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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘Ex Post Facto’ पर्यावरण मंजूरी पर लगे बैन की होगी समीक्षा, CJI बोले- जनहित में संतुलन जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंजूरी (EC) से संबंधित एक महत्वपूर्ण फैसले की समीक्षा करने को ‘अनिवार्य, ज़रूरी और उचित’ माना है, जिससे देश भर में निर्माण और औद्योगिक परियोजनाओं को बड़ी राहत मिल सकती है. यह फैसला मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनाया. पीठ ने पूर्व के एक फैसले (जिसे ‘JUR’ कहा गया) की समीक्षा करने का मार्ग प्रशस्त किया, जिसने ‘Ex Post Facto’ पर्यावरण मंजूरी (यानी काम शुरू होने के बाद मंजूरी) देने वाली 2017 की अधिसूचना और 2021 के कार्यालय ज्ञापन (OM) को पूरी तरह से अवैध घोषित कर दिया था.

CJI ने अपने अवलोकन में कहा कि अदालत को पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन पर सख़्ती बरतने के साथ ही ‘जमीनी हकीकत’ और ‘जनहित’ के बीच संतुलन बनाना होगा. उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि पूर्व के फैसले के तहत, जिन परियोजनाओं में भारी सार्वजनिक धन खर्च हो चुका है, उन्हें भी ध्वस्त करना पड़ सकता है, जिसका देश की अर्थव्यवस्था और जन कल्याण पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा. इस रिव्यू पिटीशन पर मुख्य रूप से कॉन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स ऑफ इंडिया (CREDAI), भारतीय इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड (SAIL) और कर्नाटक राज्य ने गुहार लगाई थी.

CJI के शब्दों का सार यह है कि नियामक शासन को ‘जमीनी हकीकत’ और समाज की ‘विकसित होती वास्तविकताओं’ को ध्यान में रखना होगा, और एक सख़्त दृष्टिकोण के ‘सकल परिणामों’ को टालने का प्रयास करना चाहिए.

‘एक्स पोस्ट फैक्टो’ EC पर क्या था पुराना फैसला?

यह पूरा मामला ‘वनशक्ति बनाम भारत संघ’ केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक पुराने फैसले (‘JUR’) से उपजा है. इस फैसले में, कोर्ट ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत जारी 2017 की अधिसूचना और 2021 के OM को रद्द कर दिया था, जिसके तहत उन परियोजनाओं को एक निश्चित प्रक्रिया के माध्यम से एक्स पोस्ट फैक्टो EC दी जा सकती थी जिन्होंने बिना मंजूरी के काम शुरू कर दिया था.

पुराने फैसले में इस बात पर जोर दिया गया था कि पर्यावरण न्यायशास्त्र (Environmental Jurisprudence) में काम शुरू होने के बाद मंजूरी देने की कोई अवधारणा नहीं है. इस फैसले से, न केवल भविष्य में एक्स पोस्ट फैक्टो EC देने पर रोक लगी, बल्कि कई लंबित और पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं के भविष्य पर भी सवालिया निशान लग गया. रिव्यू याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि यह फैसला देश की अदालतों द्वारा पूर्व में दिए गए कई फैसलों (D. Swamy और Pahwa Plastics जैसे) और पर्यावरण कानून के तहत केंद्र सरकार को मिली नियामक शक्ति को पूरी तरह से ध्यान में रखने में विफल रहा.

CJI के सामने परियोजनाओं की दुर्दशा और भारी नुकसान का मुद्दा

रिव्यू याचिकाकर्ताओं की ओर से, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल व मुकुल रोहतगी ने अदालत के समक्ष कई ऐसी परियोजनाओं का उदाहरण दिया, जिनके ध्वस्तीकरण से अपूरणीय सार्वजनिक क्षति होगी.

AIIMS अस्पताल, ओडिशा: सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि ओडिशा में 962 बिस्तरों वाले एम्स अस्पताल का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है. इसकी EIA (पर्यावरण प्रभाव आकलन) सहित सभी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी थीं और यह EC मिलने के अंतिम चरण में था.

SAIL की परियोजना: एक अन्य याचिकाकर्ता भारतीय इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड (SAIL) की परियोजना भी 2021 के OM के आधार पर शुरू हुई थी और पर्यावरण मंजूरी (EC) मिलने के करीब थी. JUR के कारण इसे मंजूरी नहीं मिल सकी, जिससे सार्वजनिक खजाने को भारी नुकसान हुआ.

विजयनगर एयरपोर्ट: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कर्नाटक के विजयनगर में एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट का उदाहरण दिया, जिसका निर्माण पूरा हो चुका है. उन्होंने चिंता जताई कि इस फैसले के बाद पूरे एयरपोर्ट को ध्वस्त करना पड़ सकता है.

