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बीजेपी की पिच पर फिसलेंगे अखिलेश यादव? यूपी चुनाव से पहले बदले अंदाज पर उठे सवाल

UP Assembly Elections 2027: अखिलेश यादव इन दिनों बदले अंदाज में नजर आ रहे हैं. मंदिर, सनातन समाजवाद पोस्टर और ब्राह्मण समाज को लुभाने की कोशिश उनकी नई रणनीति को सॉफ्ट हिंदुत्व बताया जा रहा है.

UP Assembly Elections 2027: समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव इन दिनों अलग ही रूप में दिखाई दे रहे हैं. राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी पर उन्होंने सधे हुए अंदाज में सवाल उठाए. शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के चरणों में बैठकर उन्होंने कहा कि पंडित जी जो कहेंगे वही करेंगे. इसके अलावा सपा दफ्तर पर सनातन ही समाजवाद है लिखे पोस्टर भी लगाए गए हैं. इन घटनाओं को उनकी बदली हुई चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.

क्या है चुनावी समीकरण?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव कुछ महीनों में हो सकते हैं और इसी वजह से अखिलेश के इस नए रुख पर चर्चा तेज है. 2022 में भी सपा ने ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश की थी. भगवान परशुराम की प्रतिमा लगवाई और खुद अखिलेश ने उसका अनावरण किया लेकिन नतीजों में ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ चला गया. आंकड़े बताते हैं कि करीब 98 फीसदी वोट बीजेपी को मिले थे. तब सवाल उठा था कि ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश में सपा ने ओबीसी और दलित वोट का कुछ हिस्सा खो दिया.

सॉफ्ट हिंदुत्व की बहस

अब तक पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की राजनीति करने वाले अखिलेश के इस नए अंदाज को मीडिया का एक वर्ग सॉफ्ट हिंदुत्व कह रहा है. यह भी साफ है कि हिंदुत्व बीजेपी की सबसे मजबूत पिच है. योगी आदित्यनाथ खुद भगवा वेश और गोरक्षपीठ के महंत के तौर पर हिंदुत्व के बड़े चेहरे हैं. ऐसे में इस मैदान पर अखिलेश का मुकाबला करना आसान नहीं होगा.

‘चले थे कमाने, पड़ गए गंवाने’ का खतरा

अरुण जेटली ने कभी कांग्रेस की सॉफ्ट हिंदुत्व राजनीति पर कहा था कि जब असली मौजूद है तो लोग नकली क्यों चुनेंगे? यही स्थिति सपा पर भी लागू होती दिख रही है. अगर अखिलेश यादव इस पिच पर उतरते हैं तो पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोट का ध्रुवीकरण कमजोर हो सकता है. वहीं सवर्ण वोट उतने अनुपात में शायद ही मिलें जितनी उम्मीद की जा रही है.

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दिल्ली में व्यस्त, लखनऊ में कमी

अखिलेश यादव इन दिनों सांसद के तौर पर दिल्ली में ज्यादा वक्त बिता रहे हैं. यूपी विधानसभा में नेता विपक्ष माता प्रसाद पांडेय को जिम्मेदारी दी गई है. उनकी उम्र और कम मुखर शैली के कारण विधानसभा में सपा की आवाज उतनी बुलंद नहीं हो पा रही. यही वजह है कि लखनऊ में पार्टी की मौजूदगी कमजोर दिखती है.

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-भारत एक्सप्रेस



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