'धुरंधर' में अक्षय खन्ना के किरदार रहमान डकैत की कहानी
Rehman Dakait Dhurandhar Akshaye Khanna: सिनेमा के पर्दे पर इन दिनों फिल्म ‘धुरंधर’ का जलवा है. अक्षय खन्ना की एंट्री, ‘FA9LA’ गाने की धुन और उनका वो मिनिमल डांस स्टाइल दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा है. फिल्म में वो एक खूंखार गैंगस्टर के रोल में हैं, लेकिन हकीकत अक्सर फसाने से ज्यादा खौफनाक होती है. अक्षय खन्ना ने जिस रहमान डकैत (सरदार अब्दुल रहमान बलोच) का किरदार निभाया है, उसकी असल जिंदगी की दास्तान किसी फिल्मी पटकथा से कहीं ज्यादा रोंगटे खड़े करने वाली है. यह खून-खराबे से भरी और राजनीति, पुलिस, अंडरवर्ल्ड की अदृश्य डोरियों से जुड़ा वह नाम है जो कभी कराची की गलियों अपराधी किशोर था और कुछ वर्षों में अंडरवर्ल्ड का ‘क्राइम लॉर्ड’ बन बैठा.
यह कहानी है कराची के ल्यारी इलाके के उस ‘क्राइम लॉर्ड’ की जिसने अपनी मां के कत्ल से जुर्म की दुनिया में कदम रखा और जिसका अंत गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच हुआ. असल रहमान की जिंदगी ‘रॉबिन हुड’ से ‘डॉन’ तक का सफर थी, जहां खून की नदियां बहती रहीं. आइये जानें उसकी पूरी कहानी क्या है?
कराची बंदरगाह के पास बसा ल्यारी एक ऐसा इलाका है, जहां एक तरफ गरीबी और बेरोजगारी का अंधेरा है, तो दूसरी तरफ जुर्म की चमकती दुनिया. यही ल्यारी हमान के खेल का मैदान बना बना. दिलचस्प बात यह है कि इसी ल्यारी से जुल्फिकार अली भुट्टो और बेनजीर भुट्टो जैसे प्रधानमंत्री निकले, और इसी मिट्टी से बाबू डकैत और रहमान बलोच जैसे अंडरवर्ल्ड डॉन भी पैदा हुए.
यहां से शुरू होती है कहानी
कहानी साल 1976 से शुरू होती है. कुछ रिपोर्ट में इस तारीख को अलग-अलग बताया जाता है. खैर हम आगे बढ़ते हैं, इलाके में दाद मोहम्मद उर्फ दादल और शेर मोहम्मद ड्रग्स के धंधे में मशहूर थे. स्थानीय लोग दावा करते हैं कि दाद मोहम्मद ने यहां लाइब्रेरी, ईदगाह, सिलाई सेंटर और बॉक्सिंग क्लब बनवाए. हालांकि, रिकॉर्ड में तो उन्हें ड्रग्स और हत्या के मुकदमों का अपराधी बताया जाता है. इन्हीं के घर सरदार अब्दुल रहमान बलोच का जन्म होता है. कहते हैं ना एक बार जो रास्ता चुना, वो मौत तक साथ निभाया. यही हुआ रहमान के साथ. वो बात अलग है कि उसे जुर्म विरासत में मिला था. एक तरफ चमक, दूसरी तरफ ल्यारी की बेरोज़गारी, तंग गलियों और गैंगवॉर के बीच पला-बढ़ा और उसे ही अपनी जिंदगी में अपना लिया.
पहली बार उठाया हथियार
आपने एक कहावत तो सुनी होगी कि ‘पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं’. यही रहमान के साथ भी यही हुआ. बचपन से अपराध और खून के बीच पला रहमान अपनी विरासत को आगे ले जाने के लिए तैयार था. महज 13 साल की उम्र में उसने अपने जीवन में पहली बार छूरा उठाया उसके बाद सिससिला चलता रहा. 6 नवंबर 1989 को एक व्यक्ति को छुरा मारकर घायल कर दिया. कारण केवल इतना था कि उस व्यक्ति ने पटाखे फोड़ने से मना किया था. हालांकि, जो वाकया उसे एक दरिंदे के रूप में स्थापित करता है, वह है साल 1995 में अपनी ही मां की हत्या.
15 साल में मां का कत्ल
पुलिस रिकॉर्ड और स्थानीय कहानियों में इसके अलग-अलग भयानक रूप मिलते हैं. एक तरफ कहा जाता है कि उसने अपनी मां को चरित्र के शक में गोली मार दी थी. वहीं, दूसरी रिपोर्ट्स कहती हैं कि उसने अपनी मां का गला रेता और उन्हें घर में ही दफना दिया. वजह चाहे जो हो, 15 साल की उम्र में मां के खून से हाथ रंगने वाले रहमान ने यह साबित कर दिया था कि उसके दिल में रहम की कोई जगह नहीं है.
