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खतरे में दागी माननीय: क्या है 130वां संविधान संशोधन विधेयक? 31वें दिन चली जाएगी कुर्सी

Parliament Monsoon Session: मानसून सत्र 2026 से पहले सियासत गर्म है. जानिए क्या है 130वां संविधान संशोधन विधेयक, जिसके तहत अगर कोई पीएम, सीएम या मंत्री 30 दिन तक जेल में रहता है, तो 31वें दिन उसकी कुर्सी स्वतः ही छिन जाएगीय. समझें इसका पूरा इतिहास और कानूनी पेंच

Parliament Monsoon Session 130th Constitutional Amendment Bill

Parliament Monsoon Session: साल 2026 का मानसून सत्र शुरू होने में अब बस कुछ ही दिन शेष हैं, लेकिन दिल्ली के लुटियंस जोन से लेकर देश के तमाम राज्यों की राजधानियों में सियासी पारा अभी से चरम पर पहुंच चुका है. संसद के पटल पर इस बार एक ऐसा ऐतिहासिक और अभूतपूर्व कानूनी दस्तावेज पेश होने जा रहा है, जो भारतीय लोकतंत्र और चुनावी राजनीति की दशा और दिशा को हमेशा के लिए बदल सकता है. सत्ता के कॉरिडोर्स में इस समय सबसे बड़ी चर्चा ‘संविधान में 130वें संशोधन विधेयक’ को लेकर हो रही है.

इतिहास गवाह है कि कानूनी ढिलाई के चलते इतिहास में कई मुख्यमंत्रियों ने जेल से ही सरकार और संगठन का रिमोट कंट्रोल संभाला है. लेकिन अब दागी जनप्रतिनिधियों के ‘जेल से राज’ वाले दौर पर हमेशा के लिए ताला लगने वाला है. आइए इस प्रस्तावित संशोधन को विस्तार से समझते हैं.

क्या है 130वां संविधान संशोधन विधेयक? (130th Constitutional Amendment In Monsoon Session)

अगस्त 2025 में पहली बार लोकसभा में पेश किए गए इस विधेयक को फिलहाल अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास गहन समीक्षा के लिए भेजा गया है. इस विधेयक के मुख्य प्रावधान बेहद कड़े और चौंकाने वाले हैं. यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री पर 5 वर्ष या उससे अधिक की सजा वाले गंभीर आपराधिक मामले का आरोप है, और उन्हें गिरफ्तार कर लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है, तो उन्हें अनिवार्य रूप से पद छोड़ना होगा.

प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के मामले में उन्हें लगातार 31वें दिन तक खुद स्वेच्छा से इस्तीफा देना होगा, अन्यथा 31वें दिन वे स्वतः अपने पद से बर्खास्त हो जाएंगे. अन्य मंत्रियों के मामले में राष्ट्रपति या संबंधित राज्य के राज्यपाल, क्रमशः पीएम या सीएम की सलाह पर उन्हें 31वें दिन स्वतः पद से कार्यमुक्त कर देंगे. यह नियम दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर जैसे केंद्र शासित प्रदेशों पर भी समान रूप से लागू होगा.

संविधान के किस हिस्से में होगा संशोधन?

वर्तमान भारतीय संविधान में विधायकों या सांसदों की अयोग्यता को लेकर तो विस्तृत नियम हैं, लेकिन किसी ‘मंत्री’ या ‘मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री’ को पद पर रहते हुए केवल गिरफ्तारी के आधार पर हटाने का कोई अलग से विधिक प्रावधान नहीं है. इस ऐतिहासिक कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए संविधान के भाग 5 (संघ) और भाग 6 (राज्य) के अंतर्गत आने वाले अनुच्छेद 75 (केंद्रीय मंत्रिपरिषद) और अनुच्छेद 164 (राज्य मंत्रिपरिषद) में संशोधन किया जाना प्रस्तावित है.

वर्तमान में संविधान के अनुच्छेद 102 (सांसदों के लिए) और अनुच्छेद 191 (विधायकों के लिए) के तहत लाभ का पद, मानसिक अस्वस्थता, दिवालियापन या दलबदल (दसवीं अनुसूची) के आधार पर ही अयोग्यता तय होती है, जिसका निर्णय राष्ट्रपति/राज्यपाल चुनाव आयोग की सलाह पर या सदन के अध्यक्ष करते हैं. इसके अलावा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act), 1951 के तहत कोर्ट से ‘दोषी सिद्ध’ (Conviction) होने पर ही कुर्सी जाती है.

