दिल्ली हाईकोर्ट दहेज उत्पीड़न के मामले में कहा कि पति-पत्नी के विवाद होने के बाद बच्चे का पति की देखरेख में होना क्रूरता या उत्पीड़न नही है. यह आईपीसी की धारा 498 A के तहत नही आता है. जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने यह धारा महिलाओं के लिए बढ़ा-चढ़ाकर व मनगढ़ंत आरोपों वाली झूठी प्राथमिकी दर्ज करवाकर अपना बदला चुकाने का आसान हथियार बन गया है.
कोर्ट ने यह टिप्पणी महिला की सास ससुर के खिलाफ दाखिल चार्जशीट को रद्द करते हुए किया है. इस मामले में पति के तलाक मांगने के प्रतिशोध में वर्ष 2015 में पत्नी ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी और जांच के बाद चार्जशीट दाखिल कर दिया गया था. सास-ससुर ने चार्जशीट को रद्द करने की मांग को लेकर याचिका दायर की थी. याचिका में प्राथमिकी में पत्नी ने दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए भरण-पोषण की मांग की थी.
कोर्ट ने बताया प्रक्रिया का दुरुपयोग
कोर्ट ने कहा था कि धारा 498 A के लाभकारी प्रावधान के दुरुपयोग का यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है. शिकायत और चार्जशीट की विषयवस्तु स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यह अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है. जिसका इस्तेमाल शिकायतकर्ता महिलाओं ने सास-ससुर को अपनी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए मजबूर करने के लिए एक उपकरण के रूप में किया है.
उसने कहा कि जहां वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए, वहीं अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्याय प्रणाली में विष्वसनीयता और विश्वास सुनिश्चित करने के लिए आईपीसी की धारा 498 A का दुरुपयोग न होने दिया जाए. यह पत्नी और उसके पति के बीच समायोजन का मामला था, जिसे दहेज उत्पीड़न का रंग दिया गया.
पति ने जब पत्नी से तलाक मांगा तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया था. कोर्ट ने चार्जशीट को रद्द कर दिया, लेकिन पत्नी की घरेलू हिंसा कानून के तहत दर्ज शिकायत को रद्द करने से इनकार कर दिया.
भारत एक्सप्रेस
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