मैथिली की एक कहानी है ललका पाग. मशहूर साहित्यकार राजकमल चौधरी ने ये कहानी 1955 में वैदेही पत्रिका के कथा विशेषांक के लिए लिखी थी. मिथिला के बारे में, वहां के लोगों के लिए पाग की अहमियत अगर किसी को समझनी हो तो ये कहानी एक छोटी-सी बानगी हो सकती है. कहानी कुछ ऐसी है कि एक आदमी (राधाकांत) की दूसरी शादी होनी है. उसकी पहली पत्नी (तिरु) घर में ही है और दूसरी शादी के लिए बारात निकलने की तैयारी है. शादी के लिए जरुरी है कि दूल्हे के सिर पर ललका पाग (लाल रंग का पाग) हो. पूरे घर में पाग ढूंढने की तैयारी हो रही है लेकिन पाग नहीं मिल पाता है. कुछ लोग कहते हैं कि क्या हुआ पाग नहीं तो क्या, बारात तो निकल ही सकती है. लेकिन सब मना हो जाता है, ललका पाग नहीं तो शादी नहीं. पहली पत्नी ये पूरा तमाशा दुखी मन से देख रही है. आखिर में जब कोई समाधान नहीं निकलता है तो वो अपनी शादी का संदूक खोलती है और अपनी शादी वाला ललका पाग निकालकर अपने पति को दूसरी शादी के लिए सिर पर सजा देती है. पत्नी के कलेजे पर पत्थऱ होता है तो पति के सिर पर पहाड़. शादी के लिए उसके पांव घर से निकल नहीं पाते हैं. वो शादी कैंसिल कर देता है. ये पाग का मान है, उसका वजन, उसकी वैल्यू है.
पाग: सिर्फ टोपी नहीं, एक इमोशन
पाग सिर पर सजाए जाने वाली एक टोपी नहीं, कोई मुकुट नहीं, एक इमोशन है. ये वो इमोशन है, जो सिर्फ उस इलाके के लोग ही समझ सकते हैं या वही समझ सकते हैं जिन्हें मिथिला, मैथिली और मिथिलांचल की रीत और संस्कारों का ज्ञान हो. जिन्हें इस बात का बोध नहीं, वो इसे भरी सभा में उछालना कौन पूछे कचरा डालकर डस्टबिन में भी डाल सकते हैं.
मिथिला के पाग वाली राजनीति
पाग की चर्चा इसलिए करनी आज लाजिमी हो गई थी क्योंकि मिथिला का पाग चर्चा में है. चर्चा में इसलिए क्योंकि सुर की सवारी करके राजनीति में कूदी मिथिला की बेटी मैथिली के सम्मान में पाग का अपमान हुआ, उसे भरी सभा में दो टके की टोपी की तरह उछाल दिया गया. केतकी सिंह यूपी से आती है. निर्वाचित विधायक है. शायद उन्हें बिहार की समझ नहीं है. समझ होती तो अपनी पार्टी की उम्मीदवार मैथिली ठाकुर के प्रचार में वो पाग को यूं ना उछालती. मैथिली को पाग से ऊपर नहीं बताती. पाग को उछालकर ये नहीं पूछती कि ये पाग क्या है, मिथिला का सम्मान पाग नहीं, मैथिली हैं. मैथिली ने इसपर कोई प्रतिकार नहीं किया. ना ही उनके पिता ने. नेता बनने की तैयारी जो है.
मिथिला का आतिथ्य और संस्कृति
मिथिला के लोग आतिथ्य में किसी को भी पीछे छोड़ देते हैं. इसलिए मिथिलांचल की शादी में तीन किलो मटन और सौ से डेढ़ सौ रसगुल्ले खाने के किस्से आपने भी सुने होंगे. ये कोई किंवदंती नहीं बल्कि हकीकत है. दिल्ली जैसे बड़े शहर में लोग चकित भी होते हैं और साथ ही कहते हैं कितने भदेसी हैं वहां के लोग. ये अजूबा नही आतिथ्य है, जो किसी एक बारात में एक नहीं बल्कि कई लोगों को इतना तक खिला देता है और वो खा भी लेते हैं. केतकी जी को कुछ दिन मिथिला का आतिथ्य स्वीकार करना चाहिए. बड़ी, अदौरी और तिलौरी से लेकर पान मखान से उनका सत्कार होता तो शायद उन्हें पाग की अहमियत का अंदाजा होता.
राजनीतिक महत्वाकांक्षा, पाग का अनादर
केतकी सिंह को एक बार को माफी भी दे सकते हैं क्योंकि उन्हें मिथिलांचल के बारे में उतना ज्ञान नहीं होगा. लेकिन मैथिली ठाकुर का क्या करें. अपनी सभा में पाग का अपमान कराने के बाद जब वो पाग में मखान खा सकती है तो फिर क्या ही उम्मीद की जाए? मैथिली अब मार्केट समझती है इसलिए शायद राजनीति में भी कूदी है. दिल्ली में मीडिया उनकी बैसाखी बनी और उस बैसाखी ने उन्हें बाजार की कामयाबी से रुबरु कराया. अब बीजेपी का टिकट हाथ में है, चुनाव सामने तो उन्हें विधानसभा की कुर्सी लगभग पक्की ही नजर आ रही होगी. इसमें किसी के लिए जलने जैसी कोई बात नहीं होनी चाहिए. कामयाबी की सीढी चढ़ने के लिए कब किसे कहां और किस रुप में इस्तेमाल करना है और अपनी मंजिल क्या रखनी है वो व्यक्तिगत और निजी फैसला है.
बदलते समय के साथ पाग
वक्त के साथ रीत परंपरा और मान्यताएं बदलाव देखती है. पाग के साथ भी ऐसा हुआ है. अब परंपरागत पाग अब डिजाइनर भी हो गए हैं. डिजाइनर पाग का जिक्र इसलिए किया क्योंकि मिथिला को जानने वाले समझते हैं वहां पर सफेद और लाल अमूमन दो ही तरीके के पाग चलन में हैं. दोनों ही पाग धोती के बनते हैं, जिसमें सिलाई नहीं होती है. सफेद पाग नियमित रूप से पाग पहनने वाले पंडित औऱ विद्वान ही पहनते हैं जबकि लालका पाग का इस्तेमाल शुभ कार्यों के लिए होता है. आजकल चलन में एक नए तरीके का पाग भी देखने में आ रहा है जिसमें मिथिला पेंटिंग की झलक भी दिखती है. प्रधानमंत्री मोदी को समस्तीपुर में आपने चुनावी रैली में पहने देखा होगा. ये पाग जमाने से कदमताल करता हुआ डिजाइनर पाग है.
अब जब पाग जमाने के हिसाब से बदल रहा है और मिथिलांचल के लोग उसे अपना भी रहे हैं तो पाग से जुड़ी संदेवना भी बदले तो किसी को किसी तरह की वेदना क्यों हो? नेता पाग पहने या उछाले उनकी जय जय जय करते रहिए..
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