US-Iran Peace Deal: पश्चिम एशिया के महा-युद्ध को रोकने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक शांति समझौते (MOU) का खाका पूरी तरह तैयार हो चुका है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने इस डील की आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि आगामी शुक्रवार, 19 जून 2026 को स्विट्जरलैंड में इस ऐतिहासिक समझौते पर ऑफिशियल साइन किए जाएंगे.
महीनों की गुप्त बातचीत के बाद ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने भी इस बात की पुष्टि की है कि अमेरिका के साथ युद्ध खत्म करने का एमओयू फाइनल हो चुका है, जिसके तहत लेबनान समेत सभी मोर्चों पर स्थायी सीजफायर (Permanent Ceasefire) लागू होगा और ईरान पर लगी नौसैनिक नाकाबंदी तुरंत हटा दी जाएगी. इस मध्यस्थता के लिए ईरान ने पाकिस्तान और कतर का शुक्रिया अदा किया है.
लेकिन, इस महा-घोषणा के बाद भी दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों के मन में एक ही बड़ा सवाल गूंज रहा है— क्या इस बार वाकई यह शांति समझौता कारगर साबित होगा या सिर्फ कागजी शेर बनकर रह जाएगा? इस संशय के पीछे 3 सबसे बड़ी और कड़वी वजहें हैं:
शांति पर क्यों खड़ा हुआ सबसे बड़ा संशय?
इस समझौते (US-Iran Peace Deal) की राह में सबसे बड़ा रोड़ा खुद अमेरिका का सबसे पक्का दोस्त इजरायल बन गया है. इजरायल ने खुद को इस पूरे समझौते से पूरी तरह अलग कर लिया है. इजरायली प्रशासन ने साफ कह दिया है कि वह डील में शामिल ‘लेबनान वाले हिस्से’ को किसी भी कीमत पर नहीं मानेगा और खुद को इस समझौते से बंधा हुआ नहीं मानता. जब तक इजरायल इस चक्रव्यूह से बाहर है और लेबनान-गाजा पर उसके हमले जारी रहेंगे, तब तक पूरे पश्चिम एशिया में पूर्ण शांति की कल्पना करना बेमानी है.
डोनाल्ड ट्रंप का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड(US-Iran Peace Deal)
इस डील की कामयाबी पर दूसरा सबसे बड़ा सस्पेंस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर है. ट्रंप का राजनीतिक अतीत गवाह है कि वे अंतरराष्ट्रीय समझौतों को लेकर कभी गंभीर नहीं रहे हैं और कूटनीति में बार-बार पलटी मारने के लिए बदनाम हैं. अपने पिछले कार्यकाल में भी ट्रंप ने ईरान के साथ हुई ऐतिहासिक ‘परमाणु डील’ (JCPOA) को एक झटके में फाड़कर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था.
ऐसे में ईरान इस बात को लेकर बेहद डरा हुआ है कि फाइनल एग्रीमेंट होने के बाद ट्रंप कब अपनी बात से पलट जाएं. हालांकि, ट्रंप अतीत में इजरायली पीएम नेतन्याहू को कई बार फटकार लगा चुके हैं, लेकिन वे इजरायल को किस हद तक दबा पाएंगे, यह देखना बाकी है.
डील की शर्तों पर बरकरार है गहरा सस्पेंस
तीसरी बड़ी उलझन यह है कि इस एमओयू पर अभी सिर्फ सहमति बनी है, फाइनल एग्रीमेंट पर विस्तृत बातचीत होना अभी बाकी है. यह व्यवस्था कब से और कैसे जमीन पर लागू होगी, इस पर गहरा सस्पेंस बरकरार है. लेबनान फ्रंट पर हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच हथियारों की होड़ कैसे थमेगी, इसका कोई स्पष्ट खाका इस डील (US-Iran Peace Deal) में दिखाई नहीं दे रहा है. साफ है कि 19 जून को स्विट्जरलैंड में होने वाली साइनिंग सेरेमनी महज़ एक शुरुआत है, असली परीक्षा तब होगी जब इजरायल और ट्रंप के अड़ियल रुख के बीच इस समझौते को जमीन पर उतारा जाएगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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