भारत में कारोबार की दुनिया में सफलता की कहानियां अक्सर बड़े कारोबारी परिवारों, मोटी पूंजी और अच्छी डिग्रियों से जुड़ी दिखाई देती हैं. लेकिन किरण कुमार की कहानी इससे बिल्कुल अलग है. बचपन में आर्थिक तंगी के कारण स्कूल छोड़ने वाले किरण ने महज 12 साल की उम्र में काम शुरू किया. आज वही किरण कुमार ज्वेलरी कारोबार की दुनिया में एक बड़ा नाम हैं और उनकी कंपनी ललिता ज्वेलरी मार्ट करीब 11,250 करोड़ रुपये के वैल्यूएशन के साथ बाजार में उतरने की तैयारी कर रही है.
कंपनी का आईपीओ 1,700 करोड़ रुपये का है. इसका प्राइस बैंड 190 से 201 रुपये प्रति शेयर रखा गया है. इसमें 1,200 करोड़ रुपये के नए शेयर जारी किए जाएंगे, जबकि 500 करोड़ रुपये का हिस्सा ऑफर फॉर सेल यानी OFS होगा. OFS में कंपनी के फाउंडर और प्रमोटर किरण कुमार जैन अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे. आईपीओ से जुटाई जाने वाली नई पूंजी में से करीब 1,033.2 करोड़ रुपये दक्षिण भारत में 10 नए स्टोर खोलने पर खर्च किया जाना हैं.
किरण कुमार का बचपन आंध्र प्रदेश के नेल्लोर में बीता. वह अपने माता-पिता की आठवीं संतान थे. उनके पिता सर्राफा बाजार में अलग-अलग ज्वेलर्स के यहां अकाउंटेंट का काम करते थे. इतनी कमाई में पूरे परिवार का खर्च चलाना आसान नहीं था.
घर की आर्थिक हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कभी किसी शादी में जाने के लिए किरण को दोस्त से टी-शर्ट तक उधार लेनी पड़ी थी. आखिरकार परिवार की मजबूरियों के चलते पांचवीं कक्षा के बाद उनकी पढ़ाई रुक गई.
लेकिन पढ़ाई छूटने के बाद जिंदगी रुकी नहीं. करीब 12 साल की उम्र में उन्होंने नेल्लोर के ज्वेलरी बाजार में काम करना शुरू कर दिया. छोटी उम्र में ही उन्होंने कारोबार की बारीकियां समझनी शुरू कर दीं और यही अनुभव आगे चलकर उनके लिए सबसे बड़ी पूंजी साबित हुआ.
मां की चार चूड़ियों से शुरू हुआ सफर
ज्वेलरी बाजार में काम करते हुए किरण ने एक अहम बात पर गौर किया. नेल्लोर में तैयार होने वाले गहने चेन्नई और हैदराबाद जैसे बड़े बाजारों तक पहुंचते थे. उनके मन में सवाल आया कि अगर बीच के लोगों के बजाय वह खुद इन बाजारों में माल बेचें, तो ज्यादा कमाई हो सकती है.
विचार अच्छा था, लेकिन शुरुआत के लिए पैसे नहीं थे. ऐसे समय में उनकी मां ने उनका साथ दिया. उन्होंने अपने पास मौजूद सोने में से चार चूड़ियां किरण को दे दीं. इनका वजन करीब 48 ग्राम था.
किरण ने उन चूड़ियों से छह जोड़ी बालियां तैयार कराईं और फिर उन्हें बेचने के लिए चेन्नई निकल पड़े. उनके पास न बड़ी दुकान थी, न बड़ी पूंजी और न ही किसी कारोबारी परिवार का सहारा. बस भरोसा था कि मेहनत का फल मिलेगा.
चेन्नई में मिला पहला बड़ा मौका
चेन्नई के टी नगर में उनकी मुलाकात उस समय ‘ललिता ज्वेलरी’ के मालिक एम. एस. कंदासामी पिल्लई से हुई. जब किरण वहां पहुंचे, तब रात हो चुकी थी और दुकान बंद होने वाली थी. पिल्लई ने उनके गहनों की गुणवत्ता देखी और उन्हें शुरुआत में 100 ग्राम का ऑर्डर दिया.
किरण ने काम करके भरोसा कायम किया और जल्द ही ऑर्डर बढ़कर 200 ग्राम हो गया. इसके बाद नेल्लोर और चेन्नई के बीच उनका आना-जाना शुरू हो गया. उस दौर में यह सफर आज की तरह आसान नहीं था. वह सरकारी बसों से यात्रा करते और लगातार कारोबार बढ़ाने में जुटे रहते.
