Retailers vs Ecommerce: भारत में ई-कॉमर्स का बाजार जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसने देश के करोड़ों छोटे व्यापारियों, पड़ोस की दुकानों और खुदरा व्यापार पर निर्भर कर्मचारियों की रातों की नींद उड़ा दी है. कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने इस खतरे को भांपते हुए सरकार से तत्काल एक मजबूत और प्रभावी ‘राष्ट्रीय ई-कॉमर्स नीति’ लागू करने का आग्रह किया है. कैट के राष्ट्रीय महामंत्री एवं सांसद प्रवीन खंडेलवाल पीयूष गोयल को एक पत्र लिखकर डेलॉइट और गूगल की संयुक्त रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़ों का हवाला देते हुए छोटे व्यापारियों की आजीविका सुरक्षित करने की मांग की है.
2030 तक Gen-Z का दबदबा ( On Deloitte-Google Report Retailers vs Ecommerce)
डेलॉइट और गूगल की संयुक्त रिपोर्ट “द $250 बिलियन कॉमर्स फ्रंटियर” भारत के डिजिटल कॉमर्स के बड़े विस्तार को दर्शाती है. रिपोर्ट के अनुसार भारत का ई-कॉमर्स बाजार जो 2025 तक 90 बिलियन डॉलर था, वह वर्ष 2030 तक 250 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. 2030 तक 22 करोड़ नए ‘जेन-ज़ी’ (Gen-Z) खरीदार ऑनलाइन बाजार से जुड़ेंगे, जो कुल ऑनलाइन खर्च का 45 प्रतिशत हिस्सा होंगे. 15 करोड़ नए खरीदार ऑनलाइन आएंगे और प्रति व्यक्ति ई-कॉमर्स खर्च दोगुना होने की संभावना है.
टियर-2 शहरों और छोटे नगरों का हिस्सा पहले ही 60 प्रतिशत से अधिक ऑनलाइन खरीदारों तक पहुंच चुका है. खंडेलवाल ने स्पष्ट किया कि ये आंकड़े विशाल संभावनाओं को तो दर्शाते हैं, लेकिन यदि इसे बिना नियमन के छोड़ दिया गया तो यह पारंपरिक खुदरा व्यापार को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा, जो आज भी देश में स्वरोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है.
ई-कॉमर्स कंपनियों पर आरोप ( Retailers vs Ecommerce In India)
कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बी. सी. भरतिया ने आरोप लगाया है कि बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां परोक्ष इन्वेंट्री स्वामित्व, पसंदीदा विक्रेता व्यवस्था और भ्रामक कारोबारी ढांचे के माध्यम से भारत की एफडीआई (FDI) नीति की भावना का लगातार उल्लंघन कर रही हैं. जिसे मार्केटप्लेस मॉडल की अनुमति दी गई थी, वह अब इन्वेंट्री नियंत्रित मॉडल में बदलता जा रहा है.
‘प्रिडेटरी प्राइसिंग’ (लागत से कम मूल्य पर बिक्री), भारी छूट, डार्क स्टोर्स (Dark Stores), डार्क पैटर्न्स और पक्षपातपूर्ण लिस्टिंग जैसी प्रवृत्तियां आम हो गई हैं, जो उन लाखों ईमानदार व्यापारियों को समाप्त कर रही हैं जिन्होंने भारतीय बाजार का निर्माण किया है.
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ई-कॉमर्स नीति लागू करने की मांग
इस व्यवस्था को कमजोर होने से बचाने के लिए कैट ने सरकार से तत्काल एक व्यापक राष्ट्रीय ई-कॉमर्स नीति लागू करने का आग्रह किया है. इसमें निम्न बिंदुओं को शामिल करने का आग्रह किया गया है.
- एफडीआई नियमों का सख्त पालन और ‘प्रिडेटरी प्राइसिंग’ पर पूरी तरह रोक
- डार्क स्टोर्स का नियमन और एल्गोरिद्म व विक्रेता रैंकिंग में पारदर्शिता
- एमएसएमई (MSME) और छोटे व्यापारियों के लिए समान अवसर
- डाटा सुरक्षा और व्यापारियों व उपभोक्ताओं के लिए समर्पित शिकायत निवारण तंत्र
पीएम मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’, स्थानीय उद्यमिता और मजबूत घरेलू बाजार के विजन का हवाला देते हुए कैट ने कहा कि विदेशी पूंजी से संचालित कंपनियों को स्थानीय व्यापार को खत्म करने की छूट देना इस राष्ट्रीय दृष्टि के विपरीत है. श्री खंडेलवाल ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, “भारत तकनीक और नवाचार का स्वागत करता है, लेकिन डिजिटल विकास निष्पक्ष, पारदर्शी और समावेशी होना चाहिए. ई-कॉमर्स को भारत के खुदरा व्यापार का पूरक बनना चाहिए, उसका विनाशक नहीं.”
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