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अमेरिका-इजरायल और ईरान की जंग पर NCMEI प्रमुख प्रो. शाहिद अख्तर का संदेश- इस्लाम सिर्फ़ नाम नहीं, अमन और इंसानियत का पैग़ाम

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (NCMEI) के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. शाहिद अख्तर ने अमेरिका-इसराइल और ईरान युद्ध अहम बातें कहीं. जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रोफ़ेसर ने क़ुरआन और हदीस की रोशनी में समझाई इंसानी जान की अहमियत

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राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (NCMEI) के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. शाहिद अख्तर

Vijay Ram Edited by Vijay Ram

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (NCMEI) के कार्यवाहक अध्यक्ष एवं जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रबंधन विभाग में प्रोफ़ेसर डॉ. शाहिद अख्तर ने मध्य एशिया में जारी ख़ूनी संघर्ष पर गहरी चिंता व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि दुनिया युद्ध की विभीषिका से बार-बार उठी है, लेकिन बेगुनाह नागरिकों का ख़ून आज भी बहाया जा रहा है, जो मानवता के लिए कलंक है.

‘शांति सभी धर्मों की बुनियादी ज़रूरत’
प्रो. अख्तर ने अपने बयान में कहा कि दुनिया के सभी बड़े धर्मों—इस्लाम, सनातन, ईसाइयत, जैन और बौद्ध धर्म—ने शांति को मानवता की सबसे बुनियादी ज़रूरत बताया है. उन्होंने इस बात पर रोशनी डाली कि ख़ुद ‘इस्लाम’ शब्द की उत्पत्ति ‘सलाम’ (शांति) से हुई है, जो इस बात का सबूत है कि इस धर्म का मूल संदेश अमन ही है.

‘एक बेगुनाह का क़त्ल, पूरी इंसानियत का क़त्ल’
अपने बयान में उन्होंने कुरआन की आयत का हवाला देते हुए कहा, सूरह अल-माइदा (5:32) में स्पष्ट निर्देश है: ‘जिसने एक निर्दोष मनुष्य को मारा, उसने गोया सारी मानवता को मार डाला.’ प्रो. अख्तर ने ज़ोर देकर कहा कि यह आयत इस्लाम के उस मौलिक सिद्धांत को रेखांकित करती है, जहां एक भी मासूम की हत्या को समस्त मानव जाति के क़त्ल के बराबर घोषित किया गया है.

‘फ़साद बरपाने वाले नुक़सान में हैं’
उन्होंने क़ुरआन की सूरह अल-बक़रा (2:27) से उद्धरण देते हुए चेतावनी दी कि ज़मीन में फ़साद (उपद्रव) फैलाने वाले लोग आख़िरकार नुक़सान उठाने वालों में से होते हैं. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इस्लाम हमेशा युद्ध की बजाय शांति और समझौते को तरजीह देता है.

‘दुश्मन से मिलने की तमन्ना न करो’
प्रो. शाहिद अख्तर ने पैगंबर मुहम्मद (स) की उस हदीस का भी ज़िक्र किया जिसमें युद्ध को ‘आख़िरी विकल्प’ बताया गया है. उन्होंने बुख़ारी की हदीस का हवाला देते हुए कहा कि नबी ने फ़रमाया: ‘दुश्मन से मिलने (युद्ध) की तमन्ना मत करो.’ उन्होंने यह भी बताया कि तिर्मिज़ी की हदीस के मुताबिक, ‘मोमिन वह है जिससे लोगों की जानें और माल सुरक्षित रहें.’

‘मीसाक़-ए-मदीना से शांति का पैग़ाम’
उन्होंने इस्लामी तारीख़ के अहम दस्तावेज़ ‘मीसाक़-ए-मदीना’ (मदीना का संविधान) का हवाला देते हुए कहा कि इस्लाम ने सदियों पहले ही सभी धर्मों और आस्थाओं के अस्तित्व को स्वीकार करने की सीख दी थी. उन्होंने अपने बयान को समाप्त करते हुए कहा कि इस्लाम का वास्तविक संदेश न्याय, इंसाफ़ और वैश्विक शांति की स्थापना है.



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