बीकानेर में दिवाली पर उर्दू रामायण का पाठ
राजस्थान के बीकानेर में दीपावली का पर्व सिर्फ रोशनी और उत्सव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द और साझी संस्कृति का भी संदेश देता है. यहां दीपोत्सव के दौरान एक ऐसी अनूठी परंपरा निभाई जाती है, जो देश की बहुलतावादी संस्कृति को मजबूत करने का काम करती है. वर्ष 2012 से लगातार उर्दू रामायण का पाठ आयोजित किया जा रहा है, जिसमें अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ शामिल होते हैं. इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य भगवान श्रीराम के जीवन मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाना और प्रेम, सद्भाव, अहिंसा तथा राष्ट्रीय एकता का संदेश देना है.
श्रीराम सभी के हैं, सिर्फ एक समुदाय के नहीं
कार्यक्रम के दौरान सदर बीकानेर हाफिज फरमान अली ने कहा कि उर्दू रामायण का यह आयोजन पूरे देश को सकारात्मक संदेश देता है. उनके अनुसार, भगवान श्रीराम किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सभी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं. उन्होंने कहा कि श्रीराम का जीवन सत्य, दया, भाईचारे और जरूरतमंदों की सेवा का मार्ग दिखाता है. आयोजन का लक्ष्य यही है कि लोग श्रीराम के चरित्र और आदर्शों को समझें तथा उन्हें अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करें.
1935 की एक प्रतियोगिता से जुड़ी है इसकी कहानी
इस कार्यक्रम के आयोजक डॉ. जिया उल हसन कादरी ने उर्दू रामायण के इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि वर्ष 1935 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में तुलसीदास जयंती के अवसर पर एक विशेष प्रतियोगिता आयोजित की गई थी. उस समय बीकानेर में उर्दू और फारसी की शिक्षा देने वाले मौलवी बादशाह हुसैन खान, जिन्हें राना लखनवी के नाम से भी जाना जाता था, के एक कश्मीरी पंडित शिष्य ने उन्हें इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया. उस समय तक राना साहब ने रामचरितमानस का अध्ययन नहीं किया था.
शिष्य ने सुनाई रामचरितमानस, बनी उर्दू रामायण
डॉ. कादरी ने बताया कि राना लखनवी के शिष्य रोजाना उन्हें रामचरितमानस सुनाते थे और उसके अर्थ भी समझाते थे. राम कथा को गहराई से जानने के बाद राना साहब ने उर्दू भाषा में रामायण पर आधारित एक नज्म तैयार की और उसे प्रतियोगिता में भेज दिया. उनकी इस रचना को निर्णायकों ने बेहद पसंद किया और प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्रदान किया गया. इस उपलब्धि के लिए उन्हें गोल्ड मेडल देकर सम्मानित किया गया था.
महाराजा गंगासिंह भी हुए थे प्रभावित
उर्दू रामायण को मिली सफलता से तत्कालीन महाराजा गंगासिंह भी काफी प्रभावित हुए थे. डॉ. कादरी के अनुसार, इस उपलब्धि के बाद बीकानेर के नागरी भंडार में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें राना लखनवी ने सार्वजनिक रूप से उर्दू रामायण का पाठ किया था. उस अवसर पर प्रसिद्ध साहित्यकार तेज बहादुर सप्रू स्वयं गोल्ड मेडल लेकर बीकानेर पहुंचे थे और राना साहब को सम्मानित किया था. यह घटना उस दौर में सांस्कृतिक सद्भाव की एक बड़ी मिसाल मानी गई.
आज भी प्रासंगिक हैं श्रीराम के आदर्श
डॉ. कादरी का कहना है कि जिस तरह उस समय उर्दू रामायण ने भाईचारे और सामाजिक एकता का संदेश दिया था, उसी तरह आज भी इसकी आवश्यकता बनी हुई है. उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में श्रीराम के आदर्श पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं. उनके मुताबिक, भगवान श्रीराम किसी एक देश, जाति या धर्म की सीमा में बंधे नहीं हैं. पूरी दुनिया में उन्हें सम्मान और श्रद्धा के साथ देखा जाता है. श्रीराम का नाम लोगों को जोड़ने का कार्य करता है, न कि उन्हें बांटने का.
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उर्दू रामायण हमारी साझी विरासत
कार्यक्रम में शामिल साहित्यकार डॉ. नासिर जैदी ने भी भगवान श्रीराम की महत्ता पर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की चर्चा श्रीराम के बिना अधूरी है. श्रीराम भारतीय परंपरा की ऐसी महान शख्सियत हैं जिन्हें किसी एक दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता. उन्होंने याद दिलाया कि महान शायर अल्लामा इकबाल ने भी भगवान श्रीराम को ‘इमाम-ए-हिंद’ कहकर सम्मानित किया था. डॉ. जैदी ने कहा कि राम हर मजहब, हर वर्ग और हर समुदाय के लिए प्रेरणा हैं. उन्होंने उर्दू रामायण को भारतीय साहित्य और संस्कृति की एक अनमोल धरोहर बताते हुए कहा कि यह रचना देश की साझा सांस्कृतिक विरासत का चमकता हुआ प्रतीक है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरक उदाहरण बनी रहेगी.
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