लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने पीएम मोदी के पत्र को लेकर कहा कि वे संसद की मूल प्रकृति-संवाद, तर्क और विचार-विमर्श में गहरा विश्वास रखते हैं. पीएम मोदी ने लोकसभा स्पीकर के नाम एक पत्र में कहा कि लोकसभा में आपके विरुद्ध लाया गया अविश्वास प्रस्ताव सदन में खारिज हो गया. जिस प्रकार सदन ने स्पष्ट रूप से इस राजनीतिक कुकृत्य को अस्वीकार किया, इसके लिए मैं सदन के सदस्यों को भी बधाई देता हूं.
पीएम मोदी के पत्र को शेयर करते हुए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि भारत के संसदीय लोकतंत्र के नियमों, प्रक्रियाओं और परंपराओं के प्रति आपका हमेशा अटूट विश्वास रहा है. आपका पत्र लोक सेवा के उन उच्चतम नैतिक मूल्यों को व्यक्त करता है, जिन्हें आपने अपने दीर्घ सार्वजनिक जीवन में जीया है. वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में तथा इससे पूर्व गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में.
आप सदैव संसद की मूल प्रकृति-संवाद, तर्क और विचार-विमर्श में गहरा विश्वास रखते हैं. आप संसद में उठने वाली प्रत्येक आवाज को लाखों भारतीय नागरिकों की आवाज के रूप में सम्मान देते हैं. आप हमेशा संसदीय कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं और संसद में उठाए गए प्रत्येक मुद्दे का समाधान निकालने का प्रयास करते हैं. आपका यह संदेश दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर संसद, राज्य विधानमंडल तथा स्थानीय निकायों के सभी जनप्रतिनिधियों को प्रेरित करेगा और हमारे स्वतंत्रता सेनानियों तथा संविधान सभा के सदस्यों द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सशक्त नैतिक आधार को और सुदृढ़ करेगा. आपके प्रेरणादायी शब्दों के लिए हार्दिक आभार.
सदन के सदस्यों को पीएम मोदी की बधाई
पीएम मोदी ने स्पीकर के नाम लिखे पत्र में लिखा कि लोकसभा में आपके विरुद्ध लाया गया अविश्वास प्रस्ताव सदन में खारिज हो गया. जिस प्रकार सदन ने स्पष्ट रूप से इस राजनीतिक कुकृत्य को अस्वीकार किया, इसके लिए मैं सदन के सदस्यों को भी बधाई देता हूं.
अविश्वास प्रस्ताव के गिरने के बाद आपने सदन में जो वक्तव्य दिया, उसे मैंने ध्यानपूर्वक सुना. आपने जिस संतुलन, धैर्य और स्पष्टता के साथ संसदीय इतिहास, अध्यक्ष के दायित्व और नियमों की सर्वोच्चता का उल्लेख किया, वह अत्यंत प्रभावशाली है. इसके लिए मैं आपका अभिनंदन करता हूं. आपका वक्तव्य केवल उस क्षण का उत्तर नहीं है, बल्कि भारतीय संसदीय परंपरा और लोकतांत्रिक मर्यादा की एक गहरी और सधी हुई व्याख्या भी है.
उन्होंने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवैधानिक संस्थाएं हैं. संसद इन संस्थाओं का सर्वोच्च मंच है. इस सदन में व्यक्त होने वाली हर आवाज देश के करोड़ों नागरिकों की आशाओं और अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है. ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष का दायित्व केवल कार्यवाही संचालित करने का नहीं होता, बल्कि वह लोकतांत्रिक परंपराओं, नियमों और संस्थागत गरिमा का संरक्षक भी होता है. आपने अपने वक्तव्य में जिस स्पष्टता के साथ कहा कि इस सदन में कोई भी नियमों से ऊपर नहीं है, वह हमारे लोकतंत्र की मूल भावना को पुनः स्थापित करने वाला संदेश है.
लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं. विचारों की विविधता ही लोकतंत्र को जीवंत बनाती है, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि असहमति और असम्मान के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है. लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं में विश्वास रखने वाले सभी लोगों के लिए यह चिंता का विषय है कि कभी-कभी राजनीतिक असहमति, संसदीय मर्यादा के प्रति अनादर में बदलती दिखाई देती है. ऐसे क्षणों में आसन पर बैठे व्यक्ति की परीक्षा होती है. आपने जिस संयम, संतुलन और निष्पक्षता के साथ इन परिस्थितियों का सामना किया, वह सराहनीय है.
