रिपोर्ट- जय व्यास
गणतंत्र दिवस का मौका खुशियों से भरा होता है, लेकिन इंदौर की सेंट्रल जेल के बाहर आज की सुबह कुछ अलग ही भावुक कर देने वाली थी. बरसों तक सलाखों के पीछे रहने के बाद, जब जेल का दरवाजा खुला, तो 9 कैदियों ने आजाद हवा में सांस ली. ये वो लोग थे जिन्होंने कभी गुस्से के एक पल में या किसी छोटी सी बात पर अपनों का या दोस्तों का खून बहाया था, लेकिन आज जब वे बाहर निकले, तो उनके हाथों में हथकड़ी नहीं बल्कि ‘श्रीमद भगवत गीता’ थी.
रिहा हुए इन कैदियों की कहानियां रूह कंपा देने वाली हैं, लेकिन साथ ही एक सबक भी देती हैं. हम अक्सर सुनते हैं कि ‘क्रोध इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है’, और इन 9 लोगों ने इस कहावत को अपनी जिंदगी देकर साबित किया है. किसी ने भाई से झगड़ा किया तो किसी ने दोस्त से, और परिणाम यह हुआ कि हंसती-खेलती जवानी के 14-15 साल जेल की कालकोठरी में बीत गए.
इनमें से सबसे ज्यादा चर्चा उस कैदी की रही, जो जेल के अंदर ‘शंकर’ बनकर आया था लेकिन बाहर ‘शंकर गिरी’ बनकर निकला. करीब 15 साल पहले, जवानी के जोश और गुस्से में उसने अपने ही दोस्त की हत्या कर दी थी. वह दोस्त, जिसके साथ शायद उसने बचपन बिताया होगा. उस एक गलती ने उसे अपराधी बना दिया. लेकिन जेल के अंदर उसने पश्चाताप की आग में तपकर खुद को बदल लिया. जब वह रिहा हुआ, तो उसके बदन पर भगवा चोला था और चेहरे पर एक अजीब सी शांति. वह अब दुनियादारी से दूर, साधु संतों की तरह जीवन जीने का संकल्प लेकर अपने घर की ओर बढ़ा है.
हाथों में गीता और आंखों में उम्मीद
इंदौर सेंट्रल जेल की अधीक्षक अलका सोनकर ने जब इन कैदियों को विदा किया, तो वह पल किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं था. उन्होंने रिहा होने वाले हर कैदी के हाथ में भागवत गीता थमाई. संदेश साफ़ था— अब तक जो हुआ सो हुआ, लेकिन अब आगे का जीवन धर्म और कर्म के रास्ते पर चलना चाहिए.
जेल अधीक्षक का यह जेस्चर (भाव) बताता है कि जेल सिर्फ़ सजा देने की जगह नहीं, बल्कि सुधार गृह भी है. रिहा होते वक्त कैदी राहुल और सुरेश (बदले हुए नाम) जैसे बंदियों की आँखों में वो चमक थी जो आज़ादी मिलने पर होती है, लेकिन साथ ही सीने में उस अपराध का बोझ भी था जो उनसे अनजाने में हुआ था. मीडिया से बात करते हुए उनकी जुबान लड़खड़ा रही थी, शायद वे यह सोच रहे थे कि जिस समाज को वे छोड़कर आए थे, क्या वह उन्हें अब अपनाएगा?
असली चुनौती अब शुरू होगी
जेल से बाहर आना तो सुखद है, लेकिन कड़वा सच यह है कि असली लड़ाई अब शुरू होगी. राहुल, सुरेश और शंकर जैसे इन 9 लोगों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती समाज में दोबारा अपनी जगह बनाने की है. 15 साल में दुनिया बहुत बदल चुकी है. परिवार बूढ़े हो चुके हैं, बच्चे बड़े हो गए हैं और काम-धंधे के तरीके बदल गए हैं.
रिहा हुए बंदियों ने भी माना कि उन्हें अपने किए पर गहरा पछतावा है. जेल की चारदीवारी ने उन्हें सब्र करना तो सिखा दिया, लेकिन अब परिवार का पेट भरना और ‘अपराधी’ का ठप्पा हटाकर इज्जत की रोटी कमाना उनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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