रियल एस्टेट की समस्या: वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने बताया कि कई बिल्डिंग प्रोजेक्ट ऐसे थे जो शुरुआत में 20,000 वर्ग मीटर की सीमा से नीचे थे (जिसके लिए EC ज़रूरी नहीं थी), लेकिन बाद में बिल्डिंग नियमों में बदलाव के कारण उनका दायरा बढ़ा और उन्हें पर्यावरण मंजूरी (EC) की आवश्यकता पड़ गई. उन्होंने कहा कि पूरी तरह से बनी हुई कानूनी रूप से अनुमत परियोजनाओं को पहले ध्वस्त करना, फिर EC लेना और उसके बाद दोबारा निर्माण करना— यह ‘तर्कहीन’ है.

CJI के अवलोकन: विधायी शक्ति और जमीनी हकीकत का संतुलन

CJI ने अपनी चर्चा और विश्लेषण में इन सभी दलीलों पर विचार किया. उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के पास पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत उद्योगों पर प्रतिबंध लगाने या उन्हें सुरक्षा उपायों के अधीन चलाने के लिए अधिसूचना जारी करने की शक्ति है.

CJI ने 2017 अधिसूचना और 2021 OM की पृष्ठभूमि को समझाया, जिसमें यह सुनिश्चित करने की प्रक्रिया थी कि पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन करने वाली संस्थाओं को अनुपालन के दायरे में लाया जा सके . उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह प्रक्रिया उल्लंघन को रोकने और पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त मुआवज़ा (Damages) सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाई गई थी.

नियमों की सख़्ती: CJI ने उल्लेख किया कि 2017 अधिसूचना और 2021 OM दोनों में यह स्पष्ट प्रावधान था कि यदि कोई परियोजना प्रचलित कानूनों के तहत अनुमेय नहीं है (उदाहरण के लिए CRZ-I क्षेत्र में ‘लाल श्रेणी का उद्योग’) या विस्तार के बाद भी पर्यावरण के लिए टिकाऊ नहीं है, तो उसे अनिवार्य रूप से बंद और ध्वस्त करना होगा.

दंडात्मक उपाय: हालांकि, जो परियोजनाएं अन्यथा अनुमेय हैं, उन्हें क्षति मूल्यांकन (Damage Assessment), उपचार योजना (Remedial Plan) और सामुदायिक संवर्धन योजना (Community Augmentation Plan) से गुजरना होगा, जिसके साथ ही भारी जुर्माना भी लगाया जाएगा. CJI ने संकेत दिया कि नियमों में निहित ये दंडात्मक और सुधारात्मक उपाय, उन परियोजनाओं को ध्वस्त करने की आवश्यकता से कहीं अधिक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं जो अन्यथा कानूनी रूप से अनुमेय हैं.

न्यायिक अनुशासन, पूर्व के फैसलों का मसला

पीठ ने न्यायिक अनुशासन के महत्व को भी रेखांकित किया. अदालत ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि ‘Ex Post Facto’ EC के मुद्दे पर दो Coordinate Benches के फैसलों में स्पष्ट विरोधाभास था. पूर्व के फैसले (JUR) ने Common Cause और Alembic Pharmaceuticals का अनुसरण किया, जबकि याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि Electrosteel, Pahwa Plastics और D. Swamy जैसे बाद के फैसलों पर ध्यान नहीं दिया गया.

CJI ने कहा कि यदि एक समन्वय पीठ को दूसरी समन्वय पीठ के फैसले से असहमत होना था, तो उन्हें मामले को बड़ी पीठ के पास भेजना चाहिए था, न कि असंगत रुख अपनाना चाहिए. इस प्रकार, न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन हुआ है. पीठ ने इस बात को ‘दर्दनाक’ माना कि पूर्व के फैसले ने उन लाखों-करोड़ों रुपये के सार्वजनिक निवेश को नज़रअंदाज़ कर दिया जो कानूनी प्रक्रिया के तहत EC प्राप्त करने के अंतिम चरण में थे.

पिछले फैसले की समीक्षा अनिवार्य और उचित

CJI की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस रिव्यू पिटीशन की सुनवाई के बाद पाया कि पिछले फैसले की समीक्षा न केवल वारंटेड (औचित्यपूर्ण) है, बल्कि अनिवार्य और उचित भी है. यह फैसला इस बात की ओर इशारा करता है कि सुप्रीम कोर्ट पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन पर सख़्ती जारी रखेगा, लेकिन नियमों के अनुपालन में देरी या उल्लंघन करने वाली उन परियोजनाओं के लिए ध्वस्तीकरण के बजाय दंड और Remediation का संतुलित रास्ता निकालेगा, जो अन्यथा जनहित में हैं और कानूनी रूप से अनुमेय हैं.

Bharat Express Desk

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