अविश्वास प्रस्ताव के पीछे निजी स्वार्थ और अहंकार की भावना
लोकतांत्रिक विचारों में आस्था रखने वाले देश के हर नागरिक ने यह महसूस किया कि आपके विरुद्ध लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के पीछे निजी स्वार्थ और अहंकार की भावना कार्य कर रही थी. इस स्थिति ने लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले हर व्यक्ति को दुखी किया. यह पहली बार नहीं है जब इस आसन को इस प्रकार की परिस्थितियों का सामना करना पड़ा हो.
आपसे पहले जब सुमित्रा महाजन इस पद पर थीं, तब भी हमने देखा था कि कुछ सदस्यों का व्यवहार उस गरिमा के अनुरूप नहीं था जिसकी अपेक्षा सदन के सभी सदस्यों से की जाती है. उस समय भी अनेक अवसरों पर आसन के प्रति अनावश्यक कटुता और असम्मान देखने को मिला था. दुखद है कि आज भी वैसी प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं. ऐसी प्रवृत्ति केवल किसी व्यक्ति के प्रति नहीं होती, यह उस संस्था की गरिमा को प्रभावित करती है जो पूरे लोकतंत्र का प्रतीक है.
संसद का मूल स्वभाव संवाद, तर्क और विचार-विमर्श का है. यहां हर विचार को अभिव्यक्ति का अवसर मिलना चाहिए. आपने अपने कार्यकाल में निरंतर यह प्रयास किया कि अधिक से अधिक सांसदों को सदन में बोलने का अवसर मिले. युवा सांसद हों, पहली बार निर्वाचित होकर आए जनप्रतिनिधि हों या महिला सांसद हों, सभी को अपनी बात रखने का अवसर देना लोकतंत्र को और अधिक व्यापक बनाता है.
युवा सांसदों को बराबरी का अवसर देने की चुनौती
देश ये देखकर दुखी होता है कि परिवारवादी और सामंती सोच रखने वाले कुछ लोग लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी अपने सीमित दायरे में देखना चाहते हैं. वे किसी नए व्यक्ति को आगे आते हुए सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते. उन्हें यह भी स्वीकार्य नहीं होता कि सदन में अन्य जन प्रतिनिधियों को, विशेष रूप से नए और युवा सांसदों को, बराबरी से बोलने और आगे बढ़ने का अवसर मिले. यह सोच लोकतंत्र की भावना के विपरीत है.
लोकतंत्र का अर्थ ही यही है कि अवसर कुछ लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के हर वर्ग और हर क्षेत्र की आवाज को स्थान मिले. आपने अपनी अध्यक्षता में इस भावना को निरंतर विस्तार दिया है. विपरीत परिस्थितियों में भी आपने जिस प्रकार अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया है, वह अत्यंत प्रेरणादायक है.
मुझे यह भी प्रसन्नता है कि इतने महत्वपूर्ण राष्ट्रीय दायित्वों के बीच भी आपने अपने क्षेत्र के लोगों के हितों को कभी पीछे नहीं छोड़ा. हाल ही में कोटा में एयरपोर्ट परियोजना के शिलान्यास के अवसर पर हमने देखा कि आप अपने क्षेत्र के विकास के लिए कितनी प्रतिबद्धता के साथ निरंतर प्रयास करते रहे हैं. राष्ट्रीय दायित्वों और अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति जिम्मेदारी के बीच जो संतुलन आपने बनाए रखा है, वह एक जनप्रतिनिधि के रूप में आपकी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है.
मुझे विश्वास है कि आप आगे भी इसी निष्ठा, धैर्य और निष्पक्षता के साथ लोकसभा का संचालन करते रहेंगे. लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा को बनाए रखना और उन्हें और मजबूत करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है. आप इस दायित्व का निर्वहन जिस गरिमा और समर्पण के साथ कर रहे हैं, वह निश्चित ही हमारे संसदीय लोकतंत्र को और सुदृढ़ बनाएगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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