अमृतसर, पंजाब: भारत-पाकिस्तान के बीच हालात सामान्य होने के बाद अटारी-वाघा बॉर्डर पर रिट्रीट सेरेमनी एक बार फिर से तय समयानुसार शुरू कर दी गई है. यह वही सैन्य परंपरा है जो पहले प्रतिदिन दोनों देशों के जवानों द्वारा पूरे जोश के साथ साझा रूप में की जाती थी, लेकिन पिछले महीने पहलगाम आतंकी हमले के बाद सुरक्षा कारणों से इसे अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था.
सीमित स्वरूप में हो रही सेरेमनी
हालांकि, रिट्रीट सेरेमनी दोबारा शुरू कर दी गई है, लेकिन यह अब सीमित स्वरूप में आयोजित की जा रही है. वर्तमान में दोनों पक्षों की संयुक्त परेड पूरी तरह शुरू नहीं हुई है. सिर्फ बीएसएफ द्वारा भारतीय पक्ष की ओर से परेड हो रही है, जबकि पाकिस्तान की ओर से पूर्ण सहभागिता नहीं हो रही है.
इसके अलावा, सेरेमनी के दौरान गेट अब भी नहीं खोले जा रहे हैं, और आम जनता को सीमित संख्या में ही कार्यक्रम देखने की अनुमति दी जा रही है. बीएसएफ द्वारा सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू किया गया है ताकि किसी भी तरह की सुरक्षा चूक न हो.
किसानों के लिए राहत
जहां एक ओर परेड में कुछ प्रतिबंध अभी भी जारी हैं, वहीं किसानों के लिए एक राहत भरी खबर है. सीमा पर लगे सभी फेंसिंग गेट अब खोल दिए गए हैं, जिससे सीमावर्ती गांवों के किसान अब अपनी फेंसिंग पार जमीनों पर सामान्य रूप से खेती करने के लिए आ-जा सकेंगे.
बीएसएफ अधिकारियों के अनुसार, सुरक्षा जांच के बाद सभी खेतों को बारूदी सुरंगों से मुक्त पाया गया, जिसके बाद गेट खोलने का निर्णय लिया गया. लगभग 28 दिनों के प्रतिबंध के बाद यह कदम किसानों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है.
कैबिनेट मंत्री ने जताया आभार
इस बीच, पंजाब सरकार के कैबिनेट मंत्री कुलदीप सिंह धालीवाल ने सोमवार को शाहपुर स्थित अजनाला बॉर्डर का दौरा किया और बीएसएफ के जवानों को मिठाई और फलों की टोकरी देकर सम्मानित किया. उन्होंने किसानों की समस्याओं को भी बीएसएफ के साथ साझा किया और घोषणा की कि किसान अब सामान्य रूप से अपनी खेती जारी रख सकेंगे.
रिट्रीट सेरेमनी की आंशिक बहाली सीमा पर स्थिरता की दिशा में सकारात्मक संकेत है, लेकिन जब तक पूर्ण रूप से दोनों देशों की साझा परेड फिर से शुरू नहीं होती और आम जनता को पूरी तरह से अनुमति नहीं मिलती, तब तक यह समारोह अपने पुराने रूप में नहीं लौटेगा. फिर भी, किसानों के लिए फेंसिंग गेट खोलना और सीमित रूप से परेड की बहाली, दोनों ही देश के सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए राहत और आशा की नई किरण हैं.
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