पीएम मोदी ने शेयर किया खास संस्कृत श्लोक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को सोशल मीडिया पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया, जिसने एक बार फिर भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक सोच के बीच के संबंध को सामने रखा है. इस श्लोक के जरिए उन्होंने बताया कि किसी भी व्यक्ति की असली सफलता सिर्फ किताबी ज्ञान हासिल करने से नहीं मिलती, बल्कि उसके लिए अच्छी सोच, सही आचरण और काम करने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है.
पीएम मोदी ने जो संस्कृत श्लोक साझा किया,
“शास्त्रं कर्म तथा प्रज्ञा शीलं क्रिययान्वितम्. लक्ष्यलक्षणयुक्तार्थशास्त्रनिष्ठो नरो भवेत्॥”
शास्त्रं कर्म तथा प्रज्ञा शीलं क्रिययान्वितम्।
लक्ष्यलक्षणयुक्तार्थशास्त्रनिष्ठो नरो भवेत्॥ https://t.co/dzQmoIH58Q
— Narendra Modi (@narendramodi) October 30, 2026
इसका अर्थ है कि इंसान को जीवन में आगे बढ़ने के लिए ज्ञान, समझदारी, अच्छे संस्कार और काम करने की दक्षता को साथ लेकर चलना चाहिए. केवल बड़े-बड़े सिद्धांत जानना काफी नहीं है. उन बातों को अपने व्यवहार और काम में उतारना भी जरूरी है. जब व्यक्ति सही लक्ष्य तय करके विवेक और व्यावहारिक समझ के साथ आगे बढ़ता है, तभी उसे वास्तविक सफलता मिलती है.
राजा भोज के प्रसिद्ध ग्रंथ से लिया गया है श्लोक
प्रधानमंत्री की ओर से साझा किया गया यह श्लोक मालवा के प्रसिद्ध और प्रतापी राजा भोज की रचना माने जाने वाले वास्तुशास्त्र ग्रंथ ‘समराङ्गणसूत्रधार’ से लिया गया है. इस ग्रंथ के 44वें अध्याय के दूसरे श्लोक में राजा भोज ने एक अच्छे वास्तुकार यानी आर्किटेक्ट के गुणों के बारे में विस्तार से बताया है.
राजा भोज के मुताबिक, एक कुशल वास्तुविद के पास सिर्फ किताबी जानकारी होना पर्याप्त नहीं है. उसे अपने काम का व्यावहारिक अनुभव भी होना चाहिए. उसकी बुद्धि तेज होनी चाहिए, ताकि वह परिस्थितियों को समझकर सही फैसला ले सके. इसके साथ ही उसका चरित्र अच्छा हो और वह अपने काम को पूरी ईमानदारी तथा जिम्मेदारी के साथ पूरा करे.
इस श्लोक का संदेश केवल वास्तुकला या निर्माण कार्य तक सीमित नहीं है. इसे आम जिंदगी से जोड़कर भी समझा जा सकता है. आज के दौर में भी किसी व्यक्ति की पहचान सिर्फ उसकी डिग्री या जानकारी से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने ज्ञान का इस्तेमाल किस तरह करता है.
उदाहरण के तौर पर, किसी व्यक्ति के पास अच्छी शिक्षा और बहुत सारी जानकारी हो सकती है, लेकिन अगर वह सही समय पर सही फैसला नहीं ले पाता या अपने काम के प्रति जिम्मेदार नहीं है, तो उसका ज्ञान अधूरा ही माना जाएगा.
यही बात इस संस्कृत श्लोक में भी समझाई गई है. इसमें शास्त्र यानी ज्ञान, प्रज्ञा यानी बुद्धि, शील यानी अच्छा चरित्र और कर्म यानी काम करने की क्षमता को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ बताया गया है. इन सभी गुणों का संतुलन ही इंसान को बेहतर बनाता है.
लक्ष्य के साथ सही रास्ता चुनना भी है जरूरी
श्लोक में लक्ष्य, लक्षण और शास्त्र के प्रति निष्ठा की बात भी कही गई है. इसका मतलब है कि व्यक्ति को यह पता होना चाहिए कि उसे जीवन में क्या हासिल करना है और उस लक्ष्य तक पहुंचने का सही तरीका क्या है.
सिर्फ लक्ष्य बना लेना काफी नहीं होता. उसे पूरा करने के लिए सही योजना, व्यावहारिक समझ, नैतिकता और लगातार मेहनत की जरूरत होती है. साथ ही, फैसले लेते समय विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना भी महत्वपूर्ण है.
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-भारत एक्सप्रेस
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