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Delhi: संस्कार भारती में आयोजित हुआ गुरु पूर्णिमा समारोह, मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए मुरारी शरण शुक्ल

संस्कार भारती, नई दिल्ली के कला संकुल परिसर में 10 जुलाई 2025 को गुरु पूर्णिमा समारोह का आयोजन किया गया.

Urja Akshara

संस्कार भारती में आयोजित हुआ गुरु पूर्णिमा समारोह.

संस्कार भारती, नई दिल्ली के कला संकुल परिसर में 10 जुलाई 2025 को गुरु पूर्णिमा समारोह का आयोजन किया गया. समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मुरारी शरण शुक्ल शामिल हुए. समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें छात्र-छात्राओं ने मनमोहक प्रस्तुति देकर वहां पर मौजूद सभी लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया. यह समारोह एक ऐसा सांस्कृतिक प्रसंग बन गया, जहां गुरु-शिष्य परंपरा की महिमा न केवल वाणी में, बल्कि नृत्य, संगीत और व्यवहार में भी नजर आई. यह आयोजन नटराज पूजन से शुरू होकर समर्पण, साधना और सांस्कृतिक उत्कर्ष की यात्रा बन गया.

गुरु वंदना और नटराज पूजन के साथ वातावरण को आध्यात्मिक ऊंचाई मिली. नटराज को केवल नृत्य के देवता मानकर सीमित कर देना उनके विराट स्वरूप को संकुचित करना होगा. यही बात इस समारोह में गहराई से उभरी जब मुख्य अतिथि मुरारी शरण शुक्ल ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा कि नटराज केवल कलात्मक प्रतीक नहीं, अपितु सृष्टि के हर कण में व्याप्त गति और ब्रह्मांडीय चेतना के प्रतीक हैं. उनका यह विचार दर्शकों के हृदय में गूंजता रहा कि नटराज की मुद्रा स्वयं ब्रह्मांड की गतिक्रिया से जुड़ी है, वह शिव की सृजनात्मक शक्ति का नृत्यमय रूप है.

संगीत प्रस्तुतियों की त्रयी के माध्यम से श्रोताओं को भारतीय रागों की मिठास का अनुभव हुआ. पुष्कला संगीत केंद्र और केंद्र निर्देशिका स्नेहा मुखर्जी के निर्देशन में युवा कलाकार और उभरते कलाकारों ने बाखूबी संगीत की प्रस्तुति दी. यज्ञता गाबा की प्रस्तुति में किशोर वय की सरलता के साथ-साथ सुरों की परिपक्वता दिखाई दी, तो वहीं 19 वर्षीय ऊजा अक्षरा ने राग ‘देश’ की बंदिश प्रस्तुत करते हुए वर्षा ऋतु की संगीतमय स्मृति को जागृत किया. इसके पश्चात स्नेहा मुखर्जी द्वारा प्रशिक्षित शिष्यों- मान्या, रुही, लावण्या और सिद्ध ने सामूहिक रूप से गायन प्रस्तुत किया, जो गुरु द्वारा शिष्य में डाली गई विधा की जीवंत मिसाल थी. उनकी प्रस्तुति में न केवल तकनीक बल्कि सामूहिक सौंदर्य और संयम की स्पष्ट झलक थी. उनके सामूहिक गायन ने गुरु के प्रति श्रद्धा को माधुर्य और गरिमा से भर दिया. तबला पर संगत राकेश गन्धर्व और दिवाकर ने किया.

नृत्य प्रस्तुतियां संगीत के उपरांत हुईं और उनका क्रमबद्ध विस्तार दर्शकों को दृश्यात्मक सौंदर्य से जोड़ता चला गया. नंदिनी की प्रस्तुति में उनकी गुरु श्रुति सिन्हा की कठोर साधना और सौंदर्यबोध की स्पष्ट छाया थी. कत्थक की लय, भाव और गति के माध्यम से नंदिनी ने गुरु-समर्पण की जो व्यंजना रची, वह मात्र एक प्रस्तुति न होकर एक प्रणाम जैसा था. गरिमा रानी ने खूबसूरत मंच संचालन किया.

यह आयोजन केवल एक वार्षिक औपचारिकता नहीं रहा, बल्कि यह एक जीवंत यज्ञ बन गया जिसमें शिष्य अपनी कला की आहुति के माध्यम से गुरु को समर्पित हो रहे थे. मंच पर प्रस्तुत हर कला केवल कला न होकर एक भावना बन गई, श्रद्धा, समर्पण और परंपरा की भावना.

गुरु पूर्णिमा का यह आयोजन स्मरणीय रहेगा, न केवल उसकी कलात्मक प्रस्तुतियों के कारण, बल्कि इसलिए भी कि उसमें गुरु को जीवन का प्रकाश माना गया, और कला को उस प्रकाश की भाषा. संस्कार भारती का यह प्रयास सराहनीय है कि वह गुरु-शिष्य परंपरा को केवल मंच पर नहीं, आत्मा में जीवंत करती है.

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-भारत एक्सप्रेस



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