प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संस्कृत श्लोक साझा किया. इस श्लोक के जरिए उन्होंने लोगों को विनम्र रहने, अपनी उपलब्धियों पर घमंड न करने और जीवन में लगातार कुछ नया सीखते रहने का संदेश दिया. श्लोक में जुगनू, चंद्रमा और सूर्य का उदाहरण देकर समझाया गया है कि किसी की चमक और पहचान हमेशा एक जैसी नहीं रहती. जब उससे बेहतर कोई सामने आता है, तो पहले की उपलब्धियां छोटी लगने लगती हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पोस्ट में संस्कृत का यह श्लोक साझा किया:
“खद्योतो द्योतते तावद् यावन्नोदयते शशी. उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमाः..”
इसका अर्थ है कि जुगनू की चमक तब तक नजर आती है, जब तक आकाश में चंद्रमा का प्रकाश नहीं फैलता. लेकिन जब हजारों किरणों वाला सूर्य निकल आता है, तो जुगनू ही नहीं, चंद्रमा की रोशनी भी उसके सामने फीकी पड़ जाती है.
खद्योतो द्योतते तावद् यावन्नोदयते शशी।
उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमाः।। https://t.co/86NrPIbyXO
— Narendra Modi (@narendramodi) October 22, 2026
इस श्लोक का संदेश सिर्फ प्रकृति के नजारे तक सीमित नहीं है. इसमें इंसान के व्यवहार और जीवन में आगे बढ़ने के तरीके की भी अहम सीख छिपी है. कई बार व्यक्ति अपनी छोटी-सी सफलता को बहुत बड़ा मानने लगता है. उसे लगने लगता है कि उससे बेहतर कोई नहीं है. लेकिन समय के साथ जब उससे ज्यादा प्रतिभाशाली, अनुभवी या योग्य लोग सामने आते हैं, तो उसे अपनी सीमाओं का एहसास होता है.
सफलता मिलने पर भी क्यों जरूरी है विनम्र रहना?
इस श्लोक के माध्यम से यह समझने की कोशिश की गई है कि किसी व्यक्ति की काबिलियत का असली मतलब दूसरों से खुद को बेहतर साबित करना नहीं, बल्कि लगातार आगे बढ़ते रहना है. आज जिस काम में कोई व्यक्ति दूसरों से आगे है, जरूरी नहीं कि वह हमेशा उसी मुकाम पर बना रहे. दुनिया में हर दिन नए लोग अपनी मेहनत, प्रतिभा और ज्ञान के दम पर आगे आते हैं.
ऐसे में सफलता मिलने के बाद अहंकार करने के बजाय दूसरों से सीखने की आदत बनाए रखना ज्यादा जरूरी है. विनम्रता इंसान को अपनी गलतियां स्वीकार करने और खुद को बेहतर बनाने का मौका देती है. वहीं, घमंड कई बार उसे नई बातें सीखने और अपनी कमियों को पहचानने से रोक देता है.
संस्कृत सुभाषित में छिपा है पुराना लेकिन प्रासंगिक संदेश
प्रधानमंत्री की ओर से साझा किया गया यह श्लोक संस्कृत साहित्य की सुभाषित परंपरा से जुड़ा है. इसका उल्लेख प्रसिद्ध संस्कृत सुभाषित संग्रह ‘सुभाषितरत्नभांडागारम्’ के सूर्यान्योक्ति अध्याय में मिलता है. इस तरह के सुभाषित कम शब्दों में जीवन से जुड़ी बड़ी बातों को आसान उदाहरणों के जरिए सामने रखते हैं.
आज के दौर में, जब लोग अपनी उपलब्धियों और कामयाबी को दूसरों के सामने दिखाने की होड़ में लगे रहते हैं, यह संदेश और भी प्रासंगिक नजर आता है. पढ़ाई, नौकरी, कारोबार या किसी भी दूसरे क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ सफलता हासिल करना ही काफी नहीं है. अपने भीतर सीखने की इच्छा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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