आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI अब केवल तकनीकी दुनिया तक सीमित नहीं रह गया है. लोकतांत्रिक राजनीति में इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है. चुनावी अभियान चलाने से लेकर मतदाताओं तक पहुंचने, फर्जी दावों की जांच करने और गलत सूचनाओं पर कार्रवाई करने तक AI का इस्तेमाल तेजी से हो रहा है. भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के उदाहरण बताते हैं कि अलग-अलग चुनावी व्यवस्थाओं के बावजूद दोनों देशों के सामने एक जैसी चुनौती है. सवाल यह है कि चुनावों में आधुनिक तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, बिना इस डर के कि मतदाताओं का भरोसा चुनावी प्रक्रिया से कमजोर हो जाए.
चुनावों में AI आखिर क्या काम करता है?
AI की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह बहुत बड़ी मात्रा में उपलब्ध राजनीतिक, सामाजिक और व्यवहारिक डेटा का विश्लेषण इंसानों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से कर सकता है. चुनावी अभियान चलाने वाली टीमें इसका उपयोग मतदाताओं की पहचान, संदेश तैयार करने, भाषाई अनुवाद करने, जनभावना को समझने और लोगों तक पहुंच बनाने के लिए कर सकती हैं.
केवल राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि चुनाव आयोग, मीडिया संस्थान और नागरिक समाज संगठन भी AI का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसकी मदद से भ्रामक सामग्री की पहचान की जा सकती है, संगठित दुष्प्रचार अभियानों पर नजर रखी जा सकती है और मतदान से जुड़ी जानकारी जनता तक सरल तरीके से पहुंचाई जा सकती है.
AI की ताकत जितनी बड़ी, जोखिम भी उतने ही गंभीर
AI के फायदे जितने आकर्षक हैं, उससे जुड़े खतरे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. आधुनिक जनरेटिव AI ऐसी सामग्री तैयार कर सकता है जो पूरी तरह नकली होने के बावजूद असली दिखाई देती है. इसमें फर्जी भाषण, किसी नेता की क्लोन की गई आवाज, नकली तस्वीरें, भ्रामक वीडियो, ऑटोमेटेड कमेंट्स और ऐसे चैटबॉट जवाब शामिल हैं जो आत्मविश्वास के साथ गलत जानकारी भी दे सकते हैं.
यही वजह है कि चुनावों में AI पर बहस केवल तकनीकी नवाचार की चर्चा नहीं है. यह जवाबदेही, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास का भी मुद्दा बन चुका है.
चुनावी हथियार बन चुका है AI
आज के दौर में चुनावी अभियान केवल रैलियों और भाषणों तक सीमित नहीं हैं. राजनीतिक दलों को लगातार यह समझना पड़ता है कि लोगों की प्राथमिकताएं क्या हैं, किस मुद्दे पर कैसी प्रतिक्रिया आ रही है और किस तरह के संदेश अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं. AI इन सभी कामों को तेज और संगठित बनाने में मदद करता है.
विभिन्न चुनावी अभियानों में AI का उपयोग कई रूपों में किया जा सकता है. इसके जरिए भाषण, सोशल मीडिया पोस्ट, कैप्शन, ईमेल और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक प्रचार सामग्री तैयार की जा सकती है. मतदाताओं को उनकी रुचियों, भौगोलिक क्षेत्र, भाषा, आयु और डिजिटल व्यवहार के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बांटा जा सकता है.
स्थानीय भाषाओं तक पहुंच बनाने में भी मददगार
AI चुनावी संदेशों को अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों के अनुरूप ढालने में सहायक है. किसी राष्ट्रीय संदेश को स्थानीय संदर्भ में परिवर्तित करना अब पहले की तुलना में ज्यादा आसान हो गया है. इसके अलावा उम्मीदवारों, नीतियों, विवादों और घटनाओं को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया का विश्लेषण भी AI के जरिए किया जा सकता है.
कई अभियान स्वयंसेवकों की सहायता के लिए चैटबॉट और डैशबोर्ड का उपयोग करते हैं, जो आम सवालों के जवाब तुरंत उपलब्ध कराते हैं. वहीं, चुनावी पूर्वानुमान मॉडल मतदान प्रतिशत या किसी सीट पर मुकाबले की स्थिति का अनुमान लगाने में भी मदद कर सकते हैं.
हर AI उपयोग गलत नहीं होता
विशेषज्ञ मानते हैं कि AI का हर उपयोग नुकसानदेह नहीं है. यदि इन उपकरणों को जिम्मेदारी के साथ विकसित और लागू किया जाए तो छोटे संगठन और सीमित संसाधनों वाले अभियान भी लोगों तक स्पष्ट और उपयोगी जानकारी पहुंचा सकते हैं. समस्या तब शुरू होती है जब तथ्यों की पुष्टि करने के बजाय केवल तेजी को महत्व दिया जाने लगता है, मतदाता लक्ष्यीकरण हेरफेर का रूप ले लेता है या फिर ऐसी सिंथेटिक सामग्री बनाई जाती है जिसमें असली स्रोत को छिपा दिया जाता है.
