Bharat Express DD Free Dish

पार्टी न खाता, न बही… फिर भी लोकसभा में पांचवीं सबसे बड़ी ताकत बन गई NCPI; जानें क्या है पूरा सियासी समीकरण

नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) ने बुधवार को सोशल मीडिया पर कई पोस्ट कर अपनी संसदीय पार्टी के नेताओं को बधाई दी. पार्टी ने हाल ही में हुए बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद खुद को लोकसभा में एक प्रमुख ताकत के रूप में स्थापित करने का दावा किया है.

देश की राजनीति में एक नया घटनाक्रम सामने आया है. नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) ने दावा किया है कि तृणमूल कांग्रेस के कई सांसदों के उसके साथ आने के बाद लोकसभा में उसकी स्थिति मजबूत हो गई है. बुधवार को पार्टी ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी नई संसदीय टीम के नेताओं को बधाई दी और इसे अपने लिए बड़ा राजनीतिक पड़ाव बताया.

एनसीपीआई ने इससे पहले सुदीप बंद्योपाध्याय को लोकसभा में अपना फ्लोर लीडर नियुक्त किया था. वहीं शताब्दी रॉय को उपनेता और काकोली घोष दस्तीदार को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) की जिम्मेदारी दी गई. सुदीप बंद्योपाध्याय ने पार्टी बदलने के बाद कहा था कि अब वह संसद में ‘असली तृणमूल’ का प्रतिनिधित्व करेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि इस नई भूमिका की शुरुआत 20 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र में दिखाई देगी. एनसीपीआई अब तक राष्ट्रीय राजनीति में कोई बड़ा नाम नहीं रही है. पार्टी ने अभी तक लोकसभा चुनाव तक नहीं लड़ा है.

हालांकि, पिछले महीने अचानक यह पार्टी चर्चा में आ गई, जब तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने और विलय की घोषणा की.

एनसीपीआई का बदला राजनीतिक कद

कोलकाता मुख्यालय वाली इस पार्टी ने साल 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव भी लड़ा था, लेकिन वहां उसे केवल 822 वोट मिले थे. इसके बावजूद अब पार्टी लोकसभा में अपनी नई ताकत के आधार पर खुद को सदन की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बता रही है. साथ ही उसका दावा है कि वह भारतीय जनता पार्टी के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी बन गई है.

एनसीपीआई में शामिल हुए सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अपनी नई संसदीय पार्टी को मान्यता देने की मांग की है. उन्होंने एनडीए को समर्थन देने का ऐलान भी किया है, जो तृणमूल कांग्रेस के पहले के राजनीतिक रुख से अलग है.

हालांकि, इस पूरे मामले पर कानूनी और राजनीतिक बहस तेज हो गई है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला दल-बदल विरोधी कानून के तहत काफी जटिल है. कुछ विश्लेषकों ने इसे ऐसी रणनीति बताया है जिसमें छोटी पार्टी के जरिए कानूनी सुरक्षा हासिल करने की कोशिश की जाती है.

वहीं, बागी सांसदों का कहना है कि उन्हें संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत संरक्षण मिलेगा. उनका तर्क है कि अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद किसी अन्य दल में विलय का फैसला करते हैं तो उन्हें अयोग्यता से बचाया जा सकता है.

लेकिन कानूनी जानकारों की राय इस मुद्दे पर एक जैसी नहीं है. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कानून में ‘पार्टी’ का अर्थ केवल सांसदों का समूह नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक पार्टी होता है. ऐसे में केवल सांसदों की संख्या के आधार पर फैसला होना आसान नहीं होगा.

सांसदों के फैसले पर मतदाताओं की भूमिका को लेकर चर्चा

इस घटनाक्रम ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और मतदाताओं की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़ा कर दिया हैं. राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही कोई रास्ता कानूनी रूप से संभव हो, लेकिन इससे यह बहस जरूर शुरू होती है कि चुनाव में मिले जनादेश और जनता के प्रतिनिधित्व का कितना सम्मान किया जाना चाहिए.

इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने पार्टी प्रतिनिधिमंडल के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की थी. उन्होंने एनसीपीआई में हुए इस विलय को अवैध बताते हुए बागी सांसदों के खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत कार्रवाई की मांग की थी.

फिलहाल लोकसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर अभी भी तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसद दर्ज हैं और एनसीपीआई के नए समूह को औपचारिक मान्यता नहीं मिली है. हालांकि, एनसीपीआई से जुड़े सांसदों को उम्मीद है कि जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनकी नई संसदीय पार्टी को मान्यता मिल जाएगी. इसी सिलसिले में उन्होंने रविवार को अपनी संसदीय दल की बैठक भी बुलाई है.

ये भी पढ़ें: स्कूटी बनी ‘काल’: नोएडा की 5 मंजिला इमारत में भड़की आग, 2 की मौत, 155 रेस्क्यू; कई परिवार फंसे



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read