स्मृति और दर्शन का अद्भुत संगम शुक्रवार की संध्या को दिल्ली में देखने को मिला. एक राष्ट्रीय बौद्धिक संगोष्ठी ने श्रद्धांजलि को समकालीन उद्देश्य से जोड़ा. पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की जन्मशताब्दी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य श्रीकांत शंकर जोशी की पुण्य स्मृति पर “पंच परिवर्तन” विषयक एक राष्ट्रीय स्तरीय संगोष्ठी नई दिल्ली में आयोजित की गई. इस कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, चिंतकों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने भारत के सभ्यतागत मूल्यों पर चिंतन किया, साथ ही एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र के रोडमैप पर विमर्श किया.
वैचारिक विरासत को नमन
मातृभूमि बौद्धिक न्यास और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत के समक्ष मौजूद चुनौतियों और अवसरों के परिप्रेक्ष्य में जोशी जी के बौद्धिक स्पष्टता, राष्ट्रीय निष्ठा और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पण को आज से जोड़ना था. वक्ताओं ने इस बात को रेखांकित किया कि वाजपेयी और जोशी दोनों ही विचार, नैतिकता और सार्वजनिक जीवन के दुर्लभ संगम का प्रतिनिधित्व करते थे.
संस्कृति में निहित विकास- अश्विनी वैष्णव
रेल, सूचना एवं प्रसारण और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री ने आर्थिक उत्थान को सभ्यतागत चेतना से जोड़ा. मुख्य अतिथि अश्विनी वैष्णव ने पंच परिवर्तन को भारत की सांस्कृतिक चेतना में गहराई से रचा-बसा एक विचार बताया. उन्होंने कहा, “भारत ५,००० वर्षों से अधिक की निरंतरता वाली एक सभ्यता है जिसने सदैव विश्व का मार्गदर्शन किया है,” और यह भी कि देश विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर तेज़ी से अग्रसर है. वैष्णव ने जोर देकर कहा कि यह यात्रा स्वदेशी चिंतन और आत्मनिर्भरता में निहित है. दूरसंचार और प्रौद्योगिकी विनिर्माण में भारत की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भारत में डिज़ाइन और निर्मित उत्पाद अब विश्व भर में निर्यात किए जा रहे हैं. यह आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण की सफलता का स्पष्ट प्रमाण है.
विविधता के माध्यम से एकता- इंद्रेश कुमार
धार्मिक पहचान से परे सामंजस्य के लिए एक दार्शनिक आह्वान किया गया. संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के वरिष्ठ प्रमुख और आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने पहचान और एकता पर गहन चिंतनपूर्ण उद्बोधन दिया. उन्होंने कहा, “हर इंसान सपने देखता है, लेकिन सपने कभी विदेशी भाषा में नहीं आते—वे भारतीय संवेदना से ही उपजते हैं.”
कई आध्यात्मिक परंपराओं का स्मरण कराते हुए कुमार ने कहा, “ईश्वर, अल्लाह, गॉड, वाहेगुरु या परमात्मा—सत्य एक ही है.” उन्होंने बल देकर कहा कि विविधता को कभी भी संघर्ष का स्रोत नहीं, बल्कि एक सौंदर्यात्मक और नैतिक शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए, जो भारत की एकता की आधारशिला है.
राष्ट्र-निर्माण के रूप में शिक्षा- प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर
सांस्कृतिक आत्मबोध सार्थक शिक्षा का मूल है. एनसीएमईआई के कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) शाहिद अख्तर ने गहन आत्मबोध और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की आवश्यकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा, “हमारी सांस्कृतिक विरासत हमारी सबसे बड़ी संपदा है,” और तर्क दिया कि शिक्षा व्यक्तिगत उन्नति से आगे बढ़कर होनी चाहिए. उनके अनुसार, वास्तविक शिक्षा का ध्यान चरित्र निर्माण, जीवन-आकार देने वाले मूल्यों और राष्ट्र की सेवा पर होना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि ज्ञान सामाजिक सामंजस्य और राष्ट्रीय प्रगति में योगदान दे.
व्यक्तिगत परिवर्तन से राष्ट्रीय परिवर्तन तक- डॉ. डी. के. अग्रवाल
पंच परिवर्तन को परिवर्तन के लिए एक व्यावहारिक रूपरेखा के रूप में प्रस्तुत किया गया. मुख्य भाषण देते हुए मातृभूमि बौद्धिक न्यास के अध्यक्ष डॉ. डी. के. अग्रवाल ने पंच परिवर्तन को राष्ट्र-निर्माण के लिए एक क्रियान्वयन योग्य मॉडल बताया. उन्होंने समझाया कि यह अवधारणा परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति से करते हुए उसे परिवार, समाज और अंततः राष्ट्र तक विस्तारित करने की परिकल्पना करती है, जिससे एक स्थायी और नैतिक विकास मार्ग प्रशस्त होता है.
‘पंच परिवर्तन’ के पाँच स्तंभ
समग्र राष्ट्रीय नवीकरण के लिए एक संरचित दृष्टि प्रस्तुत की गई. संगोष्ठी में पंच परिवर्तन को पाँच मूल आयामों के माध्यम से रेखांकित किया गया: सामाजिक समरसता, परिवार जागरण, पर्यावरण, स्वदेशी एवं स्वत्व, तथा नागरिक कर्तव्य. वक्ताओं ने ज़ोर देकर कहा कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय शक्ति के लिए इन स्तंभों पर संतुलित प्रगति अनिवार्य है.
एक विचार-प्रेरित आंदोलन
यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक निरंतर बौद्धिक मिशन है. पूरे भारत से आए प्रतिभागियों—जिनमें विद्वान, युवा प्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और नागरिक समाज के सदस्य शामिल थे—ने राष्ट्रीय एकता, मीडिया की ज़िम्मेदारी और नागरिक भागीदारी पर विमर्श में हिस्सा लिया. आयोजकों ने इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि पंच परिवर्तन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक विचार-प्रेरित आंदोलन है, जो वाजपेयी और जोशी जैसे नेताओं की बौद्धिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है.
संसद स्ट्रीट स्थित आकाशवाणी भवन में शनिवार दोपहर ३:३० बजे आयोजित इस संगोष्ठी ने भारत के भविष्य को आकार देने वाले विचारों की क्रूसिबल के रूप में नई दिल्ली की भूमिका को और पुष्ट किया.
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-भारत एक्सप्रेस
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