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पासवर्ड का खेल खत्म! गूगल-माइक्रोसॉफ्ट ला रहे हैं नई तकनीक, अब आपका चेहरा और अंगूठा ही होगी आपके अकाउंट की चाबी

गूगल और माइक्रोसॉफ्ट पासवर्ड की जगह पासकी तकनीक ला रहे हैं, जिससे लॉगिन पहले से ज्यादा सुरक्षित होगा. लेकिन फोन शेयरिंग और अकाउंट रिकवरी जैसी चुनौतियां इस तकनीक में मुश्किल बना सकती हैं.

आजकल हम सब इतने सारे ऐप्स और वेबसाइट्स का इस्तेमाल करते हैं कि हर किसी का पासवर्ड याद रखना किसी सिरदर्द से कम नहीं है. कभी हम ‘12345’ जैसा आसान पासवर्ड रखकर खुद को खतरे में डालते हैं, तो कभी मुश्किल पासवर्ड रखकर खुद ही भूल जाते हैं. लेकिन अब शायद आपको ये सब करने की जरूरत न पड़े. गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनियां अब एक ऐसी तकनीक पर काम कर रही हैं, जिससे पासवर्ड बीते कल की बात हो जाएगी.

आखिर क्या है ये पासकी

पासकी का मतलब है कि आपका फोन या आपका लैपटॉप ही आपकी चाबी बन जाएगा. आपको कुछ भी टाइप करने या याद रखने की जरूरत नहीं होगी. जैसे आप अपने फोन को फिंगरप्रिंट या फेस आईडी (Face ID) से खोलते हैं, वैसे ही आप अपने फेसबुक, गूगल या बैंक अकाउंट में लॉगिन कर पाएंगे. टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह तरीका पासवर्ड के मुकाबले कहीं ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि इसे ‘फिशिंग’ (हैकिंग का एक तरीका) के जरिए चुराया नहीं जा सकता.

क्यों फंस सकता है पेंच?

सुनने में तो यह किसी जादू जैसा लगता है, लेकिन जब बात हमारे देश भारत की आती है, तो कहानी थोड़ी बदल जाती है. अमेरिका या यूरोप में अक्सर हर इंसान के पास अपना निजी फोन होता है, लेकिन भारत में आज भी एक ही मोबाइल से पूरा परिवार काम चला लेता है. यहीं से असली दिक्कत शुरू होती है.

  • फोन शेयरिंग की आदत: हमारे यहां मम्मी, पापा और बच्चे अक्सर एक ही फोन इस्तेमाल करते हैं. अगर पासकी पूरी तरह बायोमेट्रिक्स पर आधारित हो गई, तो घर के दूसरे सदस्यों के लिए उस डिवाइस पर अपना अकाउंट खोलना मुश्किल हो सकता है.
  • अगर फोन खो गया तो क्या होगा? यह सबसे बड़ा सवाल है. अभी तक अगर फोन खो जाता था, तो हम दूसरे फोन पर पासवर्ड डालकर अपना अकाउंट रिकवर कर लेते थे. लेकिन पासकी आपके डिवाइस के अंदर छिपी होती है. अगर फोन चोरी हो गया या खराब हो गया, तो अपने अकाउंट को वापस पाना किसी जंग जीतने जैसा मुश्किल काम हो सकता है. फिलहाल टेक कंपनियों के पास इसका कोई एक जैसा और आसान समाधान नहीं है.
  • सेकेंड हैंड मार्केट और सिम बदलना: भारत में लोग अक्सर फोन बदलते रहते हैं या पुराना फोन बेचकर नया लेते हैं. ऐसे में अपनी डिजिटल पहचान यानी पासकी को एक फोन से दूसरे फोन में सुरक्षित तरीके से ट्रांसफर करना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है.

क्या है आगे का रास्ता?

इसमें कोई शक नहीं कि पासकी भविष्य है. गूगल ने तो इसे अपना ‘डिफॉल्ट’ तरीका मान लिया है. लेकिन भारत के लिहाज से कंपनियों को अभी काफी होमवर्क करना बाकी है. जब तक अकाउंट रिकवरी का कोई सीधा और सरल रास्ता नहीं निकलता, तब तक पासवर्ड पूरी तरह खत्म नहीं होगा.

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भारत एक्सप्रेस



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