पहला मर्डर जहां से बना क्राइम लॉर्ड का रास्ता
कहानी में थोड़ी पीछ चलते हैं. 6 नवंबर 1989 को छूरा से ही रहमान अपने पिता दाद मोहम्मद उर्फ दादल और चाचा शेर मोहम्मद के साथ नशे के व्यापार में उतर गया था. पिता और चाचा उसे कुछ हद तक खून से दूर रखते थे लेकिन छोटे मोटे विवाद वो खुद सुलझाता रहता था. इसे बीच साल 1988 में एक जमीन के विवाद में उसके चचेरे भाई की हत्या हो गई. 1992 में ड्रग्स के धंधे में झगड़े के चलते रहमान और उसके दोस्त आरिफ ने नदीम अमीन और नन्नू की गोली मारकर हत्या कर दी. यह उसके हाथों से हुआ पहला मर्डर था.
चाचा की हत्या से सुलगा गुस्सा
कुछ समय बात चाचा ताज मोहम्मद की बाबू डकैत गिरोह द्वारा हत्या हो गई. चाचा और भाई की मौत के बाद रहमान काफी अकेला हो गया था. इसके साथ ही उसके मन में बदले की भावना भी सुलग रही थी. इस मौके को भांपते हुए अंडरवर्ल्ड के बड़े नाम हाजी लालू, रहमान पर रहम करने के लिए आगे आ गया. ऐसा इसलिए क्योंकि, हाजी और रहमान का दुश्मन एक ही था और वो था बाबू डकैत. दोनों में नजदीकी हुई और ये यारी चल पड़ी. यहीं से रहमान को अपराध की दुनिया में पीछे से धक्का नहीं बल्कि मुकम्मल सहारा मिल गया.
अब बन गया था रहमान डकैत का नाम
नदीम अमीन और नन्नू की हत्या के बाद रहमान डकैत का नाम बन गया था. इसी बीच रहमान की दोस्ती रऊफ नाजिम और आरिफ से हो गई. दोनों के पिता ड्रग्स के कारोबार में थे. ये दोस्ती जल्दी ही एक गैंग में बदल गई, जहां आरिफ सरगना था लेकिन रहमान जल्दी ही आगे निकल गया. हाजी लालू जैसे डॉन ने उसे संरक्षण ने उसे सहारा दिया. इसी बीच 1995 में पुलिस एनकाउंटर में आरिफ मारा गया, लेकिन रहमान भाग निकला. इसी साल उसने अपनी मां की हत्या की था.
2 साल रहा फरार लेकिन सियासत में बढ़ी करीबी
आरिफ के एनकाउंटर और मां की हत्या के बाद रहमान साल 1995–97 के बीच कई बार गिरफ्तार हुआ, फरार हुआ और फिर बलूचिस्तान जाकर छुप गया. इसी दौरान उसने तीन शादियां कीं और 13 बच्चों का पिता भी बन गया. पैसा इतना बढ़ा कि 2006 तक वह 34 दुकानें, 33 मकान, 12 प्लॉट और 150 एकड़ जमीन का मालिक बन गया. इसी बीच 1998 उसने में अपने चचेरे भाई की हत्या का बदला सुलेमान बिरोही को मारकर ले लिया.
सबसे खौफनाक चैप्टर
इस कहानी का सबसे खौफनाक अध्याय तो 20वीं सदी के अंत और 21 सदी के पहले साल में होता है. 2000 के दशक में रहमान ने ड्रग्स, रंगदारी, अपहरण और गुटखा के धंधे से साम्राज्य खड़ा किया. उसके गैंग ने दुश्मनों के सिरों की फुटबॉल बना दी थी. इसी कारण हाजी लालू के बेटे अरशद पप्पू से उसका झगड़ा होने लगा. अततः लालू और रहमान के बीच दूरी बढ़ गई. जब झगड़ा बढ़ा तो रहमान के खास आदमी फैजू की हत्या हो गई. इसके बाद शुरू हुआ ल्यारी का असली गैंगवॉर इस जंग में दोनों तरफ के रऊफ, पप्पू, अजीज, हसनूक जैसे सैकड़ों लोग मारे गए. रिपोर्ट बताती हैं कि इसमें करीब 3,500 से ज्यादा लोग मारे गए थे.
2001 में मिला पूरा साम्राज्य
साल 2000 की जंग इतनी भयंकर थी कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक इसकी दहशत पहुंची. 2001 में लालू की गिरफ्तारी के बाद रहमान ने पूरी गद्दी संभाल ली. उसका खौफ इस कदर था कि कहा जाता है कि उसके इशारे पर कराची भी थर्राने लगी थी. 2002 के बाद रहमान की ताकत इतनी बढ़ी कि ल्यारी में कौन चुनाव जीतेगा यह फैसला वही करता था. वह पीपुल्स अमन कमेटी का सरदार बना, स्कूल और अस्पताल खोले, और रॉबिन हुड जैसी छवि बनाई. एमक्यूएम और पीपुल्स पार्टी से उसके संबंध थे.
