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Bihar JDU Name Change: आशुतोष कुमार/पटना: बिहार के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों जनता दल यूनाइटेड के नाम को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है. पार्टी का नाम बदलकर ‘जनता दल नीतीश’ या ‘जदयू-नीतीश’ करने को लेकर जेडीयू के भीतर से जोरदार मांग उठ रही है. इस कड़ी में अब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने भी खुलकर अपना समर्थन दे दिया है. रविवार को एक सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से उन्होंने इस बात पर अपनी पूरी सहमति जताई है, जिससे राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है.
प्रस्ताव को मिला प्रदेश अध्यक्ष का साथ (JDU Name Change to Janata Dal Nitish)
हाल ही में पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने खगड़िया में आयोजित ‘फरक्का जल संधि पर नीतीश संवाद’ कार्यक्रम के दौरान पार्टी के नाम को राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम से जोड़ने का विचार व्यक्त किया था. अब उसी बात को आगे बढ़ाते हुए प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने अपने आधिकारिक बयान में लिखा है, “जेडीयू मतलब नीतीश कुमार. संजय झा जी ने पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं की सामूहिक भावना और अटूट आस्था को ही मुखर स्वर प्रदान किया है.”
उमेश कुशवाहा ने जोर देकर कहा कि नीतीश कुमार की मेहनत, संघर्ष और खून-पसीने से पार्टी सींची गई है, इसलिए उनके नाम को पार्टी से जोड़ना हर कार्यकर्ता के अंतर्मन की अभिव्यक्ति है और इसमें किसी भी तरह का ‘किंतु-परंतु’ नहीं होना चाहिए.
क्या रहा है जदयू का राजनीतिक इतिहास? (JDU Internal Politics History)
इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो जनता दल यूनाइटेड (JDU) का गठन साल 2003 में समाजवादी नेता शरद यादव के नेतृत्व वाले ‘जनता दल यूनाइटेड‘ और ‘समता पार्टी’ के विलय के बाद हुआ था.
- शरद यादव लंबे समय तक (2016 तक) पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे.
- इसके बाद साल 2016 में नीतीश कुमार ने पार्टी की कमान संभाली.
बीच के कुछ वर्षों में आरसीपी सिंह और ललन सिंह को भी पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई, लेकिन दिसंबर 2023 के बाद से एक बार फिर नीतीश कुमार खुद ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कमान संभाल रहे हैं.
अब इस माग का क्या होगा? (JDU Bihar Political News)
यदि पार्टी के भीतर उठी इस मांग को औपचारिक रूप से अमलीजामा पहनाया जाता है, तो यह बिहार की राजनीति में एक बहुत बड़ा फेरबदल साबित होगा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम पर पार्टी की पहचान को नए सिरे से गढ़ने की यह कवायद आगामी राजनीतिक रणनीतियों के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है.
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