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अलोपी देवी शक्तिपीठ: इस मंदिर में बिना मूर्ति के होती है सती की पूजा, चैत्र नवरात्रि में उमड़ता है जन सैलाब

Alopidevi Temple (Alopshankari Devi Temple): नवरात्रि के दौरान देशभर के माता के मंदिरों की रौनिक अद्भुत होती है. ऐसे ही मंदिरों में से एक है प्रयागराज के अलोपीबाग का ‘अलोपी देवी शक्ति पीठ’ मंदिर. यहां माता की मूर्ति के बिना उनकी पूजा की जाती है.

Alopidevi Temple (Alopshankari Devi Temple)

प्रयागराज में अलोपी देवी शक्तिपीठ

Alopi Devi Temple: सनातन धर्म में चैत्र नवरात्रि बहुत खास त्योहार है. यह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है. इस साल यह 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक चलेगा. इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है. देशभर में माता के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ लगती है. लोग मां के दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं और मंदिरों में खास रौनक छा जाती है.

अलोपी देवी मंदिर की विशेषता

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर में अलोपीबाग इलाके में अलोपी देवी शक्तिपीठ मंदिर स्थित है. यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है. यहां की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मंदिर में मां की कोई मूर्ति नहीं है. भक्त बिना मूर्ति के ही मां की पूजा करते हैं. मंदिर के बीच में एक कुंड है, जिसके ऊपर चांदी का झूला या पालना बना हुआ है. इसे लाल कपड़े से ढककर रखा जाता है और इसी की पूजा होती है. नवरात्रि में यहां श्रृंगार नहीं होता, लेकिन नौ दिनों तक मां के अलग-अलग स्वरूपों का पाठ और विधि-विधान से आराधना की जाती है.

पौराणिक कथा और इतिहास

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब मां सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह किया, तो भगवान शिव दुखी होकर उनका शरीर लेकर घूमने लगे. तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए. ये टुकड़े भारत के अलग-अलग स्थानों पर गिरे, जो शक्तिपीठ बन गए. अलोपी देवी मंदिर में मां सती का दाहिना हाथ का पंजा (उंगलियां) एक कुंड में गिरा और वहां अलोप (गायब) हो गया. इसलिए इस जगह का नाम अलोपी पड़ा, जिसका मतलब है ‘गायब होने वाली’.

कुछ मान्यताओं में इसे अंतिम शक्तिपीठ भी कहा जाता है, क्योंकि यहां सती का आखिरी हिस्सा गायब हुआ. मंदिर संगम के पास है, जहां गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हैं. यह जगह कुंभ मेले के दौरान भी बहुत महत्वपूर्ण होती है. इतिहास में 11वीं शताब्दी से इस मंदिर का जिक्र मिलता है और मराठा काल में भी इसका विकास हुआ.

भक्तों की आस्था और परंपरा

नवरात्रि में यहां लाखों भक्त आते हैं. भक्त कुंड से जल लेकर पालने पर चढ़ाते हैं और परिक्रमा करते हैं. मान्यता है कि मां अलोपशंकरी या ललिता देवी के रूप में यहां विराजमान हैं. लोग मनोकामनाएं मांगते हैं और मां का आशीर्वाद लेते हैं. यह मंदिर आस्था का बड़ा केंद्र है, जहां अदृश्य शक्ति की पूजा होती है.

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