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टूटी झोंपड़ी, टपकती छत और काग़ज़ों में घर: बैगा आदिवासियों तक क्यों नहीं पहुंच पा रही पीएम आवास योजना?

PM Awas Yojana Baiga Tribals: बैगा आदिवासी परिवार आज भी कच्ची झोंपड़ियों में रहने को मजबूर हैं, जबकि रिकॉर्ड में उन्हें पक्का घर आवंटित दिखाया गया है. अधिकारियों की लापरवाही और सिस्टम की सुस्ती ने पीएम आवास योजना के लाभ को कागज़ों तक सीमित कर दिया है.

रिपोर्ट-अनिल पांडे


PM Awas Yojana Baiga Tribals: शहडोल संभाग के अनूपपुर जिले में बैगा आदिवासी परिवारों की दर्दनाक कहानी एक बार फिर सिस्टम की लापरवाही और अफसरशाही की क्रूरता को उजागर कर रही है. प्रधानमंत्री आवास योजना, जिसका मकसद गरीब और वंचितों को सम्मानजनक छत देना था, वही योजना यहां कागजों में कैद नजर आ रही है. बरगंवा अमलाई नगर परिषद के वार्ड क्रमांक 1, 2 और 5 में बड़ी संख्या में बैगा परिवार कच्ची, जर्जर झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं. बारिश में पानी टपकता है, गर्मी में आग लगती है और ठंड में ठिठुरते हैं, लेकिन पीएम आवास की आस आज भी अधूरी है.

जानिए राम प्रसाद बैगा की दास्तां

राम प्रसाद बैगा अपनी बुजुर्ग मां के साथ एक टूटी-फूटी झोपड़ी में रहते हैं. मजदूरी कर परिवार चलाने वाले राम प्रसाद वर्षों से पीएम आवास के लिए आवेदन कर रहे हैं. नगर परिषद से लेकर जिला मुख्यालय और संभागीय मुख्यालय तक चक्कर काट चुके हैं. लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिलता है. उनकी मां की आंखों में आज भी एक ही सपना है कि मरने से पहले अपने सिर पर एक पक्की छत देखना. राम प्रसाद कहते हैं कि “हम बैगा हैं, संरक्षित जनजाति हैं, सरकार हमें विशेष दर्जा देती है, लेकिन हकदार होने के बावजूद हमारी बारी नहीं आती.

जरूरतमंद को नहीं मिल रहा लाभ

स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में ऐसे प्रभावशाली लोगों को पीएम आवास का लाभ मिल गया है, जिनके पास पहले से पक्के मकान, गाड़ियां और संसाधन मौजूद हैं. जबकि वास्तविक हकदार बैगा परिवार आज भी दर-दर भटक रहे हैं. बैगा समाज के लोग अब संभागीय मुख्यालय तक गुहार लगा रहे हैं, लेकिन अफसरशाही की चुप्पी उनकी उम्मीदों को तोड़ती जा रही है.

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सिस्टम की लापरवाही पर उठे सवाल

प्रधानमंत्री आवास योजना गरीबों के लिए बनाई गई थी, लेकिन यहां अफसरशाही ने इसे फाइलों में कैद कर दिया है. आवेदन दाखिल करने के बावजूद बैगा परिवारों की बारी नहीं आ रही. प्रभावशाली लोगों को प्राथमिकता मिल रही है. प्रशासन की चुप्पी और लापरवाही से सवाल उठ रहे हैं कि आखिर कब तक बैगा आदिवासियों का हक दबता रहेगा? क्या मौत के बाद ही उन्हें पक्की छत मिलेगी?

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-भारत एक्सप्रेस

 



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