किसी पुलिस अधिकारी का करियर सिर्फ पदों और पदोन्नतियों से नहीं बनता. कुछ अफसर ऐसे होते हैं जिनकी पहचान उन मामलों से बनती है, जिनकी जांच के दौरान देश की राजनीति, प्रशासन और कानून-व्यवस्था तीनों की निगाहें उन पर टिक जाती हैं. राकेश अस्थाना भी ऐसे ही अधिकारियों में गिने जाते हैं. चारा घोटाले की जांच से लेकर लालू प्रसाद यादव की गिरफ्तारी, गुजरात में गोधरा कांड और अहमदाबाद धमाकों की जांच, आसाराम प्रकरण, सीबीआई के भीतर का विवाद और दिल्ली पुलिस की कमान तक उनका करियर कई बेहद संवेदनशील अध्यायों से होकर गुजरा.
1984 बैच के गुजरात कैडर के भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी राकेश अस्थाना का जन्म 22 जुलाई 1961 को दर्ज है. उन्होंने 21 अगस्त 1984 को भारतीय पुलिस सेवा में नियुक्ति पाई. गुजरात सरकार और केंद्र की आईपीएस सिविल सूची में उनकी शैक्षणिक योग्यता इतिहास में एमए और प्रबंधन में डिप्लोमा दर्ज है. इसी सरकारी रिकॉर्ड में उनका मूल राज्य बिहार और कैडर गुजरात दर्ज है.
इतिहास के विद्यार्थी से पुलिस अधिकारी तक
अस्थाना की शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी उनके व्यक्तित्व को समझने का एक दिलचस्प पहलू है. उन्होंने इतिहास और प्रबंधन का अध्ययन भी किया. एक ओर इतिहास उन्हें घटनाओं को समय, समाज और परिस्थितियों के संदर्भ में देखने का आधार देता है, तो दूसरी ओर प्रबंधन की पढ़ाई बाद के वर्षों में बड़े पुलिस संगठनों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को संभालने में उपयोगी रही.
- जन्म : 22 जुलाई 1961
- भारतीय पुलिस सेवा : 1984 बैच
- कैडर : गुजरात
- शैक्षणिक योग्यता : एमए, इतिहास; प्रबंधन में डिप्लोमा
- आईपीएस नियुक्ति : 21 अगस्त 1984
- राष्ट्रपति पुलिस पदक : 2009
- सेवानिवृत्ति : 31 जुलाई 2022
चारा घोटाले ने बनाई अलग पहचान
राकेश अस्थाना के करियर का सबसे चर्चित शुरुआती अध्याय चारा घोटाले की जांच रहा. 1994 में वह सीबीआई के धनबाद पुलिस अधीक्षक के रूप में तैनात थे और इसी दौरान चारा घोटाले की जांच से जुड़े. बाद में इस मामले ने बिहार की राजनीति को हिला दिया और तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव तक जांच की आंच पहुंची.
2013 में रेडिफ को दिए एक विस्तृत साक्षात्कार में अस्थाना ने खुद चारा घोटाले की जांच, लालू प्रसाद यादव की गिरफ्तारी और जांच के दौरान सामने आए दबावों के बारे में बात की थी. उन्होंने बताया था कि बड़े और प्रभावशाली आरोपियों से जुड़े मामलों में जांच अधिकारियों पर नरमी बरतने का दबाव भी आता था. यही साक्षात्कार उनके करियर को समझने के लिए महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोतों में से एक है.
गोधरा और अहमदाबाद धमाकों की जांच
गुजरात लौटने के बाद अस्थाना का नाम राज्य की कई महत्वपूर्ण जांचों से जुड़ा. गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में आग लगने की घटना की जांच में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. बाद में यह मामला देश की सबसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से बहस वाले मामलों में शामिल हो गया.
अहमदाबाद में 2008 के सिलसिलेवार बम धमाकों की जांच में भी गुजरात पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण रही. 2009 में जब अस्थाना को राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया, तब गुजरात पुलिस और उस समय की मीडिया रिपोर्टों में गोधरा तथा अहमदाबाद धमाका जांच में उनकी भूमिका का उल्लेख किया गया था. भारत सरकार के गृह मंत्रालय की पदक सूची में उन्हें 2009 में राष्ट्रपति पुलिस पदक, विशिष्ट सेवा के लिए दर्ज किया गया है.
जांच अधिकारी से सीबीआई के शीर्ष पदों तक
अस्थाना का करियर केवल गुजरात पुलिस तक सीमित नहीं रहा. वह दोबारा केंद्रीय जांच ब्यूरो में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों पर पहुंचे. उन्होंने अगस्ता वेस्टलैंड, विजय माल्या और अन्य चर्चित मामलों से जुड़े जांच कार्यों की निगरानी की. 2016 में उन्होंने अंतरिम सीबीआई निदेशक की जिम्मेदारी भी संभाली और 2017 में उन्हें सीबीआई का विशेष निदेशक बनाया गया.
हालांकि विशेष निदेशक के रूप में उनकी नियुक्ति विवादों से भी घिरी. स्वयंसेवी संस्था कॉमन कॉज ने उनकी नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. याचिका में स्टर्लिंग बायोटेक से जुड़ी एक डायरी और अन्य आरोपों का हवाला दिया गया था. लेकिन 28 नवंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति में कोई अवैधता नहीं थी और याचिका खारिज कर दी.