जब-जब सलाखों के पीछे से चली हुकूमतें (Monsoon Session 2026 Update)

  • अरविंद केजरीवाल (2024): दिल्ली आबकारी नीति मामले में गिरफ्तारी के बाद उन्होंने पद से इस्तीफा नहीं दिया और तिहाड़ जेल के अंदर से ही जल और स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लिखित सरकारी निर्देश जारी कर कानूनी बहस छेड़ दी थी.
  • जे. जयललिता (2014): आय से अधिक संपत्ति मामले में जेल जाने के बाद तकनीकी रूप से उनकी कुर्सी जरूर गई, लेकिन जेल के भीतर से ही तमिलनाडु की सरकार और पूरी पार्टी पर उनका रिमोट कंट्रोल कायम रहा.
  • लालू प्रसाद यादव (चारा घोटाला दौर): चारा घोटाले में जेल की सजा काटने के दौरान भी बिहार की राजनीति का हर बड़ा फैसला, टिकट बंटवारा और गठबंधन की रणनीति बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल से ही तय होती थी.

क्या ‘मूल संरचना’ के चक्रव्यूह को पार कर पाएगा यह बिल?

इस विधेयक के मसौदे पर कई कानूनविदों ने गंभीर आपत्तियां भी उठाई हैं. उनका मानना है कि केवल ‘आरोप और 30 दिन की हिरासत’ के दम पर निर्वाचित प्रमुख को हटाना वर्ष 1973 के ऐतिहासिक केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित ‘संविधान की मूल संरचना’ के चार बड़े सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकता है.

संसदीय प्रणाली में पीएम या सीएम को चुनने या अविश्वास प्रस्ताव के जरिए हटाने का अनन्य विधिक अधिकार केवल लोकसभा या राज्य विधानसभाओं के पास होता है, न कि किसी जांच एजेंसी के पास. इस नियम से देश की नौकरशाही या केंद्र/राज्य की जांच एजेंसियां (स्थायी कार्यपालिका) मात्र एक एफआईआर और 30 दिन की कस्टडी के जरिए किसी भी चुनी हुई सरकार को गिराने की असीमित शक्ति हासिल कर लेंगी, जो लोकतांत्रिक जवाबदेही की त्रिस्तरीय श्रृंखला को तोड़ देगा.

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इसके तहत केंद्र की कोई एजेंसी किसी राज्य के मुख्यमंत्री को या किसी राज्य की पुलिस किसी केंद्रीय मंत्री या प्रधानमंत्री को दुर्भावनापूर्ण तरीके से 30 दिन हिरासत में रखकर पद से हटवा सकती है, जिससे राज्यों की स्वायत्तता खतरे में पड़ जाएगी. क्योंकि, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत पुलिस महज ‘उचित संदेह’ पर 60 से 90 दिनों तक कस्टडी रख सकती है. कोर्ट में वास्तविक न्यायिक मूल्यांकन ‘आरोप तय’ (Charge Sheet) होने के समय होता है. ऐसे में बिना दोष सिद्ध हुए, सिर्फ 30 दिन की जेल पर पद से हटाना मनमाना और कानून के सिद्धांतों के खिलाफ होगा.

पारदर्शिता की दिशा में साहसिक कदम (Monsoon Session Plan)

लंबे समय से विधि आयोग और कई उच्च स्तरीय समितियों ने राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए ‘आरोप तय होने पर अयोग्यता’ की सिफारिशें की हैं. इस परिप्रेक्ष्य में, आगामी मानसून सत्र में पेश होने जा रहा यह 130वां संविधान संशोधन विधेयक भारतीय राजनीति को शुचिता और पारदर्शिता के एक नए युग में ले जाने का माद्दा रखता है. सरकार का यह प्रयास सराहनीय है कि वह दागियों को सत्ता से दूर रखना चाहती है, लेकिन संसद को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस कानून का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध या चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने के हथियार के रूप में न हो सके.



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