भारत में एक दौर ऐसा था जब घरों में रखे रंगीन टेलीविजन (टीवी) और उसकी पिक्चर ट्यूब का बड़ा क्रेज हुआ करता था. लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि देश के लोगों का मनोरंजन करने वाली एक टीवी कंपनी भारतीय वायुसेना और सेना के लिए सबसे अचूक ‘तीसरी आंख’ यानी ‘ईगल आई’ बन सकती है? यह कहानी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) की है, जिसने देश को न केवल मनोरंजन के साधन दिए, बल्कि युद्ध के मैदान में सेना को दुश्मनों पर भारी पड़ने की ताकत भी दी. आज यह कंपनी भारतीय रक्षा क्षेत्र की रीढ़ की हड्डी बन चुकी है.
जब टीवी की पिक्चर ट्यूब से शुरू हुआ रक्षा का सफर
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) की शुरुआत साल 1954 में रक्षा मंत्रालय के अधीन एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) के रूप में हुई थी. शुरुआती दौर में इस कंपनी का बड़ा नाम घरों के लिए ब्लैक एंड व्हाइट और बाद में रंगीन टीवी की पिक्चर ट्यूब बनाने के लिए हुआ करता था. दूरदर्शन के सुनहरे दौर में देश के करोड़ों घरों में बीईएल की तकनीक पहुंच रही थी. लेकिन कंपनी का असली मकसद सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं था. धीरे-धीरे बीईएल ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में महारत हासिल की और इसका इस्तेमाल देश की सीमा की सुरक्षा के लिए करना शुरू कर दिया.
‘ऑपरेशन सिंदूर’ और वायुसेना के लिए बनी ‘ईगल आई’
भारतीय वायुसेना के इतिहास में बीईएल का योगदान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सबसे प्रमुखता से उभरकर सामने आया. इस ऑपरेशन के तहत भारतीय वायुसेना की रडार और एयर डिफेंस प्रणालियों को आधुनिक बनाने का एक बड़ा अभियान चलाया गया था. बीईएल ने इस दौरान वायुसेना के लिए ऐसे अत्याधुनिक रडार, सोनार और कम्युनिकेशन सिस्टम तैयार किए, जो पलक झपकते ही दुश्मन के विमानों या मिसाइलों को ट्रैक कर सकते थे. इसी वजह से बीईएल को भारतीय सेना की ‘ईगल आई’ (बाज जैसी नजर) कहा जाने लगा, जो हर पल दुश्मनों की हरकतों पर नजर रखती है.
युद्ध के मैदान से लेकर वोटिंग मशीन तक का सफर
आज के समय में भारतीय सेना जो भी स्वदेशी मिसाइलें या रडार सिस्टम इस्तेमाल करती है, उनमें से अधिकांश में बीईएल के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगे होते हैं. आकाश मिसाइल प्रणाली से लेकर हथियारों का पता लगाने वाले ‘स्वाति रडार’ तक में इस कंपनी का बहुत बड़ा योगदान है. सिर्फ इतना ही नहीं, भारत में लोकतंत्र को मजबूत करने वाली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और वीवीपीएटी (VVPAT) को बनाने की जिम्मेदारी भी बीईएल ही संभालती है. मनोरंजन के लिए टीवी स्क्रीन चमकाने वाली एक साधारण कंपनी से लेकर देश के आसमान की सुरक्षा करने तक का बीईएल का यह सफर भारत की आत्मनिर्भरता की एक बेहतरीन और गौरवशाली मिसाल है.
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TV के पिक्चर ट्यूब के बारे में यहां जानिए
पिक्चर ट्यूब, जिसे तकनीकी रूप से कैथोड रे ट्यूब (CRT) कहा जाता है, पुराने टेलीविजन और कंप्यूटर मॉनीटर का मुख्य हिस्सा हुआ करती थी, जो स्क्रीन पर छवि बनाने के लिए जिम्मेदार होती थी. इसकी कार्यप्रणाली को सरल शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है:
इलेक्ट्रॉन गन (Electron Gun): ट्यूब के पतले हिस्से में एक ‘इलेक्ट्रॉन गन’ होती है, जो उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉनों की एक या तीन बीम (रंगीन टीवी के लिए लाल, हरी, नीली) पैदा करती है.
वैक्यूम (Vacuum): ट्यूब पूरी तरह से सीलबंद और वैक्यूम (हवा रहित) होती है, ताकि इलेक्ट्रॉन बिना किसी बाधा के यात्रा कर सकें.
डिफ्लेक्शन कॉइल्स (Deflection Coils): ट्यूब के गले के चारों ओर चुंबकीय कॉइल्स होती हैं, जो इलेक्ट्रॉन बीम को स्क्रीन पर ऊपर-नीचे और दाएं-बाएं तेजी से ‘स्कैन’ करने के लिए नियंत्रित करती हैं. यह बीम पूरी स्क्रीन को एक सेकंड में कई बार स्कैन करती है.
फॉस्फोर स्क्रीन (Phosphor Screen): स्क्रीन के अंदर की तरफ एक फॉस्फोर परत लगी होती है, जो छोटे-छोटे लाल, हरे और नीले डॉट्स या पट्टियों से बनी होती है. जब इलेक्ट्रॉन बीम इन फॉस्फोर डॉट्स से टकराती है, तो वे चमक उठते हैं और रोशनी पैदा करते हैं. बीम की तीव्रता को कम या ज्यादा करके अलग-अलग रंग और शेड्स बनाए जाते हैं.
शैडो मास्क (Shadow Mask): रंगीन पिक्चर ट्यूब में, एक धातु की प्लेट होती है जिसमें छोटे छेद होते हैं, जिसे ‘शैडो मास्क’ कहते हैं. यह सुनिश्चित करता है कि सही इलेक्ट्रॉन बीम सही फॉस्फोर डॉट्स से ही टकराए, जिससे रंग स्पष्ट दिखें.

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