प्रेसीडेंशियल रेफरेंस को लेकर दायर याचिकाओं पर 10 सितंबर को भी सुनवाई जारी रहेगा. संविधान पीठ ने 8 वें दिन की सुनवाई पूरी कर ली है. सुनवाई के दौरान कर्नाटक, केरल और पंजाब सरकार ने अपना पक्ष रखा है. मामले की सुनवाई के दौरान कर्नाटक सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने कोर्ट को बताया कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत, राष्ट्रपति और राज्यपाल नाममात्र के प्रमुख है. उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों जगह मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करने के लिए बाध्य है.
कर्नाटक सरकार ने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपाल को किसी भी आपराधिक कार्रवाई से छूट प्रदान करता है, क्योंकि वो कोई कार्यकारी काम नही करते है. कर्नाटक सरकार ने यह भी कहा कि परम संप्रभुता जनता के पास है, संसदीय लोकतंत्र सामूहिकता की अभिव्यक्ति है, जो विधायिका के मध्यम से अभियक्ति होती है. कार्यपालिका विधायिका से निकलती है और उसके प्रति उत्तरदायी होती है.
कर्नाटक सरकार ने यह भी कहा कि इस सिद्धांत का अनुच्छेद 200 की संवैधानिक व्याख्या पर सीधा प्रभाव पड़ता है, जो राज्य विधेयकों को स्वीकृति देने की राज्यपाल की शक्ति से संबंधित है. उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति द्वारा किए जाने वाले कार्य चाहे संघ के हों या राष्ट्रपति के व्यक्तिगत इसका निर्धारण राष्ट्रपति की संतुष्टि से नहीं बल्कि मंत्रिमंडल की संतुष्टि से होता है. उन्होंने यह भी कहा कि संसदीय लोकतंत्र में वास्तविक शक्ति का वास्तविक भंडार विधानमंडल है, जो जनता के प्रतिनिधि के रूप में अपनी भूमिका निभाता है. वही सुनवाई के दौरान सीजेआई बी आर गवई ने गोपाल सुब्रमण्यम से पूछा कि क्या सीआरपीएफ की धारा 197 के तहत जो लोकसेवको पर मुकदमा चलाने के लिए पूर्व मंजूरी से संबंधित है. सरकार को मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना पड़ता है.
पिछली सुनवाई में पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि विधेयक के रूप में जनता की इच्छा राज्यपालों और राष्ट्रपति की मनमर्जी के अधीन नहीं हो सकती. पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा था कि राज्यपाल संप्रभु की इच्छा पर सवाल नहीं उठा सकते हैं और ना ही विधानसभा द्वारा पारित विधेयक की विधायी क्षमता की जांच कर सकते है, यह अदालत का अधिकार क्षेत्र है. वही केरल सरकार की ओर से पेश पूर्व अटॉर्नी जनरल और वरिष्ठ वकील के के वेणुगोपाल ने कहा कि राज्यपालों को विधेयकों पर जितनी जल्दी हो सके कार्यवाही करनी चाहिए, न कि अपने सुविधानुसार.
अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास पांच विकल्प है. राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयक का आरक्षण, धन विधेयकों से निपटना, विधेयकों को स्वीकृति प्रदान करना, सुझावों के साथ विधेयकों को राज्य विधानमंडल को वापस भेजना और सहमति न देना.
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-भारत एक्सप्रेस
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