दिल्ली हाई कोर्ट ने दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन क्षेत्र में एक अवैध इमारत को ध्वस्त किए जाने के बाद मलबा न हटाए जाने और उसके नीचे लोगों के दबे होने की आशंका जताने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से स्पष्ट इनकार कर दिया है. अदालत ने याचिकाकर्ता से तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि इस तरह की आशंका जताने के पीछे उनका तकनीकी आधार और सूचना का स्रोत क्या है.
मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता से कड़े सवाल किए है. कोर्ट ने कहा कि केवल आशंका या अनुमान के आधार पर याचिका दाखिल नहीं की जा सकती. आपको कैसे पता है कि मलबे के नीचे लोग दबे हुए हैं? आपकी इस सूचना का स्रोत क्या है? अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि-
किसी भी इमारत को ध्वस्त करने से पहले संबंधित स्थानीय अधिकारियों और इंजीनियरों ने निश्चित रूप से किसी तरह का तकनीकी ऑडिट (Technical Audit) या तकनीकी अध्ययन जरूर किया होगा.
ठोस तथ्य जरूरी- दिल्ली हाईकोर्ट
कोर्ट ने दो टूक कहा कि केवल हवा में बातें करके या कोरी आशंका और अनुमान के आधार पर ऐसी जनहित याचिकाएं दाखिल नहीं की जानी चाहिए. याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि उसके पास ऐसा दावा करने के लिए कोई विश्वसनीय तकनीकी आधार या पुख्ता तथ्य मौजूद है.
सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे में पुलिस कार्रवाई
उल्लेखनीय है कि सत्य निकेतन इमारत हादसे में कुल 7 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें 5 छात्र शामिल थे. इस दर्दनाक घटना के बाद स्थानीय पुलिस ने सख्त कार्रवाई करते हुए भवन के मालिक हरिराम गुप्ता, उनकी पत्नी उर्मिला और उनके बेटे महेश के खिलाफ दक्षिण परिसर (South Campus) थाने में मुकदमा दर्ज किया था. इन सभी पर गैर इरादतन हत्या, इमारत के रखरखाव में गंभीर लापरवाही बरतने और छात्रों की सुरक्षा को खतरे में डालने जैसी विभिन्न भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है.
MCD और DU को जारी किया था नोटिस
इस भीषण हादसे की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले ही केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस, नगर निगम (MCD), दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया था.
अदालत की संवेदनाएं: मामले की पिछली सुनवाइयों में कोर्ट ने इस दुर्घटना को ‘बेहद दुखद’ करार देते हुए कहा था कि इससे अधिक पीड़ादायक कुछ नहीं हो सकता. कोर्ट ने कहा था कि पीड़ितों के माता-पिता के दर्द और भावनाओं को पूरी तरह समझा जा सकता है और इस लापरवाही की जिम्मेदारी से कोई भी नहीं बच सकता.
सोशल मीडिया पर वीडियो शेयरिंग पर नाराजगी: कोर्ट ने हादसे के समय के संवेदनशील वीडियो और फुटेज सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से शेयर किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई थी और कहा था कि ऐसा करना बिल्कुल भी उचित नहीं है.
पीजी (PG), हॉस्टल और फ्लैटों के संचालन पर सख्त सवाल
इस पूरी कानूनी प्रक्रिया के दौरान हाई कोर्ट ने दिल्ली में चल रही अवैध और अनियंत्रित हॉस्टल-पीजी व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए थे.
MCD और DU से जवाब तलब: अदालत ने एमसीडी से पूछा था कि क्या शहर में छात्रों के लिए संचालित होने वाले हॉस्टलों और पीजी के वास्ते कोई स्पष्ट नियम व रेगुलेशन हैं? वहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) से यह रिपोर्ट तलब की गई थी कि यूनिवर्सिटी के कॉलेजों में बाहर से कितने छात्र पढ़ने आते हैं, परिसरों में कुल कितने हॉस्टल हैं और उनकी आधिकारिक क्षमता कितने बच्चों की है.
फ्लैटों में चल रहे अवैध पीजी पर नकेल: कोर्ट ने कड़े निर्देश देते हुए कहा था कि कई आवासीय फ्लैटों में भी छात्र अवैध रूप से पीजी चलाकर रह रहे हैं, और इसकी जानकारी प्रशासन तक कैसे पहुंचेगी? किराए के फ्लैटों में कमर्शियल स्तर पर पीजी चल रहा है या नहीं, इसकी नियमित और व्यापक जांच होनी चाहिए, ताकि भविष्य में सत्य निकेतन जैसी किसी भी अनहोनी को समय रहते रोका जा सके.
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