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चचरी पुल का सहारा! बेतिया में ग्रामीणों ने चंदे से बनाया बांस का पुल, JDU विधायक ने गुब्बारे फोड़कर किया उद्घाटन

पश्चिम चंपारण के बेतिया में हर साल ग्रामीण चंदा जुटाकर बांस का चचरी पुल बनाते हैं, जो बरसात में बह जाता है. जदयू विधायक ने उद्घाटन किया, लेकिन दशकों से पक्के पुल का इंतजार जारी है..

रिपोर्ट-जितेंद्र कुमार


बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया (मझौलिया प्रखंड) में कदमवा घाट पर बना यह चचरी पुल सिर्फ लकड़ी और बांस का ढांचा नहीं, बल्कि दर्जनों गांवों की जिंदगी का एकमात्र सहारा है. यह पुल हर साल ग्रामीणों के चंदे से बनता है और हर बरसात में बह जाता है. जिसके बाद चार-पांच महीने तक लोग नाव के सहारे आवागमन करते हैं. बता दें कि प्रसव हो या बीमारी, स्कूल जाना हो या बाजार, जान जोखिम में डालकर लोगों को नाव पर चढ़ना पड़ता है. यह पुल देखकर विकास के दावों पर बड़े सवाल उठते हैं.

गांव वाले चचरी पुल के सहारे

पंचगामा पंचायत के आधा दर्जन गांवों के लोग हर साल डेढ़ लाख रुपये आपस में इकट्ठा करते हैं. हर घर से एक बांस चंदे के रूप में लिया जाता है, फिर इसी चंदे से चचरी पुल का निर्माण होता है. इस बार भी ऐसा ही हुआ पुल के उद्घाटन के दिन बैलून से सजावट की जाती है. मजे की बात यह रही कि सिकटा के जदयू विधायक समृद्ध वर्मा ने इसका फीता काटकर उद्घाटन किया. लेकिन यह तस्वीर विकास की नहीं, बल्कि लाचारी की है. हालांकि विधायक ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया और पक्का पुल बनाने का वादा किया, पर ग्रामीणों को अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है.

बरसात में बह जाता है पुल

मौनी अमावस्या के दौरान यह पुल दर्जनों गांवों को जोड़ता है. लेकिन जैसे ही बरसात आती है, पुल बह जाता है. चार से पांच महीने तक लोग टापू में कैद हो जाते हैं. किसी महिला का प्रसव हो या किसी की तबीयत बिगड़े, नाव के सहारे जान जोखिम में डालकर जाना पड़ता है. स्कूल जाने वाले बच्चे भी नाव पर बैठकर पढ़ाई करते हैं. राहगीर बताते हैं कि पुल ही उनका एकमात्र सहारा है और बिना पुल के जिंदगी ठप हो जाती है.

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चंदे से बने पुल और फीता काटे विधायक

यह लंबा बांस का चचरी पुल पूरे जिले में चर्चा का विषय है. इतना बड़ा चचरी पुल शायद ही किसी जिले या राज्य में हो. हर साल बनता है, हर साल बरसात में बह जाता है. ग्रामीणों का कहना है कि सरकार विकास की बात करती है, लेकिन यहां पुल चंदे से बनता है और विधायक फीता काटते हैं. ग्रामीणों की मांग है कि सरकार जल्द से जल्द पक्का पुल या पीपा पुल बनवाए. बिना पुल के बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, बीमारों को अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो जाता है. यह सिलसिला दशकों से चल रहा है. अब समय आ गया है कि सरकार इन गांवों की पुकार सुने और विकास के दावों को हकीकत में बदले.

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-भारत एक्सप्रेस



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