Why Only Suvendu Adhikari? पश्चिम बंगाल की सियासत में वह हो गया है, जिसे कुछ सालों पहले तक नामुमकिन माना जाता था. भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर कब्जा जमा लिया है और सूबे के नए ‘बॉस’ के रूप में शुभेंदु अधिकारी को कमान सौंपी गई है. लेकिन सियासी गलियारों में एक बड़ा सवाल तैर रहा है आखिर शुभेंदु अधिकारी ही क्यों? बीजेपी के पास कई और वरिष्ठ नेता थे, फिर शुभेंदु पर ही इतना बड़ा दांव क्यों खेला गया?
दरअसल, बीजेपी आलाकमान अच्छी तरह जानता था कि बंगाल में सिर्फ ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करना ही काफी नहीं है, बल्कि एक ऐसा स्थानीय नेतृत्व चाहिए जो लंबे समय तक पार्टी की जड़ें जमा सके. आइए डिकोड करते हैं शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे की बीजेपी की इनसाइड रणनीति
‘जायंट किलर’ की छवि (Mamata Banerjee vs Suvendu Adhikari)
शुभेंदु अधिकारी बंगाल की राजनीति के वो इकलौते ‘योद्धा’ बन चुके हैं, जिन्होंने अजेय मानी जाने वाली ममता बनर्जी को एक नहीं, बल्कि दो बार हराया है. 2021 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु ने ममता को नंदीग्राम में धूल चटाई थी. इसके बाद 2026 के चुनावों में बीजेपी ने शुभेंदु को दो सीटों (नंदीग्राम और भवानीपुर) से मैदान में उतारा. शुभेंदु ने न केवल दोनों सीटें जीतीं, बल्कि भवानीपुर जैसे ममता के सबसे सुरक्षित गढ़ में उन्हें हराकर यह साबित कर दिया कि वे राज्य में ममता के बाद सबसे बड़े पॉलिटिकल फेस हैं.
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हिंदुत्व + बंगाली पहचान का ‘परफेक्ट समीकरण’ (Suvendu Adhikari 5+ Point)
बीजेपी पर बंगाल में अक्सर ‘बाहरी’ पार्टी होने का ठप्पा लगाया जाता था. पार्टी को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो ठेठ बंगाली हो और हिंदुत्व के एजेंडे को भी धार दे सके. शुभेंदु दोनों समीकरणों में एकदम फिट बैठते हैं. बंगाल में वे बीजेपी का सबसे मुखर स्थानीय चेहरा हैं. राम नवमी की रैलियां हों या हिंदुत्व आधारित सभाएं, शुभेंदु ने आक्रामक तरीके से हिंदू मतदाताओं और ग्रामीण वोट बैंक में अपनी मजबूत पैठ बनाई है.
‘कैडर मैनेजमेंट’ और TMC की गहरी समझ
शुभेंदु की राजनीतिक शुरुआत छात्र राजनीति से हुई थी. पूर्वी मिदनापुर में कभी टीएमसी को खड़ा करने और नंदीग्राम के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन में उनकी अहम भूमिका थी. इसी आंदोलन ने बंगाल में लेफ्ट सरकार की जड़ें हिला दी थीं. टीएमसी की कार्यशैली, उसके नेताओं की कमजोरियों और कैडर को शुभेंदु से बेहतर कोई नहीं समझता. सड़क से लेकर विधानसभा तक वे ममता सरकार पर सबसे ज्यादा आक्रामक रहे. टीएमसी के कई बड़े नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं को तोड़कर बीजेपी में लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है. उनका यही कैडर मैनेजमेंट बीजेपी आलाकमान को सबसे ज्यादा रास आया.
2020 का ‘टर्निंग पॉइंट’ और मोदी-शाह का भरोसा (Suvendu Adhikari political journey)
एक समय था जब शुभेंदु टीएमसी में नंबर दो की हैसियत रखते थे. लेकिन, अभिषेक बनर्जी का पार्टी में प्रभाव बढ़ने के कारण शुभेंदु और टीएमसी नेतृत्व के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. आखिरकार, शुभेंदु ने सरकारी और पार्टी पदों से इस्तीफा दे दिया.
दिसंबर 2020 का महीना टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जब गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें आधिकारिक तौर पर बीजेपी की सदस्यता दिलाई. इसके बाद शुभेंदु का ‘गोल्डन एरा’ शुरू हुआ. वे पीएम मोदी और अमित शाह के बेहद करीबी और भरोसेमंद बन गए. 2021 के चुनाव के बाद उन्हें ‘नेता विपक्ष’ बनाया गया और उन्होंने खुद को ममता के सबसे बड़े और आक्रामक आलोचक के तौर पर स्थापित किया. 2024 के लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई.
लंबे समय की सत्ता का विजन (suvendu adhikari as chief minister)
शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाना बीजेपी का कोई तात्कालिक फैसला नहीं है. पार्टी बंगाल में एक ऐसा नेतृत्व विकसित करना चाहती है जो न केवल टीएमसी के कैडर का मुकाबला कर सके, बल्कि सत्ता में बीजेपी को लंबे समय तक स्थापित रख सके. शुभेंदु की जमीनी पकड़, उनका आक्रामक रवैया और हिंदुत्ववादी छवि उन्हें इस कुर्सी का सबसे मजबूत और निर्विवाद दावेदार बनाती है.
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