Chhattisgarh News: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने रायपुर के लोकभवन स्थित छत्तीसगढ़ मण्डपम में आयोजित एक गरिमामयी कार्यक्रम में सिंधी समाज की महान संत एवं शदाणी दरबार की पंचम पीठाधीश पूज्य माता साहिब हासी देवी जी की 200वीं जयंती पर उनके सम्मान में 200 रुपये का विशेष स्मारक सिक्का जारी किया है.
भारत सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा जारी इस स्मारक सिक्के पर माता हासी देवी जी की छवि अंकित है. सिंध प्रांत के खानपुर महर में जन्मी माता हासी देवी ने 26 वर्ष की आयु में शदाणी दरबार की कमान संभाली थी और लगभग 57 वर्षों तक मानव सेवा, शिक्षा व अध्यात्म का प्रसार किया. इस ऐतिहासिक अवसर पर राज्यपाल रमेन डेका, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और शदाणी दरबार के पीठाधीश संत डॉ. युधिष्ठिर लाल समेत देश-विदेश के तमाम श्रद्धालु उपस्थित रहे.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जारी किया 200 रुपये का स्मारक सिक्का

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने रायपुर के लोकभवन स्थित छत्तीसगढ़ मण्डपम में पूज्य माता हासी देवी जी के सम्मान में 200 रुपये का विशेष स्मारक सिक्का जारी किया है. इस ऐतिहासिक अवसर पर राज्यपाल रमेन डेका और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी विशेष रूप से उपस्थित रहे. भारत सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा यह सिक्का पूज्य शदाणी दरबार रायपुर की पंचम पीठाधीश माता साहिब हासी देवी की 200वीं जयंती पर जारी किया गया है, जो देश-विदेश में बसे करोड़ों सिंधी श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत गौरव का विषय है. इस विशेष सिक्के के एक ओर अशोक स्तंभ का सिंह शीर्ष और 200 रुपये का मूल्यवर्ग दर्शाया गया है, जबकि दूसरी ओर माता हासी देवी जी की छवि अंकित है.
कौन थीं माता साहिब हासी देवी?
पूज्य माता साहिब हासी देवी सिंधी समाज की महान आध्यात्मिक संत और रायपुर स्थित शदाणी दरबार की पंचम पीठाधीश थीं. उनका जन्म वर्ष 1826 में सिंध प्रांत के खानपुर महर में हुआ था. बचपन से ही उनका झुकाव भक्ति, सेवा और अध्यात्म की ओर था. सन 1852 में मात्र 26 वर्ष की आयु में वे शदाणी दरबार की पहली महिला पीठाधीश्वर बनीं और लगभग 57 वर्षों तक धार्मिक व सामाजिक कार्यों का सफल नेतृत्व किया.
सेवा, शिक्षा और मानव कल्याण को समर्पित रहा जीवन
माता हासी देवी को भक्ति और सेवा की प्रतिमूर्ति माना जाता है. उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव सेवा, भजन-कीर्तन और ईश्वर आराधना के लिए समर्पित कर दिया. वह शिक्षा और संस्कारों के प्रसार की प्रबल पक्षधर थीं. उन्होंने हिंदी, संस्कृत और संगीत शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ-साथ गरीबों, विधवाओं और जरूरतमंदों की सहायता के लिए कई कार्य किए. संत युधिष्ठिर लाल के अनुसार, उन्होंने संत भगत कंवरराम और संत राजाराम जैसी महान विभूतियों को भी प्रेरित किया था. 30 अप्रैल 1909 को उन्होंने महाप्रयाण किया, लेकिन उनकी शिक्षाएं आज भी मानवता का मार्ग दिखा रही हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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