कला-साहित्य

नैनन में आन-बान: स्वरों की आलापचारी में डूबती एक आत्मीय यात्रा

Book Review: यतीन्द्र मिश्र की नवीनतम कृति ‘नैनन में आन-बान’ पेंगुइन स्वदेश से हाल ही में प्रकाशित हुई है. यह किताब हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के बारे में है और ये ऐसी किताब है कि पढ़ने वाले में संगीत की रुचि जाग्रत हो जाए, भले ही उसे पहले इस परंपरा की ज्यादा जानकारी न हो.

लेखक ने खुद भूमिका में लिखा है कि यह किताब “शास्त्रीय संगीत की समझ, उसके आत्मीय परिवेश और आनंद की फलश्रुति कराने वाले माध्यम को लेकर मेरे अपने विचार हैं, जो नैनन के आन-बान (राग मुल्तानी की बंदिश की पहली पंक्ति से उठाया गया शीर्षक) के माध्यम से व्यक्त हुए हैं.”

प्रेम, सौंदर्य और संगीत की आलौकिक अनुभूति

शीर्षक राग मुल्तानी की प्रसिद्ध बंदिश ‘नैनन में आन-बान शोभा लायो’ से लिया गया है, जो प्रेम, सौंदर्य और संगीत की आलौकिक अनुभूति को बयान करता है. यह कोई शुष्क व्याख्या ग्रंथ नहीं है—बल्कि लेखक के व्यक्तिगत चिंतन, अनुभव और भावनाओं का संग्रह है, जो पाठक को स्वरों के आनंद में डुबो देता है.

किताब बारह मूर्धन्य शास्त्रीय गायकों के सांगीतिक व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करती है. केसरबाई केरकर की गंभीर स्वर साधना, उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की भावपूर्ण गायकी, रसूलनबाई की लोक-शास्त्रीय संनाद, सिद्धेश्वरी देवी की भक्ति रस की गहराई, उस्ताद अमीर ख़ाँ की बिंदीदार अंदाज, पंडित भीमसेन जोशी की ऊर्जावान प्रस्तुतियां, बेगम अख़्तर की ग़ज़ल-ठुमरी की मिठास, और पंडित कुमार गंधर्व की राग-नवोन्मेष—प्रत्येक अध्याय इन महान कलाकारों की आलापचारी को जीवंत बनाता है.

सरल लेकिन गहन भाषा

यतीन्द्र मिश्र की भाषा सरल लेकिन गहन है. वे जटिल ताल-राग संरचनाओं को काव्यात्मक रूपकों से सजाते हैं, जिससे पाठक बिना पूर्व ज्ञान के भी संगीत के परिवेश में खो जाता है. संगीत को वे “स्वरों की साधना जो इतिहास बन जाती है” कहते हैं और यह वाक्य किताब के हर पृष्ठ पर गूंजता है.

इसकी सबसे बड़ी ताकत पहुंच है. शास्त्रीय संगीत से अपरिचित पाठक को यह रागों की दुनिया में प्रवेश कराती है, कहानियों, संस्मरणों और भावनात्मक विश्लेषण के जरिए, न कि बोझिल व्याख्यान से. लेखक की शैली बहुआयामी है: कभी कवि की तरह चित्रकारी, कभी इतिहासकार की तरह स्मृति-संरक्षण.

आनंद-केंद्रित किताब

यदि आप गहन तकनीकी विश्लेषण चाहते हैं, तो यह किताब वैकल्पिक हो सकती है क्योंकि यह अधिक आनंद-केंद्रित है. लेकिन यही इसकी जादूगरी है जो संगीत को अभिजात्य से उतारकर लोकप्रिय बनाती है.

कुल मिलाकर, नैनन में आन-बान शास्त्रीय संगीत की उस आन-बान को पुनरुज्जीवित करती है जो आधुनिक जीवन की भागदौड़ में लुप्तप्राय हो गई है. यदि आप संगीत के स्वाद में डूबना चाहते हैं या किसी को शास्त्रीय दुनिया का परिचय कराना चाहते हैं, तो यह किताब अनिवार्य है.

इस किताब को पढ़ने के साथ गुनगुनाया भी जा सकता है.

ये भी पढ़ें: एनके गौड़ा: किताबों के प्रति जुनून से बनी देश की सबसे बड़ी निजी लाइब्रेरी, अब पद्मश्री से सम्मानित

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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