महत्वपूर्ण फैसलों का सरल भाषा में विश्लेषण किया गया है, और उनकी वर्तमान प्रासंगिकता को भी रेखांकित करती है.
यह पुस्तक दर्शाती है कि कैसे न्यायपालिका ने परिस्थितिक संतुलन, सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण को शामिल करते हुए जीवन और गरिमा के अर्थ का क्रमिक विस्तार, साथ ही संवैधानिक आदर्शों और उनके क्रियान्वयन की वास्तविकताओं के बीच निरंतर अंतर को उजागर किया है. सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसले एक आवश्यक गैर-मानव केंद्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जो वनों, नदियों, वन्यजीवों और परिस्थितिक तंत्रों को मात्र मानवीय उपयोगिता से परे मूल्य प्रदान करते है.
भारतीय पर्यावरण न्याय शास्त्र में एक स्पष्ट प्रतिरूप उभरता है. न्यायपालिका ने संवैधानिक संतुलन बनाए रखने की सतर्कता से शुरुआत करते हुए पर्यावरण शासन के एक सशक्त संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका विकसित की. 1950 और 1960 के दशक में, अदालत मुख्य रूप से सार्वजनिक व्यवस्था, स्वच्छता और प्रशासनिक निष्पक्षता के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरणीय मुद्दों का समाधान करते थे. 1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक तक अनुच्छेद 21 पर्यावरणीय अधिकारों का संवैधानिक आधार बन गया, जिससे न्यायालयों को जीवन के अधिकार की पुनर्व्याख्या करने का अधिकार मिला. जिसमें गरिमा, स्वास्थ्य, स्वच्छ वायु, जल और पारिस्थितिक संतुलन शामिल हैं. 1980 के दशक से न्यायपालिका ने न्यायिक सक्रियता को तेजी से अपनाया, विशेष रूप से जनहित याचिकाओं के माध्यम से. उन मामलों में हस्तक्षेप करते हुए जहां कार्यपालिका एजेंसियां प्रदूषण, औधोगिक खतरों, वनों की कटाई, खनन और शहरी गिरावट को नियंत्रित करने में विफल रहीं.
एमसी मेहता बनाम भारत संघ से संबंधित मामले इस बदलाव के प्रतीक बन गए, जिसमें अदालत ने विवाद समाधान से आगे बढ़कर निरंतर पर्यावरणीय निगरानी और नीति प्रवर्तन की ओर कदम बढ़ाया. 1990 और 2000 के दशकों के दौरान न्यायालय ने सतत विकास, एहतियाती सिद्धांत, प्रदूषणकारी भुगतान, अन्तरपीढ़िगत समानता और सार्वजनिक विश्वास सिद्धांत जैसे पर्यावरणीय सिद्धांतो को दृढ़ता से संवैधानिक दर्जा दिया. साथ ही नौकरशाही की सुस्ती, राजनीतिक प्रतिरोध, कमजोर नियामक संस्थाओं और अनियमित प्रवर्तन के कारण कई फैसले ठीक से लागू नहीं हो पाए हैं.
अंततः इन दशकों के स्वरूप एक ऐसी न्यायपालिका को दर्शाता है जिसने भारत की पर्यावरणीय चेतना को गहराई से आकार दिया है.लेकिन भविष्य की चुनौती यह सुनिश्चित करने में निहित है कि संवैधानिक पर्यावरणवाद को न केवल निर्णयों में घोषित किया जाए, बल्कि शासन में प्रभावी ढंग से साकार भी किया जाए.
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-भारत एक्सप्रेस
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