गुजरात के कच्छ जिले में स्थापित मुंद्रा पोर्ट केवल जहाजों से माल चढ़ाने और उतारने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के निजी क्षेत्र में विकसित सबसे बड़ा और रणनीतिक समुद्री व्यापारिक केंद्र बन चुका है. उत्तर और पश्चिम भारत के औद्योगिक गलियारों को वैश्विक बाजारों से जोड़ने वाला यह पोर्ट देश के आयात-निर्यात (EXIM) की जीवनरेखा माना जाता है. किंतु इसकी गगनचुंबी व्यावसायिक सफलताओं के बीच नीति-निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के सामने यह बुनियादी सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या एक बड़े निजी ऑपरेटर का बढ़ता दबदबा भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत कर रहा है, या फिर यह व्यापारिक ढांचे में आर्थिक शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण का कारण बन रहा है?
मुंद्रा की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त के 3 बड़े स्तंभ
मुंद्रा पोर्ट की सफलता केवल उसके भौगोलिक रूप से समुद्र किनारे स्थित होने से नहीं है, बल्कि इसके पीछे तीन मजबूत ढांचागत कारण हैं:
मजबूत हिंटरलैंड कनेक्टिविटी: समर्पित रेल नेटवर्क, राष्ट्रीय राजमार्ग और समुद्री रूट मिलकर उत्तर भारत के विनिर्माण केंद्रों को सीधे और तेजी से पोर्ट से जोड़ते हैं.
मल्टी-कार्गो हैंडलिंग क्षमता: एक ही परिसर के भीतर कंटेनर, कच्चा तेल, कोयला, रसायन, तरल पदार्थ, ऑटोमोबाइल और भारी मशीनरी संभालने के अत्याधुनिक टर्मिनल मौजूद हैं.
पोर्ट और लॉजिस्टिक्स का एकीकृत मॉडल: बंदरगाह के साथ-साथ माल भंडारण (वेयरहाउसिंग), इनलैंड कंटेनर डिपो (ICD) और विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) का समन्वय कारोबारियों के लिए समय और लेनदेन की लागत कम करने की क्षमता देता है.
आर्थिक ताकत: आंकड़े क्या बताते हैं?
कंपनी की वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) की परिचालन और वित्तीय रिपोर्ट समूह के बढ़ते वित्तीय प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाती है:
वित्तीय व परिचालन पैमाना (FY 2025-26) आंकड़े सालाना वृद्धि (YoY)
APSEZ कुल कार्गो थ्रूपुट 500.8 मिलियन टन (MT) 11%
मुंद्रा पोर्ट कार्गो थ्रूपुट 192 मिलियन टन (MT) – (FY25 में 200.7 MT)
मुंद्रा पोर्ट की स्थापित क्षमता 274 मिलियन टन (MT) –
APSEZ समेकित राजस्व (Revenue) ₹38,736 करोड़ 25%
APSEZ समेकित EBITDA ₹22,851 करोड़ 20%
(स्रोत: APSEZ FY26 परिणाम एवं परिचालन रिपोर्ट. राजस्व और EBITDA पूरे समूह के हैं)
ये आंकड़े जहां एक ओर समूह के बहुआयामी विस्तार की गवाही देते हैं, वहीं दूसरी ओर मुंद्रा पोर्ट की स्थापित क्षमता (274 MT) और वास्तविक उपयोग (192 MT) के बीच का अंतर यह रेखांकित करता है कि मुंद्रा के व्यक्तिगत प्रदर्शन और पूरे APSEZ समूह की वृद्धि को अलग-अलग संदर्भों में जांचने की जरूरत है.
सबसे बड़ा जोखिम: क्या समुद्री व्यापार कुछ हाथों में सिमट रहा है?
राष्ट्रीय स्तर पर APSEZ की हिस्सेदारी अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुकी है. FY26 के आंकड़ों के मुताबिक, देश के कुल पोर्ट कार्गो का लगभग 27.1% और कुल कंटेनर कार्गो का 45.5% हिस्सा अकेले APSEZ नेटवर्क संभालता है.
बड़े पैमाने के निवेश से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परिचालन दक्षता और जहाजों का टर्नअराउंड समय जरूर सुधरता है, लेकिन बाजार की निर्भरता जब किसी एक बड़े ऑपरेटर पर अत्यधिक बढ़ जाती है, तो कई रणनीतिक चुनौतियां पैदा होती हैं:
क्या भारतीय निर्यातकों और आयातकों के पास व्यावहारिक रूप से पर्याप्त वैकल्पिक बंदरगाह उपलब्ध हैं?
क्या लॉजिस्टिक्स एकीकरण से होने वाली लागत बचत का वास्तविक लाभ व्यापारियों तक पहुंच रहा है, या टर्मिनल और स्टोरेज शुल्कों के जरिए ऑपरेटर का मुनाफा बढ़ रहा है?
किसी तकनीकी खराबी, हड़ताल या प्राकृतिक आपदा की स्थिति में क्या सरकारी या अन्य निजी बंदरगाह इस अतिरिक्त भार को संभालने में सक्षम हैं?
पर्यावरण, आजीविका और जमीन से जुड़े विवाद
विकास की तेज रफ्तार के साथ तटीय पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. गहरे समुद्र में निरंतर ड्रेजिंग, भारी औद्योगिक निर्माण और तटीय भूमि के अधिग्रहण से स्थानीय मछुआरा समुदायों की आजीविका और मैंग्रोव वनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. अदाणी समूह की अपनी 2026 की मटेरियलिटी रिपोर्ट में भी यह बात स्वीकार की गई है कि पोर्ट संचालन से समुद्री जैव विविधता और मछली संसाधनों पर निर्भर समुदायों की दिनचर्या प्रभावित हो सकती है.
इसके अलावा, मुंद्रा क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण को लेकर कानूनी विवाद भी सामने आते रहे हैं. फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने कच्छ के नविनाल गांव की करीब 108 हेक्टेयर गौचर (चरागाह) भूमि वापस लेने के गुजरात सरकार के आदेश को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन मानते हुए रद्द कर दिया था और उचित प्रक्रिया के तहत नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया था. यह मामला दर्शाता है कि विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में स्थानीय ग्राम पंचायतों के अधिकार और प्रशासनिक पारदर्शिता कितने संवेदनशील पहलू हैं.
क्षमता विस्तार के साथ जवाबदेही भी जरूरी
भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अग्रणी बनने के लिए निश्चित रूप से विश्वस्तरीय और विशाल बंदरगाहों की आवश्यकता है. लेकिन भविष्य की सफलता सिर्फ क्रेन लगाने या नए बर्थ बनाने से तय नहीं होगी. कसौटी यह होनी चाहिए कि प्रति टन कार्गो हैंडलिंग की लागत में कितनी कमी आई, स्थानीय युवाओं को कितना स्थायी रोजगार मिला और पर्यावरण की कितनी निष्पक्ष रक्षा हुई. मुंद्रा की सफलता को तभी समग्र राष्ट्रीय उपलब्धि माना जाएगा, जब इसका लाभ कॉरपोरेट बैलेंस शीट के साथ-साथ देश के अंतिम निर्यातक और स्थानीय नागरिक तक पारदर्शी रूप से पहुंचे.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



