दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मामले में आईपीसी की धारा 377 के तहत पति-पत्नी के बीच सामान्य सहवास के अलावा अन्य तरह के संभोग को अपराध की श्रेणी में घोषित करने के लिए लागू नहीं किया जा सकता है. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि इस तरह की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट के नवतेज सिंह जौहर मामले में दिए गए तर्क टिप्पणियों के अनुरूप है.
जस्टिस ने कहा कि आज की तारीख में कानून वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा को मान्यता नहीं देता है. आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 में प्रावधान है कि अगर कोई पुरुष अपनी 15 साल की उम्र से ज्यादा की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है, तो यह बलात्कार नहीं है. इससे कानूनी धारणा बनता है कि पत्नी की यौन संबंध बनाने की सहमति विवाह के आधार पर निहित है.
वैवाहिक बलात्कार अभी भी कानूनी रूप से मान्य नहीं
अब यह मानने का कोई आधार नहीं है कि पति को आईपीसी की धारा 377 के तहत अभियोजन से संरक्षण नहीं मिलेगा. क्योंकि आईपीसी की धारा 375 के अपराध 2 के मद्देनजर कानून (आईपीसी की संशोधित धारा 375) अब यौन संबंधों के साथ-साथ यौन कृत्यों (विवाह हो जाने के बाद गुदा या मुख मैथुन) के लिए सहमति मानता है.
अदालत ने टिप्पणी करते हुए आईपीसी की धारा 377 के तहत पति के खिलाफ आरोप तय करने के सत्र अदालत के आदेश को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि धारा 375 के अपवाद के तहत पति को अपनी 15 वर्षीय पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने के लिए बलात्कार का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है. पहले गुदा मैथुन या मुख मैथुन जैसे कृत्य को धारा 377 के दायरे में शामिल किया गया हो. लेकिन अब इसे आईपीसी की धारा 375 (ए) के दायरे में शामिल किया गया है.
अदालत ने पति के खिलाफ आरोप तय करने के आदेश को खारिज करते हुए कहा कि पत्नी ने यह आरोप नहीं लगाया है कि मुख मैथुन उसकी इच्छा के विरुद्ध या उसकी सहमति के बिना किया गया था. इस मामले में संदेह का मामला भी नहीं बनता है. इसलिए आरोप तय नहीं किया जा सकता है.
-भारत एक्सप्रेस
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