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65 दिन, 3 झटके; पश्चिम बंगाल में चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी की सियासत में लगातार झटके

Mamata Banerjee Political Crisis: विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी की सियासत लगातार झटकों से गुजर रही है.

Mamata Banerjee Political Crisis: 4 मई को आए विधानसभा चुनाव परिणाम ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के लिए अच्छे नहीं रहे. लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. हालांकि, 80 विधायक जीतने में सफल रहे. इसके बाद ममता ने राजनीति में नए सिरे से शुरुआत करने का ऐलान किया लेकिन पिछले दो महीनों में हालात उनके लिए और कठिन हो गए.

सांसदों का बड़ा टूट

लोकसभा चुनाव में 29 सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस के 19 सांसदों ने पार्टी छोड़ दी. काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर अपना इस्तीफा दिया. जून में इसकी आधिकारिक घोषणा हुई. अब ममता के पास केवल 8 सांसद बचे हैंॉ जिनमें अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा जैसे नाम शामिल हैं.

विधायकों का विद्रोह

3 जून को विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में करीब 70 विधायकों ने अलग गुट बना लिया. विधानसभा में इस गुट को मान्यता भी मिल गई. इसके चलते ममता के करीबी शोभनदेव भट्टाचार्य से नेता प्रतिपक्ष का पद छिन गया. ऋतब्रत ने आरोप लगाया कि पार्टी में अभिषेक बनर्जी तानाशाही कर रहे हैं.

पार्टी पर दावा

22 जून को ऋतब्रत गुट ने तृणमूल कांग्रेस पर ही दावा ठोक दिया. उन्होंने कहा कि असली टीएमसी वही है जिसमें 70 विधायक हैं. इस गुट ने अरुप रॉय को पार्टी अध्यक्ष घोषित कर दिया. मामला चुनाव आयोग तक पहुंच गया है और पुराने मामलों को देखते हुए ममता को झटका लग सकता है.

फंड पर रोक

पार्टी के भीतर विवाद बढ़ने के बाद ईडी ने तृणमूल कांग्रेस का फंड फ्रीज कर दिया. पार्टी के पास करीब 440 करोड़ रुपये जमा थे. ममता ने इसे साजिश बताया लेकिन फंड वापस पाना उनके लिए आसान नहीं है क्योंकि पहले पार्टी की स्थिति स्पष्ट होनी होगी.

सुरक्षा में कटौती

ममता बनर्जी की सुरक्षा भी कम कर दी गई है. पहले उनके घर के बाहर कड़ी बैरिकेडिंग रहती थी लेकिन अब उसमें बदलाव किया गया है. ममता ने आरोप लगाया कि उन्हें घर में नजरबंद कर दिया गया है और बाहर सीआरपीएफ की तैनाती कर दी गई है.

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दीदी के पास क्या बचा?

इन झटकों के बावजूद ममता के पास अभी भी 9 राज्यसभा सांसद, 8 लोकसभा सांसद और 10 विधायक हैं. संगठन में कोई बड़ी टूट नहीं हुई है और कार्यकर्ता उनके साथ खड़े हैं. नॉर्थ बंगाल और मेदिनीपुर को छोड़कर उनका जनाधार अब भी मजबूत माना जाता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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