दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि कोई भी पिता अपनी बेटी के नाम पर जमा पैसे का इस्तेमाल गुजाराभत्ता के लिए नही कर सकता है. जस्टिस नीना कृष्णा बंसल ने सभी पक्षों की जिरह के बाद यह फैसला सुनाया है. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चे का पालन-पोषण करना माता-पिता का दायित्व है. जबकि बच्चे के नाम पर किया गया निवेश उसी का होता है.
यही कहते हुए कोर्ट ने सुधीर कवात्रा की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया है. साथ ही कोर्ट ने उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उन्हें अपनी बेटी शामली कवात्रा को उसके पीपीएफ खाते से निकाली गई 8.13 लाख रुपए से ज्यादा की रकम 8 फीसदी सलाना ब्याज के.साथ लौटाने का निर्देश दिया गया था. 1999 में बेटी के नाम खोला था पीपीएफ खाता मामले के मुताबिक, सुधीर कवात्रा ने वर्ष 1999 में अपनी बेटी शामली कवात्रा नाम पीपीएफ खाता खोला था.
यह खाता वर्ष 2017 में मैच्योर होना था. लेकिन जब शामली मैच्योरिटी पर रकम लेने बैंक पहुची तो उसे पता चला कि उसके पिता ने 2016 में ही आइपीएफ की पूरी रकम, जो 8 लाख रुपये से अधिक थी, निकालकर खाता को बंद कर दिया था. शामली का आरोप था कि उसके पिता ने बैंक को दिए गए अपने अंडरटेकिंग में रकम निकालने का कारण उसकी शिक्षा और बेहतर भविष्य बताया था, लेकिन वास्तव में इस पैसे का इस्तेमाल उसकी पढ़ाई पर नही किया गया. जिसके बाद मामला निचली अदालत पहुचा. निचली अदालत ने पिता को पूरीपीपीएफ राशि 8 फीसदी ब्याज के साथ बेटी को लौटाने का आदेश दिया था.
इसके खिलाफ पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की थी. पिता की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि फैमिली कोर्ट के आदेश के तहत वह बेटी के भरण-पोषण और उसकी जरूरतों पर करीब 6 लाख रुपये खर्च कर चुका है. उसका कहना था कि यह रकम पीपीएफ से निकाली गई राशि में से ही दी गई थी. इसके अलावा, उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश के तहत वह अपनी पत्नी को भी मेंटेनेंस दे रहा था और पत्नी को मिलने वाली इस रकम का इस्तेमाल बेटी की जरूरतों के लिए भी हो रहा था.
हालांकि, बेटी का कहना था कि उसके नाम जमा पीपीएफ की रकम उसकी पढ़ाई के लिए थी और उसे इस रकम से वंचित नहीं किया जा सकता. उसने यह भी बताया कि माता-पिता के बीच विवाद के कारण वह अपनी मां के साथ रह रही है और कॉलेज की फीस भरना उसके लिए आर्थिक रूप से मुश्किल हो रहा है.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद या अलगाव की वजह से पिता बेटी के नाम जमा निवेश को उसके मेंटेनेंस के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता. ऐसा करना वास्तव में बच्चे के ही पैसे से पिता की कानूनी जिम्मेदारी पूरी करने के बराबर होगा. हाई कोर्ट ने कहा कि भले ही पीपीएफ खाता पिता ने खोला था, लेकिन वह बेटी के लाभ के लिए था. पिता ने रकम को केवल अभिभावक की हैसियत से संभाला था. बेटी के बालिग होने के बाद उस रकम पर उसका अधिकार था.
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-भारत एक्सप्रेस
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