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दिल्ली हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: समझौते का दबाव बनाने के लिए हथियार न बनें रेप और छेड़छाड़ की धाराएं

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस गिरीश कथपालिया ने वैवाहिक विवादों में समझौते का दबाव बनाने के लिए आईपीसी की धारा 376 और 354A के दुरुपयोग पर चिंता जताई है.

Delhi high court

दिल्ली हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों के दौरान महिलाओं द्वारा पति या उनके रिश्तेदारों के खिलाफ गंभीर यौन दुराचार (यौन उत्पीड़न) के आरोप लगाने की तेजी से बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है. अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे आपराधिक मामलों में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, जहां केवल पति या उसके परिवार पर मनमुताबिक समझौते के लिए अनुचित दबाव बनाने के उद्देश्य से बलात्कार (रेप) जैसी बेहद गंभीर कानूनी धाराएं जोड़ दी जाती हैं.

सौदेबाजी के लिए न हो इस्तेमाल

माननीय जस्टिस गिरीश कथपालिया की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि दुष्कर्म जैसे अत्यंत गंभीर और संवेदनशील आरोपों का इस्तेमाल किसी भी अदालती या पारिवारिक विवाद में दबाव बनाने अथवा सौदेबाजी के साधन (टूल) के रूप में कतई नहीं होना चाहिए. कोर्ट ने ऐसे मामलों की पूरी तरह निष्पक्ष व पारदर्शी जांच को आवश्यक बताया. हाई कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी शिकायतकर्ता महिला के दो जीजाओं (बहनों के पतियों) के खिलाफ निचली अदालत में चल रही आपराधिक कार्यवाही पर पूरी तरह रोक लगाते हुए की है.

जोड़ी जा रही हैं धारा 376 और 354A

कोर्ट ने अपने आदेश के विन्यास में रेखांकित किया कि दहेज उत्पीड़न (धारा 498A) के मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः गिरफ्तारी (ऑटोमैटिक अरेस्ट) पर लगाए गए कानूनी प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए अब धारा 376 (बलात्कार) और धारा 354A (छेड़छाड़) जैसे गंभीर गैर-जमानती आरोप बहुत तेजी से जोड़े जा रहे हैं, ताकि आरोपियों को तुरंत जेल भेजा जा सके.

यह पूरा मामला साल 2024 में दिल्ली के संगम विहार पुलिस थाने में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A, 406, 376, 354A, 506, 509 और 34 के तहत दर्ज की गई एक एफआईआर (FIR) से जुड़ा हुआ है, जिसे याचिकाकर्ताओं (जीजाओं) ने हाई कोर्ट में चुनौती देकर रद्द (क्वैश) करने की मांग की थी.

वकील ऋषि मल्होत्रा ने उजागर की विसंगतियां

याचिका के तथ्यों के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला ने आरोपी के भाई से 8 जुलाई 2016 को पारंपरिक रीति-रिवाज से शादी की थी और इस दंपत्ति के दो बच्चे हैं. उनके वैवाहिक संबंधों में कड़वाहट तब आई, जब पति द्वारा 18 सितंबर 2023 को अदालत में तलाक (डिवोर्स) की याचिका दायर कर दी गई. इसके करीब सात महीने बाद, पत्नी ने 15 अप्रैल 2024 को पुलिस में यह एफआईआर दर्ज कराई.

आरोपियों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने कोर्ट में पुरजोर तर्क दिया कि यह एफआईआर पूरी तरह से बदले की दुर्भावना से प्रेरित होकर दर्ज कराई गई है. उन्होंने क्रोनोलॉजी समझाते हुए बताया कि जब पति ने सितंबर 2023 में ही तलाक के लिए अर्जी दे दी थी, तो पत्नी ने उसके कई महीनों बाद अप्रैल 2024 में पुलिस का रुख किया. आरोपी पक्ष ने पत्नी द्वारा लगाए गए इन गंभीर आरोपों में कई बड़ी कानूनी विसंगतियों और विरोधाभासों को भी कोर्ट के सामने उजागर किया.

17 नवंबर 2026 को होगी अगली सुनवाई

मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट के समक्ष यह बड़ा सवाल भी उठाया कि इस बात का पूरी एफआईआर में कोई तार्किक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि शिकायतकर्ता महिला अपने साथ हुए कथित बलात्कार और गंभीर शोषण के बारे में पिछले सात साल तक पूरी तरह चुप क्यों रही?

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दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले के सभी पहलुओं को रिकॉर्ड पर लेते हुए जीजाओं के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी है और अब इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई आगामी 17 नवंबर 2026 को मुकर्रर की है.



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