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पीएम मोदी के दोस्त बनेंगे अखिलेश? 2027 से पहले सपा से आने लगी पॉजिटिव वाइब; समर्थन के लिए 3 शर्त

Akhilesh Yadav Conditional Support to PM Modi: उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 से पहले देश की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है. महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने लिया बड़ा यू-टर्न लिए है. उन्होंने पीएम मोदी को भेजे ‘पॉजिटिव वाइब्स’ में समर्थन के लिए रख 3 शर्तें रखी हैं.

Akhilesh Yadav Conditional Support to PM Modi

Akhilesh Yadav Conditional Support to PM Modi: उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है. दिल्ली में संसद के आगामी मानसून सत्र को लेकर बढ़ती सियासी तपिश के बीच देश के सबसे बड़े सूबे से एक बेहद चौंकाने वाली और नई राजनीतिक पटकथा के संकेत मिल रहे हैं. मात्र तीन महीने पहले अप्रैल 2026 में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल का पुरजोर विरोध करने वाले सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अब अचानक एक बड़ा ‘यू-टर्न’ लेते हुए मोदी सरकार को सकारात्मक संकेत भेजे हैं. हालांकि, यह समर्थन बिना शर्त नहीं है; अखिलेश ने इसके बदले सरकार के सामने 3 बेहद कड़े और रणनीतिक पत्ते फेंके हैं.

मंगलवार, यानी 6 जुलाई को अखिलेश यादव एक कार्यक्रम में महिलाओं से संवाद कर रहे थे. इस दोरान उन्होंने कुछ ऐसा कहा कि देश में सियासी पंडितो के पास कयासों का एक बड़ा मुद्दा आ गया. आइये जानें उन्होंने ऐसा क्या कहा और उनके कहने पर क्यों इतने कयास लगाए जा रहे हैं?

अप्रैल से शुरू होती है कहानी (Akhilesh Yadav PM Modi Friend)

इस पूरी कहानी की पृष्ठभूमि तीन महीने पुरानी है. 16 अप्रैल 2026 को शुरू होती है. महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के मुद्दे पर संसद के भीतर तीखी बहस चल रही थी और माहौल पूरी तरह गर्म था. लोकसभा में विपक्ष के कड़े तेवरों के बीच भाषण देते हुए पीएम मोदी ने कहा था कि अखिलेश जी मेरे मित्र हैं, जो कभी-कभी हमारी मदद कर देते हैं.

हालांकि, उस समय अखिलेश यादव ने राजनीतिक मजबूरियों के चलते पीएम मोदी की उम्मीदों के अनुरूप मदद का हाथ आगे नहीं बढ़ाया था और सपा सांसदों ने विपक्ष के साथ खड़े होकर बिल के खिलाफ वोटिंग की थी, जिसके कारण सरकार इसे पास नहीं करा सकी थी. लेकिन अब, ठीक तीन महीने बाद मानसून सत्र के पहले अखिलेश यादव ने महिला संगठनों और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद अपनी रणनीति को पूरी तरह पलट दिया है.

समर्थन के लिए रखीं ये 3 बड़ी शर्तें (Akhilesh Yadav Support Women Reservation)

अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि यदि सरकार उनकी तीन सैद्धांतिक मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाती है, तो समाजवादी पार्टी संसद के भीतर महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को अपना समर्थन दे सकती है.

शर्त 1 (PDA का कोटा): महिला आरक्षण बिल के भीतर ही दलित, पिछड़े समाज (OBC) और अल्पसंख्यक मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से उचित प्रतिनिधित्व (कोटा के भीतर कोटा) सुनिश्चित किया जाए, ताकि समाज के हर वर्ग की महिलाओं को न्याय मिल सके.

शर्त 2 (उच्च सदन में सीट विस्तार): परिसीमन बिल के माध्यम से न केवल लोकसभा, बल्कि उच्च सदन यानी राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों में भी सीटों की संख्या बढ़ाई जाए और वहां भी महिला आरक्षण को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए.

शर्त 3 (2027 चुनाव से ही क्रियान्वयन): महिला आरक्षण को जनगणना और भविष्य के लंबे परिसीमन के चक्रव्यूह से अलग रखकर, सीधे आगामी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ही तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए.

ममता-उद्धव के सियासी हश्र से लिया सबक

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव का यह कदम केवल एक वैचारिक बदलाव नहीं, बल्कि 2027 के यूपी चुनाव को ध्यान में रखकर चली गई एक सोची-समझी ‘राजनीतिक आत्मरक्षा’ की चाल है. पिछले 90 दिनों में देश का पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है.

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पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक टूट हो चुकी है. टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग गुट बनाकर सरकार के पाले में खड़े होने का फैसला कर लिया. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के 9 में से 6 सांसद टूटकर एकनाथ शिंदे के साथ चले गए. तमिलनाडु से DMK भी विपक्ष के इस मोर्चे से दूरी बना चुकी है. इस भारी टूट के कारण विपक्षी गठबंधन कमजोर हो चुका है और NDA दो-तिहाई विशेष बहुमत के जादुई आंकड़े के बेहद करीब खड़ी है. अखिलेश बखूबी जानते हैं कि अब विरोध करके भी इस बिल को पास होने से रोकना नामुमकिन है.

‘महिला विरोधी’ टैग से बचने की कवायद (Akhilesh Yadav Monsoon Session)

अप्रैल में जब सपा ने इस बिल का विरोध किया था, तब बीजेपी ने उन्हें महिला सशक्तिकरण का विरोधी बताकर चौतरफा घेरा था. चूंकि उत्तर प्रदेश के चुनावों में महिला मतदाता एक बड़ा ‘साइलेंट टर्निंग पॉइंट’ साबित हो रही हैं, इसलिए अखिलेश 2027 से पहले ‘विलेन’ बनने का कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते.

इस रणनीति के जरिए अखिलेश यादव ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं. पहला, वे बिल के समर्थन में आकर खुद को प्रगतिशील दिखा रहे हैं और दूसरा, पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) महिलाओं की शर्त रखकर उन्होंने बीजेपी के पाले में ही गेंद डाल दी है. अब देखना दिलचस्प होगा कि संसद के मानसून सत्र में पीएम मोदी को अपने मित्र का साथ मिलता है या नहीं.



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