करियर का सबसे विवादित दौर
2018 में राकेश अस्थाना और तत्कालीन सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के बीच विवाद ने जांच एजेंसी की साख पर ही सवाल खड़े कर दिए. दोनों पक्षों की ओर से गंभीर आरोप लगाए गए और मामला सार्वजनिक टकराव तक पहुंच गया. यह भारतीय जांच एजेंसी के इतिहास के सबसे असाधारण संस्थागत विवादों में गिना जाता है.
अस्थाना के लिए यह दौर सिर्फ प्रशासनिक चुनौती नहीं था, बल्कि उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर छवि से भी जुड़ा था. बाद की कानूनी प्रक्रिया में उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों पर सीबीआई की स्थिति बदली और मामले ने अदालतों का भी रुख देखा. इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया. क्या किसी जांच एजेंसी के शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों के बीच टकराव पूरी संस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है?
सीमा सुरक्षा से दिल्ली पुलिस तक
2020 में केंद्र सरकार ने अस्थाना को सीमा सुरक्षा बल का महानिदेशक नियुक्त किया. सरकारी आदेश में उन्हें बीएसएफ महानिदेशक बनाए जाने के साथ नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के महानिदेशक का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया था. इससे उनके करियर का दायरा जांच से बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा और बड़े सुरक्षा संगठन के नेतृत्व तक पहुंच गया.
इसके बाद जुलाई 2021 में उन्हें दिल्ली पुलिस आयुक्त नियुक्त किया गया. यह नियुक्ति इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि वह अपनी निर्धारित सेवानिवृत्ति से कुछ ही दिन पहले दिल्ली पुलिस की कमान में आए थे. दिल्ली पुलिस के आधिकारिक प्रकाशनों में उनके कार्यकाल के दौरान नागरिक-केंद्रित पुलिसिंग, संवाद और तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिखाई देता है.
दिल्ली पुलिस में तकनीक पर जोर
दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में अस्थाना ने पारंपरिक पुलिसिंग के साथ तकनीक और जनता से सीधे संवाद पर भी जोर दिया. उनके कार्यकाल में सामाजिक माध्यम प्रकोष्ठ, नागरिक प्रतिक्रिया व्यवस्था, ई-चिट्ठा, साइबर पुलिसिंग, युवा केंद्रित कार्यक्रम और महिला सुरक्षा से जुड़े कई प्रयास सामने आए. उनके नेतृत्व में दिल्ली पुलिस ने जनता के साथ संवाद के लिए सामाजिक माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ाया. आधिकारिक प्रकाशनों में नागरिक-केंद्रित पुलिसिंग और पुलिस-जन संबंधों को मजबूत करने की बात कही गई.
करीब 38 साल की सेवा और सम्मान
राकेश अस्थाना को 2009 में राष्ट्रपति पुलिस पदक, विशिष्ट सेवा से सम्मानित किया गया था. उस समय वह वडोदरा के पुलिस आयुक्त थे. गुजरात पुलिस के आधिकारिक पदक रिकॉर्ड में भी उनका नाम दर्ज है. 1984 में सेवा शुरू करने वाले अस्थाना ने 31 जुलाई 2022 को भारतीय पुलिस सेवा से विदाई ली. इस तरह उनका सक्रिय पुलिस सेवा का सफर करीब 38 वर्षों का रहा. एक ऐसा सफर जिसमें राज्य पुलिस से लेकर देश की प्रमुख जांच एजेंसी, सीमा सुरक्षा बल और राष्ट्रीय राजधानी की पुलिस तक की जिम्मेदारियां शामिल रहीं.
राकेश अस्थाना की विरासत को कैसे देखा जाए?
राकेश अस्थाना की कहानी को केवल विवादों या उपलब्धियों में बांटना आसान नहीं है. उनके करियर का एक पक्ष उन्हें ऐसे जांच अधिकारी के रूप में दिखाता है जिसने चारा घोटाले, गोधरा और आतंकवाद से जुड़े मामलों जैसी कठिन जांचों में काम किया. दूसरा पक्ष उन्हें ऐसे वरिष्ठ पुलिस प्रशासक के रूप में दिखाता है जिसने सीबीआई, बीएसएफ और दिल्ली पुलिस जैसे संस्थानों में शीर्ष जिम्मेदारियां संभालीं. वहीं सीबीआई का आंतरिक विवाद, उनकी नियुक्तियों को लेकर उठे सवाल और राजनीतिक निकटता को लेकर बनी धारणाएं उनके करियर का दूसरा पहलू हैं.
राकेश अस्थाना की करीब चार दशक लंबी पुलिस यात्रा भारतीय पुलिस व्यवस्था के बदलते दौर की भी कहानी है. चारा घोटाले के कागजी घोटाले से लेकर आधुनिक साइबर अपराध, आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल पुलिसिंग तक उनकी जिम्मेदारियों का दायरा लगातार बदलता गया. उनकी सबसे बड़ी पहचान शायद किसी एक पद या एक मामले से नहीं, बल्कि उन संवेदनशील परिस्थितियों से बनी जिनमें उन्हें फैसले लेने पड़े.
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