बिना नींव वाला किला
Travel News: भारतीय इतिहास में महलों और किलों का एक बेहद गौरवशाली अतीत रहा है. इनमें से कई इमारतें अपनी अनोखी बनावट और मजबूत वास्तुकला के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं. राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित ‘गागरोन का किला’ भी एक ऐसा ही ऐतिहासिक अजूबा है. यह पूरे भारत का एकमात्र ऐसा अनूठा किला है, जिसकी कोई नींव नहीं है. यह प्राचीन दुर्ग बिना किसी नींव के सीधे पहाड़ी की नुकीली चट्टानों पर मजबूती के साथ खड़ा है. विंध्याचल पर्वतमाला की मुकुंदरा पहाड़ियों पर स्थित यह विशाल चट्टान ही इस पूरे किले को प्राकृतिक आधार और मजबूती प्रदान करती है.
तीन तरफ नदियों के पानी से घिरा है ‘जल दुर्ग’
गागरोन किले की सबसे बड़ी भौगोलिक विशेषता इसका चारों तरफ की प्रकृति से सुरक्षित होना है. यह किला तीन तरफ से ‘काली सिंध’ और ‘आहू’ नदियों के पवित्र संगम स्थल से घिरा हुआ है. नदियों के पानी से घिरे होने के कारण ही इसे भारतीय सैन्य वास्तुकला के अनुसार एक उत्कृष्ट ‘जलदुर्ग’ माना जाता है. इसके अलावा, किले का चौथा हिस्सा एक गहरी खाई से सुरक्षित है. इतिहास और प्रकृति का ऐसा शानदार मेल बेहद दुर्लभ है, जहां एक ही स्थान पर ‘जल दुर्ग’ और ‘वन दुर्ग’ दोनों के ही लक्षण दिखाई देते हैं. इसी अद्भुत महत्ता के कारण यूनेस्को (UNESCO) ने साल 2013 में इसे ‘विश्व धरोहर स्थल’ की सूची में शामिल किया था.
14 लड़ाइयां हुईं और 2 ऐतिहासिक जौहर हुए
इस किले की दीवारें सिर्फ पत्थरों से नहीं बनी हैं, बल्कि इनके भीतर वीरता और बलिदान की सैकड़ों कहानियां छिपी हैं. गागरोन के किले ने अपने इतिहास में कुल 14 भीषण युद्धों का सामना किया है. अपनी मजबूत बनावट और बेजोड़ भौगोलिक स्थिति के कारण दुश्मन सेनाओं के लिए इसे आसानी से जीत पाना लगभग नामुमकिन था. इस दुर्ग के गौरवमयी इतिहास में 2 बड़े ‘जौहर’ भी दर्ज हैं. सन 1423 में जब मालवा के सुल्तान होशंग शाह ने 30 हजार घुड़सवारों के साथ इस किले पर हमला किया था, तब यहां के प्रतापी राजा अचलदास खींची ने वीरता से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी. उनके बलिदान के बाद राजपूत महिलाओं ने अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए जलती आग में कूदकर सामूहिक जौहर कर लिया था.
राजा प्रताप राव से संत बने पीपाजी का इतिहास
गागरोन दुर्ग की इस पावन भूमि का संबंध सिर्फ युद्धों से नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिकता से भी रहा है. 14वीं शताब्दी के मध्य में यहां राजा प्रताप राव का शासन था. उन्होंने इस रियासत को बेहद समृद्ध बनाया, लेकिन बाद में उनका मन राज-पाठ से उचट गया. वे वैभवशाली जीवन को त्यागकर सन्यासी बन गए और आगे चलकर ‘संत पीपाजी’ के नाम से पूरे देश में विख्यात हुए. किले के ठीक सामने नदियों के संगम पर आज भी संत पीपाजी का ऐतिहासिक मठ बना हुआ है. इसके अलावा, दुर्ग परिसर के ठीक बाहर प्रसिद्ध सूफी संत मिट्ठे शाह की दरगाह भी स्थित है, जहां हर साल मुहर्रम के मौके पर एक बड़ा और रंगीन मेला लगता है.
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आमतौर पर दो के मुकाबले यहां हैं तीन परकोटे
सुरक्षा के लिहाज से यह किला अपने समय के अन्य दुर्गों से काफी आगे था. जहां राजस्थान के ज्यादातर किलों में सुरक्षा के लिए केवल दो परकोटे (चारदीवारी) बनाए जाते थे, वहीं गागरोन के किले की सुरक्षा के लिए विशेष रूप से तीन परकोटे तैयार किए गए थे. किले के अंदर प्रवेश करने के लिए दो मुख्य द्वार हैं, जिनमें से एक द्वार सीधे नदी की तरफ और दूसरा पहाड़ी रास्ते की ओर खुलता है. दुर्ग के भीतर आज भी दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जनाना महल, रंग महल और प्राचीन मधुसूदन मंदिर जैसी कई ऐतिहासिक इमारतें मौजूद हैं, जो सैलानियों को प्राचीन भारत की भव्य जीवनशैली की याद दिलाती हैं.
- भारत एक्सप्रेस
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