धीरे-धीरे उनका थोक कारोबार इतना फैल गया कि उनके बनाए गहने विदेशों तक जाने लगे. कनाडा, लंदन, सिंगापुर और दुबई जैसे बाजारों में भी उनकी पहुंच बन गई.
किरण कुमार की जिंदगी में 24 फरवरी 1999 का दिन बेहद अहम साबित हुआ. जिस ‘ललिता ज्वेलरी’ से उन्होंने अपने कारोबारी सफर की शुरुआत की थी, उसके मालिक एम. एस. कंदासामी पिल्लई आर्थिक मुश्किलों और भारी कर्ज में फंस गए थे.
किरण के उनके साथ पहले से अच्छे कारोबारी संबंध थे. ऐसे में उन्होंने उस कारोबार को संभालने का फैसला किया. खास बात यह थी कि उन्होंने सिर्फ दुकान नहीं संभाली, बल्कि उसकी पुरानी देनदारियां भी चुकाईं. इसके बाद उन्होंने ब्रांड का नाम बदलकर ‘ललिता ज्वेलरी’ यानी Lalithaa Jewellery कर दिया.
यहीं से किरण के कारोबार ने थोक बाजार से निकलकर सीधे आम ग्राहकों तक पहुंचने की दिशा में कदम रखा.
रिटेल कारोबार में किरण के सामने एक नई चुनौती थी. अब उन्हें उन ग्राहकों से सीधे बात करनी थी जो अपनी जिंदगी की बचत से सोना खरीदते हैं. उन्होंने जल्द समझ लिया कि ज्वेलरी खरीदते समय ग्राहकों की सबसे बड़ी चिंता कीमत को लेकर होती है. मेकिंग चार्ज, वेस्टेज और दूसरे शुल्कों के कारण आम ग्राहक के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वह वास्तव में कितना भुगतान कर रहा है.
किरण ने इसी परेशानी को अपना कारोबारी मॉडल बना लिया. उन्होंने कीमतों में पारदर्शिता, बीआईएस हॉलमार्क वाले सोने और अपेक्षाकृत कम मार्जिन पर जोर दिया. उनका लक्ष्य एक ग्राहक से ज्यादा कमाई करना नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों का भरोसा जीतना था.
उनकी मार्केटिंग भी इसी सोच पर आधारित रही. विज्ञापनों में ग्राहकों को कीमत की तुलना करने के लिए प्रोत्साहित किया गया. यह तरीका धीरे-धीरे लोगों को पसंद आया. ज्वेलरी जैसे कारोबार में, जहां भरोसा सबसे बड़ी चीज माना जाता है, किरण ने इसी भरोसे को अपनी पहचान बना लिया.
आज दक्षिण भारत में बड़ा नेटवर्क
वह छोटी शुरुआत अब एक बड़े रिटेल नेटवर्क में बदल चुकी है. कंपनी के पास दक्षिण भारत के पांच राज्यों में 51 शहरों में कुल 61 शोरूम हैं. आंध्र प्रदेश में 23, तमिलनाडु में 20, तेलंगाना में 10, कर्नाटक में 7 और पुडुचेरी में एक स्टोर है. कंपनी के पास तमिलनाडु में अपनी मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी भी है.
कारोबार के आंकड़े भी कंपनी की तेजी से बढ़ती स्थिति दिखाते हैं. वित्त वर्ष 2024 में कंपनी का रेवेन्यू 16,800.62 करोड़ रुपये था. वित्त वर्ष 2025 में यह बढ़कर 16,907.88 करोड़ रुपये हुआ और वित्त वर्ष 2026 में इसमें बड़ा उछाल आया, जब रेवेन्यू 25,039.80 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
मुनाफे में भी मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई. वित्त वर्ष 2024 में टैक्स के बाद कंपनी का मुनाफा 359.83 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 1,009.82 करोड़ रुपये हो गया. इसी अवधि में कंपनी की कुल संपत्ति 5,182.26 करोड़ रुपये से बढ़कर 10,945.14 करोड़ रुपये हो गई.
आईपीओ दस्तावेजों में शामिल क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022 से 2024 के बीच ऑपरेटिंग रेवेन्यू की ग्रोथ के मामले में ललिता ज्वेलरी देश की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ने वाली क्षेत्रीय ज्वेलरी कंपनियों में रही.
किरण कुमार की कहानी सिर्फ एक सफल कारोबारी की कहानी नहीं है. इसमें उस दौर की तस्वीर भी दिखाई देती है जब उनके पास शुरुआत करने के लिए अपनी पूंजी तक नहीं थी. मां की चार चूड़ियों से शुरू हुआ कारोबार आज हजारों करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका है.
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-भारत एक्सप्रेस
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