रहमान की बढ़ती ताकत ने MQM, PPP और खुफिया एजेंसियों को बराबर चिंतित किया. वह न सिर्फ अपराध चला रहा था बल्कि रंगदारी से लेकर कंटेनर ट्रैफिक, गुटखा फैक्ट्रियों और जुए तक—सब पर उसका पकड़ था. इस बीच राजनीतिक गठजोड़ डगमगाने लगे और रहमान सिस्टम की आंख की किरकिरी बन गया. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) और एमक्यूएम (MQM) जैसी पार्टियां अपने सियासी फायदे के लिए उसका इस्तेमाल करने लगीं. कभी उसे कुचलने की कोशिश होती, तो कभी पर्दे के पीछे से समर्थन दिया जाता.
राष्ट्रपति के फोन कॉल ने बचा लिया
18 जून 2006 का है. एनकाउंटर स्पेशलिस्ट चौधरी असलम (फिल्म में संजय दत्त का किरदार) ने क्वेटा में रहमान को दबोच लिया था. लेकिन गिरफ्तारी की घोषणा इसलिए नहीं हुई क्योंकि एनकाउंटर हुआ तो राजनीतिक भूकंप आ जाएगा. कुछ दिन रहमान को गुप्त पुलिस लाइनों में रखा गया. रहमान ने 79 हत्याओं का कबूलनामा दिया, जिसमें मां की हत्या शामिल थी. फिर एक रात पांच हथियारबंद लोग आए और रहमान को छुड़ा ले गए. रसूख इतना था कि उसने यह अफवाह भी फैला दी. मैंने पैसे देकर रिहाई खरीदी है.
‘चौधरी असलम ने एक राजनेता को बताया था कि जैसे ही उन्होंने रहमान को पकड़ा, उनके खुफिया फोन पर एक कॉल आई. दूसरी तरफ आसिफ अली जरदारी थे. जरदारी ने कथित तौर पर कहा, “मारना नहीं… कोई गलत काम नहीं करो. जो भी मुकदमे हैं, उसे अदालत में पेश करो.” सियासी दबाव के चलते उस वक्त रहमान की गिरफ्तारी रिकॉर्ड पर नहीं दिखाई गई और बाद में वह पुलिस हिरासत से ‘नाटकीय ढंग’ से फरार हो गया.’
सियासी समीकरण बदले और रहमान तीनों तरफ से घिर गया. पुलिस, पीपुल्स पार्टी और एमक्यूएम – सब उसके खिलाफ हो गए. चौधरी असलम, जिसे रहमान ने कई बार चकमा दिया था, अब उसके खून का प्यासा था. 2009 में पीपुल्स पार्टी और एमक्यूएम की नाराजगी, पुलिस की दुश्मनी ने रहमान को घेर लिया. 9 अगस्त को बलूचिस्तान जाते वक्त चौधरी असलम ने उसे पकड़ा. एक फोन कॉल से ट्रैक हुआ, और एनकाउंटर में रहमान और तीन साथी मारे गए. सरकारी रिपोर्ट्स कहती हैं ये असली मुठभेड़ थी, लेकिन परिवार ने फर्जी एनकाउंटर का आरोप लगाया, जो अदालत में लंबित है. उसका जनाजा ल्यारी के सबसे बड़े जनाजों में से एक था. पांच साल बाद, चौधरी असलम खुद तालिबान के हमले में मारा गया.
रहमान डकैत खूनी अध्याय बंद
रहमान डकैत की मौत के साथ ल्यारी के गैंगवार का एक खूनी अध्याय तो बंद हुआ, लेकिन हिंसा की जड़ें वहां अब भी गहरी हैं. फिल्म ‘धुरंधर’ में अक्षय खन्ना ने जिस किरदार को जीवंत किया है, वह असल जिंदगी में व्यवस्था की खामियों और सियासी गठजोड़ से पैदा हुआ एक ऐसा राक्षस था, जिसने अंततः अपने ही बनाने वालों को डस लिया. सच ही कहा गया है – “बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होय.” जुर्म के रास्ते का अंत हमेशा बुरा ही होता है.
कहते हैं, अपराध की राह पर चलने वाले का अंत हमेशा अंधेरे में होता है, लेकिन रहमान की कहानी सिस्टम के उस गठजोड़ की याद दिलाती है जहां राजनीति और जुर्म हाथ मिलाते हैं. ‘धुरंधर’ में अक्षय खन्ना का रोल इस हकीकत को परदे पर जीवंत करता है, लेकिन असल रहमान की जिंदगी एक चेतावनी है – गरीबी और सत्ता की छाया में अपराध कैसे फलता-फूलता है. फिल्म की सफलता (100 करोड़ से ज्यादा कमाई) बताती है कि ऐसी कहानियां दर्शकों को बांधती हैं, लेकिन हकीकत हमेशा ज्यादा डरावनी होती है.
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