India oil reserve amid Iran Israel war: मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जंग तेज हो गई है. होर्मुज स्ट्रेट अब जंग का मैदान बन चुका है, जहां से भारत का करीब 50% से अधिक कच्चा तेल गुजरता है. अगर ईरान ने इसे बंद कर दिया तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं. ट्रांसपोर्ट ठप हो सकता है, खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं, महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है. लेकिन अच्छी बात यह है कि मोदी सरकार की दूरदर्शी तैयारी ने देश को इस संकट से काफी हद तक बचा लिया है. अभी भारत के पास तेल का मजबूत स्टॉक तैयार है और वैकल्पिक रास्ते भी पहले से अधिक मजबूत हो चुके हैं.
भारत का स्ट्रैटेजिक क्रूड रिजर्व कितना है?
भारत ने 2014 के बाद से अपनी पेट्रोलियम भंडार की क्षमता बढ़ाने पर काफी जोर दिया है. जिसके चलते हमारी अभी तीन जगहों पर कुल 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) की क्षमता हो चुकी है. इसके अंतर्गत विशाखापत्तनम में 1.33 MMT, मंगलुरु में 1.5 MMT और पदुर में 2.5 MMT कच्चा तेल स्टोर है.
बता दें कि 2021 में कैबिनेट ने चंदीखोल (4 MMT) और पदुर में अतिरिक्त 2.5 MMT क्षमता बनाने की मंजूरी दी थी. मार्च 2025 तक गुफाओं में 3.52 MMT कच्चा तेल भरा हुआ था. कम कीमतों के समय अप्रैल-मई 2020 में पूरा भंडार भर गया था.
कितने दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है?
भारत का दैनिक कच्चे तेल का खपत करीब 5 से 5.5 मिलियन बैरल (लगभग 0.7-0.75 MMT) है. सिर्फ स्ट्रैटेजिक रिजर्व (3.52 MMT) की बात करें तो इससे करीब 9.5 दिन की जरूरत पूरी हो सकती है. लेकिन कुल मिलाकर (SPR + ऑयल मार्केटिंग कंपनियों का स्टॉक + अन्य भंडारण) देश में 74 दिन की कवरेज है. यानी आपात स्थिति में SPR का इस्तेमाल करके भारत 9-10 दिन बिना आयात के चल सकता है और कुल मिलाकर 2 महीने से ज्यादा की सुरक्षा प्रदान करता है.
2014 से पहले क्या थी हालत?
2014 से पहले UPAI की सरकार में ISIS संकट के समय हालात बहुत अलग हुआ करते थे. आपको जानकर हैरानी होगी कि तब तेल का स्टॉक सिर्फ कुछ ही दिन का हुआ करता था. यानी भारत के SPR की क्षमता बस इतनी ही थी की वह देश को जरूरत के समय कुछ ही दिन तक राहत प्रदान कर सके, लेकिन केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद इस मामले में तेजी से काम हुआ और आज भारत के पास 2 महीने से भी ज्यादा तक का तेल रिजर्व मौजूद है.
बताते चलें मोदी सरकार ने 2015 से SPR को भरा, पदुर, मंगलौर, विशाख जैसे अंडरग्राउंड कैवर्न्स तक फैला कर कुल 5.33 मिलियन टन की क्षमता बनाई, जिसके साथ ही इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाई, बायोडीजल और ग्रीन हाइड्रोजन पर भारी निवेश किया. विशषज्ञों के मुताबिक, आज अगर वही हालात होते तो GDP 2% गिर सकती थी और महंगाई 12% छू सकती थी, पर वर्तमान सरकार की दूरदर्शी सोच के चलते आज भारत ईरान युद्ध से उपजे तेल संकट में भी अडिग खाद्य है.
ईरान-इजरायल जंग का भारत पर असर
बता दें कि भारत का 50% से ज्यादा कच्चा तेल होर्मुज स्ट्रेट से आता है. अगर युद्ध के कारण यह रास्ता बंद हुआ तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें और सप्लाई प्रभावित होंगी. लेकिन भारत पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ने वाला क्योंकि 74 दिन का कुल स्टॉक भारत को तुरंत संकट से बचाने में सक्षम है. वहीं अमेरिका ने भी रूसी तेल के टैंकरों को 30 दिन की छूट दे दी है ताकि वैश्विक बाजार स्थिर रहे. जिससे भारत अपनी जरूरत के हिसाब से एक बार फिर रूस के तेल पर अधिक फोकस कर सकता है लहाल कोई तत्काल संकट नहीं है, लेकिन लंबे युद्ध से महंगाई बढ़ सकती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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