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GST के 8 साल: मोदी सरकार के ऐतिहासिक टैक्स रिफॉर्म्स ने भारत को टॉप ‘शेयर बाज़ार’ में बदल डाला, ऐसे मिला फायदा

जुलाई 2025 में ‘वन नेशन, वन टैक्स’ यानी GST के आठ साल पूरे हुए. इसने भारत को एकीकृत बाजार में बदल दिया है. जानें कैसे यह व्यवस्था मूल्य वृद्धि पर कर लगाकर पारदर्शिता, कर सुधार और आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है.

GST

GST के आठ साल पूरे.

जुलाई 2025 में ‘वन नेशन, वन टैक्स’ के आठ साल पूरे हो गए हैं. 8 साल पले लागू की गई इस व्यवस्था ने भारत को एक शेयर बाज़ार में बदल दिया. इससे सामान और सेवाओं (Goods And Services) की आपूर्ति पर गंतव्य-आधारित, मल्टी लेवल टैक्स लागू होता है. निर्माण से लेकर उपभोग तक हर स्तर पर लगाया गया टैक्स अगले चरण में क्रेडिट के रूप में एडजस्ट होता है. इसी कारण जीएसटी को हर चरण में केवल मूल्य वृद्धि पर लगाया गया टैक्स कहते हैं.

मई 2025 में जीएसटी संग्रहण 2.01 लाख करोड़ रुपये रहा. अप्रैल में यह 2.37 लाख करोड़ रुपये था. चालू वित्तवर्ष में औसत मासिक संग्रह 1.84 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा है. पिछले वित्तवर्ष 2023-24 में यह औसत 1.68 लाख करोड़ था और 2022-23 में 1.51 लाख करोड़. इससे साफ है कि जीएसटी ने बड़ी योजना और सटीक क्रियान्वयन को जोड़ने में सफलता पाई है.

1954 में फ्रांस ने सबसे पहले लागू किया था GST

दुनिया में सबसे पहले 1954 में फ्रांस ने जीएसटी लागू किया. वहां इसका मानक दर करीब 20 प्रतिशत रही. न्यूजीलैंड में 1986 में जीएसटी की शुरुआत 10 प्रतिशत से हुई थी, जो बढ़कर 15 प्रतिशत हुई. सिंगापुर में 1994 में जीएसटी तीन प्रतिशत से शुरू हुई और अब सात प्रतिशत है.

इंडोनेशिया में अप्रत्यक्ष कर दरें 10 से 35 प्रतिशत के बीच हैं. ब्राज़ील में खाने-पीने की चीज़ों पर औसत दर सात प्रतिशत है जबकि अधिकतर वस्तुओं पर 17–20 प्रतिशत तक टैक्स लगता है. अंतरराज्यीय सप्लाई पर भी 4 से 25 प्रतिशत तक उपकर वसूला जाता है. इसलिए भारत की बहु-स्तरीय दरों को अक्षम कहना उचित नहीं है.

भारत में जीएसटी का ढांचा बहुत ही खास है. यहां 1.4 अरब से ज्यादा की आबादी और उनके अलग-अलग उपभोग पैटर्न को ध्यान में रखना पड़ता है. 2017 में जब जीएसटी लागू हुई, तब लक्ष्य था कि 2-3 साल में दर करीब 15.5 प्रतिशत रहेगी. लेकिन फिलहाल यह दर 11.4 प्रतिशत के आस-पास ही है.

आज सिर्फ 28 वस्तुएं 28 प्रतिशत की उच्चतम दर में आती हैं. इनमें तंबाकू, कोल्ड ड्रिंक और महंगी गाड़ियां शामिल हैं. बाक़ी ज़्यादातर वस्तुएं गरीबों और मध्यमवर्ग के हित में कम दरों पर टैक्स में हैं. धार्मिक यात्राओं पर सिर्फ पांच प्रतिशत टैक्स है. इकॉनमी क्लास हवाई यात्रा पर पांच प्रतिशत और बिजनेस क्लास पर 12 प्रतिशत कर लगता है. 100 रुपये तक के सिनेमा टिकट पर कर 18 से घटकर 12 प्रतिशत हो चुका है. 100 रुपये से ऊपर के टिकट पर दर 28 से 18 प्रतिशत हो गई है. सैनेटरी पैड पर टैक्स पूरी तरह खत्म कर दिया गया है.

160 से अधिक देशों ने GST की गई लागू

दुनिया के 160 से अधिक देशों ने जीएसटी अपनाई है. उनमें से सिर्फ 49 देशों में एकल स्लैब है. 28 देशों में दो स्लैब हैं. बाकी सभी ने अपने हालात के अनुसार इसमें बदलाव किए हैं. यानी “वन साइज फिट्स ऑल” जैसी कोई बात नहीं है.

ई-वे बिल अब अनिवार्य हो चुका है. 10 किलोमीटर से ज्यादा दूरी के अंतरराज्यीय माल परिवहन पर यह बनाना जरूरी है. यह पूरी तरह डिजिटल है. इससे टैक्स चोरी पर लगाम लगी है. मई में 12.26 करोड़ ई-वे बिल बने. यह मार्च के रिकॉर्ड 12.45 करोड़ के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है.

मोदी सरकार ने अधूरी बनी मकानों पर जीएसटी 12 से घटाकर पांच प्रतिशत कर दिया. सस्ती आवास योजनाओं में इसे आठ से एक प्रतिशत किया गया. यह गरीबों के प्रति सकारात्मक सोच का उदाहरण है.

जीएसटी आने के बाद ट्रांसपोर्ट और फ्यूल सेक्टर में भी सुधार हुआ. अब ट्रकों को सीमा शुल्क या ऑक्ट्रॉय के लिए घंटों इंतजार नहीं करना पड़ता. जन धन खातों से जुड़ी सेवाएं पूरी तरह टैक्स फ्री हैं. यह “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” की भावना को साबित करता है.

फॉर्मल सिस्टम में काफी सुधार

भ्रष्टाचार और फर्जी बिलों पर रोक के लिए 2020 में ई-इनवॉयसिंग लागू हुई. पहले यह सिर्फ 500 करोड़ से अधिक सालाना कारोबार वालों पर था. अब 5 करोड़ से ज्यादा टर्नओवर वालों पर भी अनिवार्य है. जीएसटी से पहले करीब 495 फॉर्म भरने पड़ते थे. अब यह घटकर सिर्फ 12-13 फॉर्म ही रह गए हैं.

जीएसटी में “सिन गुड्स” पर ऊंचा टैक्स है ताकि लोग इनका उपयोग कम करें. जबकि आम उपभोग की चीजों पर या तो जीरो या पांच प्रतिशत टैक्स रखा गया है. जीएसटी काउंसिल में राज्यों को दो-तिहाई और केंद्र को एक-तिहाई वोट का अधिकार है. ज़्यादातर फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं.

सबसे बड़ी बात, जीएसटी में कोई छुपा कर नहीं लगता. जितना टैक्स है, वही दिखता है. कर चोरी घटने, दरें कम होने, निर्यात को बढ़ावा मिलने और कारोबार आसान होने से मध्यमवर्ग पर कर का बोझ हल्का हुआ है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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