भारत का चुनावी परिदृश्य AI के लिए सबसे बड़ी परीक्षा
भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक है और यहां का चुनावी माहौल बेहद जटिल माना जाता है. विशाल मतदाता आधार, विभिन्न भाषाएं, क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक विविधता इसे AI के उपयोग के लिए एक अनूठा क्षेत्र बनाते हैं.
यहां चुनावी सामग्री राष्ट्रीय मीडिया के साथ-साथ क्षेत्रीय टीवी चैनलों, व्हाट्सऐप समूहों, यूट्यूब प्लेटफॉर्म, इंस्टाग्राम रील्स, स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों और राजनीतिक दलों के डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से तेजी से फैलती है. ऐसे माहौल में AI राजनीतिक दलों को क्षेत्र विशेष के लिए नारे बनाने, भाषणों का अनुवाद करने, छोटे प्रचार वीडियो तैयार करने और विपक्षी अभियानों का तुरंत जवाब देने की क्षमता देता है.
भारत में गलत सूचना का खतरा ज्यादा बड़ा
भारत की विशालता इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है. किसी स्थानीय भाषा में तैयार की गई फर्जी ऑडियो क्लिप, किसी नेता का संशोधित वीडियो या सामाजिक तनाव पैदा करने वाला झूठा संदेश कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकता है. कई बार पत्रकारों या सरकारी संस्थानों के पास उसका खंडन करने का पर्याप्त समय भी नहीं होता.
इसी वजह से 2024 के आम चुनावों के दौरान भारत निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों को AI आधारित डीपफेक और भ्रामक सामग्री के दुरुपयोग को लेकर चेतावनी दी थी. आयोग ने निर्देश दिया था कि यदि ऐसी सामग्री की जानकारी दी जाती है तो संबंधित दलों को तीन घंटे के भीतर उसे हटाने की कार्रवाई करनी होगी.
सिर्फ तकनीकी नहीं, संस्थागत चुनौती भी
भारत के सामने चुनौती केवल नई तकनीकों को समझने की नहीं है. यहां त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र, राजनीतिक दलों की स्पष्ट जिम्मेदारी, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का सहयोग, मीडिया साक्षरता और ऐसे सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है जो गलत सूचना को रोकें लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से प्रभावित न करें.
यूके में AI को लेकर अधिक नियामकीय बहस
यूनाइटेड किंगडम में भी AI से जुड़े जोखिम मौजूद हैं, लेकिन वहां चर्चा का केंद्र अधिकतर नियमन और पारदर्शिता पर रहा है. देश की चुनावी व्यवस्था, मतदाता संख्या और राजनीतिक ढांचा भारत से अलग है, इसलिए वहां ध्यान डिजिटल विज्ञापनों की पारदर्शिता, नियामक संस्थाओं के समन्वय और सार्वजनिक जवाबदेही पर ज्यादा रहा है.
यूके इलेक्टोरल कमीशन के अनुसार जनरेटिव AI ऐसे उपकरणों को कहा जाता है जो किसी निर्देश के आधार पर नया टेक्स्ट, तस्वीर, ऑडियो या वीडियो तैयार कर सकते हैं. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि मतदान प्रक्रिया या चुनावों से जुड़ी गलत जानकारी सामने आती है तो वह उसे सुधारने या उसके जवाब में कार्रवाई करने की कोशिश करेगा.
डिजिटल विज्ञापनों में पारदर्शिता पर जोर
यूके में राजनीतिक प्रचार सामग्री की पारदर्शिता को बढ़ाने के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं. इलेक्शंस एक्ट 2022 के तहत लागू डिजिटल इम्प्रिंट व्यवस्था को सरकार ने ऑनलाइन राजनीतिक विज्ञापनों में अधिक पारदर्शिता लाने का उपाय बताया था. इस दायरे में AI से तैयार की गई सामग्री भी चर्चा का विषय बनी.
इसके अलावा इलेक्टोरल कमीशन ने राजनीतिक डीपफेक की पहचान और AI से फैलाई जाने वाली गलत सूचनाओं से निपटने के लिए एक पायलट परियोजना भी शुरू की. आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2024 के आम चुनाव के दौरान सर्वे में शामिल आधे से अधिक मतदाताओं ने राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों के बारे में भ्रामक जानकारी देखने की बात कही थी, जबकि लगभग एक-चौथाई लोगों ने डीपफेक देखे या सुने होने की जानकारी दी.
भारत और यूके के रास्ते अलग, चिंता एक जैसी
भारत और यूके दोनों यह स्वीकार करते हैं कि AI चुनावी विश्वास को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. हालांकि समस्या से निपटने के उनके तरीके अलग-अलग हैं. भारत का ध्यान विशाल चुनावी पैमाने, अनेक भाषाओं और तेजी से फैलने वाली ऑनलाइन सामग्री के बीच नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री को तुरंत हटाने पर केंद्रित है.
वहीं यूके पारदर्शिता नियमों, नियामकीय समन्वय और मतदाताओं को सही जानकारी उपलब्ध कराने पर ज्यादा जोर देता है. दोनों देशों का अनुभव यह दिखाता है कि AI केवल चुनावी तकनीक नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखने की एक बड़ी परीक्षा भी बन चुका है.
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-भारत एक्सप्रेस
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