दिल्ली हाई कोर्ट ने दो न्यायाधीशों ने वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार लाभ प्रदान करने से.संबंधित याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है. क्योंकि एक वकील ने दावा किया था कि खंडपीठ सुनवाई के लिए मामले चुन-चुन कर ले रही है. जस्टिस सी हरि शंकर और जस्टिस अजय दिगपॉल की पीठ ने स्थिति को बेहद परेशान करने वाला बताया और कहा कि मुख्य न्यायाधीश के आदेशों के अधीन मामलों को किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचिबद्ध किया जाए. स्पष्ट रूप से सुश्री एबीसी को इस खंडपीठ पर कोई भरोसा नहीं है, और उन्हें लगता है कि यह मनमाने ढंग से उन मामलों को चुन रही है, जिनकी वह करना चाहती है. इन परिस्थितियों में, इस सिद्धांत को लागू करते हुए की न्याय न केवल किया जाना चाहिए, बल्कि यह भी दिखना चाहिए कि न्याय किया गया है.
हम इन मामलों को अपने पास रखना उचित नहीं समझते. इन मामलों को 4 मार्च 2025 को माननीय मुख्य न्यायाधीश के आदेशों के अधीन किसी अन्य खंडपीठ के समक्ष सूचिबद्ध किया जाए. केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2022-2024 के लिए याचिकाओं का समूह दायर किया गया था. मुद्दा उस तारीख से संबंधित था, जिस तारीख से प्रतिवादी व्यक्ति वेतन आयोग की सितरिशों का लाभ पाने के हकदार होंगे. जब मामले की सुनवाई शुरू हुई तो पीठ के वकील को सूचित किया कि न्यायालय के लिए याचिकाओं के समूह को प्राथमिकता देना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसमें 106 अन्य मामले सूचिबद्ध है, जिनमे आकस्मिक मजदूरों, पेंशन की प्रतीक्षा कर रही विधवाओं आदि से संबंधित कई महत्वपूर्ण मामले शामिल है.
वकील ने जताई नाराजगी
जब न्यायालय ने वेतन आयोग के मामले को किसी अन्य तारीख के लिए फिर से अधिसूचित करने का प्रस्ताव रखा, तो वकील ने गंभीर नाराजगी जताई और तर्क दिया कि उसे उसी दिन मामलों पर बहस करने का पूरा अधिकार है. कोर्ट ने इस तर्क पर कहा कि हम याची के वकील की इन दलीलों पर आपत्ति नहीं करेंगे, क्योंकि हम वकील से यह अपेक्षा करने के आदि हैं कि हर मामले की सुनवाई होनी चाहिए. आखिरकार हर नागरिक को न्याय की आकांक्षा रखने का अधिकार है. हालांकि इसने दर्ज किया कि वकिओं यहीं नहीं रुके और कहा कि पीठ सुनवाई के लिए मामलों को चुन-चुन कर कर रही हैं. अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बहुत परेशान करने वाला है. हमारा हमेशा से प्रयास रहा है कि हम यथासंभव अधिक से अधिक मामलों का निपटारा करें. ऐसा करते समय, हमें मामले की तात्कालिकता और इसकी लंबी अवधि को ध्यान में रखना होगा. अन्यथा हम न्याय के बजाए अधिक अन्याय करेंगे. हमें नही लगता कि इन मामलों को अपने पास रखना हमारे लिए उचित है.
-भारत एक्सप्रेस
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